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सोमवार, 16 नवंबर 2015

मौन के दुर्दिन

समय के कांटे हलक में उगकर अक्सर करते रहे लहुलुहान और तकलीफ की दहलीज पर सजदा करना बन गया दिनचर्या . ऐसे में कैसे संभव था शब्दों से जुगलबंदी करना . मौन के पंछियों का डेरा नियमित आवास बन गया फिर भी कुछ था जो कुरेद रहा था तरतीब से बिछे गलीचों को . गलीचों की ऊपरी सुन्दरता ही मापदंड है - ' सब कुछ ठीक है ' का . फिर कैसे संभव था अनकहे को लिपिबद्ध करना या खंगालना .

न , न यहाँ कोई नहीं जो भाषा की जुगाली करे या भावों का तर्पण . एक चुप्पी का कटघरा ही अक्सर संवाद करना चाहता है मगर मेरे पास कोई नहीं जो मेरे मौन से मुझे अवगत कराये .

चुप्पियों को घोंटकर पीने का वक्त है ये . मौन के दुर्दिन हैं ये जहाँ संवाद की हत्या हो गयी है ऐसे में जीत और हार बराबरी से विवश हैं सिर्फ शोक मनाने को ....

2 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 17 नवम्बबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-11-2015) को "छठ पर्व की उपासना" (चर्चा-अंक 2163) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'