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सोमवार, 5 जनवरी 2015

दानव का जड़ से अंत

काट कर शरीर का सडा गला अंग 
संभव है जिंदा रह पाना 
मगर 
उस अंग की उपयोगिता का अहसास 
खुरचता रहता है उम्र भर 
ज़ेहन की दीवारों को 

अपंगता स्थायी होती है 
और विकल्पों के माध्यम से गुजरती ज़िन्दगी 
मोहताजगी का इल्म जब जब कराती है 
बेबसी के कांटे हलक में उग आते हैं 
तब असह्य रक्तरंजित पीड़ा शब्दबद्ध नही की जा सकती 

मगर मजबूर हैं हम 
जीना जरूरी जो है 
और जीने के लिए स्वस्थ रहना भी जरूरी है 
नासूर हों या विषाक्त अंग 
काटना ही है अंतिम विकल्प 
फिर शरीर हो , रिश्ते हों ,जाति हो , समाज हो या धर्म 

धर्म मज़हब सीमा और इंसानियत के नाम पर होती हैवानियत 
बुजदिली और कायरता का प्रमाण हैं 
ये जानते हुए भी 
आखिर कब तक नासूर को जिंदा रखोगी  .........ओ विश्व की महाशक्तियों 

दानव का जड़ से अंत ही कहानी की सार्थकता का अंतिम विकल्प है ........जानते हो न !!!

1 टिप्पणी:

Anita ने कहा…

यहाँ जड़ से अंत होता कहाँ हैं...रक्तबीज की तरह हजारों उग आते हैं..