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गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

कथा - आलोचना




मित्रों 
इस बार के 'हिंदी चेतना' का अक्टूबर से दिसम्बर 'कथा - आलोचना विशेषांक' में मेरे द्वारा लिखी गयी हिंदी चेतना पत्रिका की समीक्षा (पेज ७ )  और एक आलोचनात्मक पाठकीय दृष्टिकोण ( ८९-९० पेज ) छपा है।  

सुशील सिद्धार्थ जी के संपादन में निकला ये विशेषांक उम्मीद से बढ़कर हैं  . सुशील जी की मेहनत साफ़ परिलक्षित हो रही है। सभी जाने माने प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति और उनकी कथा कहानी पर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया पाठक और लेखक के साथ आलोचक के दृष्टिकोण को तो एक पहचान दिलाएगी ही साथ ही लेखक और आलोचक के बीच की खायी को भी  पाटने की कोशिश करेगी मुझे ऐसी उम्मीद है।  

सुशील सिद्धार्थ जी द्वारा लिखा सम्पादकीय भी इसी दृष्टि को रेखांकित करता है।  क्योंकि अभी इसका इ - वर्जन ही उपलब्ध हुआ है इसलिए पूरा एकदम पढ़ना संभव नहीं मगर जो एक दृष्टि डाली तो लगा ये पत्रिका तो सबके पास होनी चाहिए।  एक ही जगह सभी  विचारों से रु-ब-रु होने का शायद इससे अच्छा मौका जल्दी न मिले।  सुशील सिद्धार्थ जी , पंकज सुबीर जी और सुधा ओम ढींगरा जी की पूरी टीम बधाई की पात्र है। 

जो मित्र पढ़ना चाहें इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं :

http://www.vibhom.com/pdf/oct_dec_2014.pdf

7 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.10.2014) को "उपासना में वासना" (चर्चा अंक-1762)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

देवदत्त प्रसून ने कहा…

साधुवाद !एक अच्छी कहानी !

देवदत्त प्रसून ने कहा…

साधुवाद !

मन के - मनके ने कहा…

कहानी की कहानी.
अच्छा प्रयोग

Kavita Rawat ने कहा…

हार्दिक बधाई !

Kavita Rawat ने कहा…

हार्दिक बधाई !

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Aapko hardik badhaayi ..sunder kahani !!