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रविवार, 31 अगस्त 2014

बेबसी के कांटे

बेबसी के कांटे जब आँचल से उलझते हैं 
हम और उन पर पाँव रख रख के चलते हैं 
जुबाँ पर रख के तल्खियों के स्वाद 
अजनबियत का ओढ लिबास संग संग चलते हैं 

जाने किसे दगा देते हैं जाने किससे दगा खाते हैं 
हम बन के इक नकाब जब चेहरों पे पडते हैं 
खानाबदोशी के इकट्ठे करके सब सामान 
उनकी अजनबियत को झुक झुक सलाम करते हैं 

कैफियत दिल की न पूछ अब जालिम
रोज सिज़दे में सिर झुका जहाँ इबादत करते हैं
 खुदा न बनाया न बुत ही कोई सजाया 
यूँ उनकी याद के ताजमहल को गले लगाया करते हैं 

8 टिप्‍पणियां:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह क्‍या बात है

Kailash Sharma ने कहा…

खानाबदोशी के इकट्ठे करके सब सामान
उनकी अजनबियत को झुक झुक सलाम करते हैं
...वाह..बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

Smita Singh ने कहा…

बहुत खूब

Anita ने कहा…

बेहद संजीदा भाव

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

badhiya kavita

RAJESH CHAUDHARY ने कहा…

itne achchhe vichar.. keep it up pl .

RAJESH CHAUDHARY ने कहा…

itne khoo6surat vichaar.. keep it up.

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Bahut sunder gahare bhaaw !!