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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

पहाड़ भर सपने ... अंजुरी भर प्यार

तुम्हारे
अंजुरी भर प्यार में
मैंने
पहाड़ भर देख डाले सपने

पहाड़
जिन्होंने नहीं सीखा हिलना
अडिग रहना है
जिनकी नियति

अंजुरी
जिसे कभी न कभी
खुलना ही था
हथेली सीधी करते हुए

फिर भी
जानते हुए इस सत्य को
तुम्हारे 

अंजुरी भर प्यार में
मैंने
पहाड़ भर देख डाले सपने

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आस के एक बिन्दु के पीछे अनन्त तक रेखा बन जाती है। सुन्दर पंक्तियाँ।

Anita ने कहा…

प्यार होना ही काफी है चाहे बूंद भर ही क्यों न हो..

महेश कुशवंश ने कहा…

अंजुरी भर प्यार काफी है उड़ने के लिए , और पहाड़ों को देखने के लिए भी , सुंदर रचना