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सोमवार, 14 जनवरी 2013

जीने को मुझमें मेरा होना जरूरी तो नहीं





जीने को मुझमें
मेरा होना जरूरी तो नहीं

बस यही है नियति मेरी

कहना है उनका
…………

जानने को मुझमें

मेरा कुछ बचा ही नहीं

सब जानते हैं मेरे बारे में

कहना है उनका
………

क्योंकि

स्त्री हूँ मैं

और स्त्री होना मापदंड है

उसके ना होने का

उसके खुद को ना जानने का

उसके खुद को प्रमाणित ना करने का

वरना उनकी पितृसत्तात्मक सत्ता के

कमज़ोर होने का खौफ़

कहीं उनके चेहरों पर ना उतर आये

और हो जायें उनके आदमकद अक्स वस्त्रहीन

बस सिर्फ़ इसलिये

कहीं मंत्र तंत्र

तो कहीं जादू टोना

तो कहीं डर

तो कहीं दहशत का साम्राज्य बोना ही

उनकी नियति बन गयी है

और कठपुतली की डोर

अपने हाथ मे पकडे

दिन में अट्टहास करते मुखौटे

सांझ ढले ही

रौद्र रूप धारण कर

शिकार पर निकल पडते हैं

फिर नही होती उनकी निगाह में

कोई माँ
, बहन या बेटी
बस होती है देह एक स्त्री की

जहाँ निर्लज्जता
, संवेदनहीनता और वीभत्सता का
पराकाष्ठा को पार करता

तांडव देख शिव भी शर्मिंदा हो जाते हैं

और कह उठते हैं

बस और नहीं

बस और नहीं

स्त्री
………तेरा ये रूप अब और नहीं

जान खुद को

पहचान खुद को

बन मील का पत्थर

दे एक मंज़िल स्वंय को

जहां फ़हरा सके झंडा तू भी अपने होने का

जहाँ कोई कह ना सके

सब जानते हैं तेरे बारे मे

तुझे अब अपने बारे मे जानने की जरूरत नहीं


या जहाँ कोई कह ना सके

तेरे होने के लिये

तेरा तुझमें होना जरूरी नहीं

बल्कि कहा जाये

हाँ तू है तो है ये सृष्टि

क्योंकि

तू है स्त्री
……………
और स्त्री होना अभिशाप नहीं
……………कर प्रमाणित अब !!!


 मधेपुरा टुडे के इस लिंक पर छपी है ये कविता

http://www.madhepuratoday.com/2013/01/blog-post_12.html









गुरुवार, 10 जनवरी 2013

बदलना है इस बार नियति

भूतकाल का शोक
भविष्य का भय
और
वर्तमान का मोह
बस इसी में उलझे रहना ही
नियति बना ली
जब तक ना इससे बाहर आयेंगे
खुद को कहाँ पायेंगे?
और सोच लिया है मैंने इस बार
नही दूंगी खुद की आहुति
बदलना है इस बार नियति
भूतकाल से सीखना है
ना कि भय को हावी करना है
और उस सीख का वर्तमान में सदुपयोग करना है
जलानी है एक मशाल क्रांति की
अपने होने की
अपने स्वत्व के लिए एकीकृत करना होगा
मुझे स्वयं मुझमे खोया मेरा मैं
ताकि वर्तमान न हो शर्मिंदा भविष्य से
खींचनी है अब वो रूपरेखा मुझे
जिसके आइनों की तस्वीरें धुंधली न पड़ें
क्योंकि
स्व की आहुति देने का रिवाज़  बंद कर दिया है मैंने  
गर हिम्मत हो तो आना मेरे यज्ञ में आहूत होने के लिए
वैसे भी अब यज्ञ की सम्पूर्णता पर ही
गिद्ध दृष्टि रखी है मैंने
क्योंकि
जरूरी नही हर बार अहिल्या या द्रौपदी सी छली जाऊं 
और बेगुनाह होते हुए भी सजा पाऊँ
इस बार लौ सुलगा ली है मैंने
जो भेद चुकी है सातों चक्रों को मेरे
और निकल चुकी है ब्रह्माण्ड रोधन के लिए ................

रविवार, 6 जनवरी 2013

जरूरी तो नहीं ना हर बार धरा ही अवशोषित हो

गहन अन्धकार में
भीषण चीत्कार
एक शोर
अन्तस की खामोशी का
दिमाग की नसों पर
पडता गहरा दबाव
समझने बूझने की शक्ति ने भी
जवाब दे दिया हो
और कहने को कुछ ना बचा हो
बस भयंकर नीरवता सांय - सांय कर रही हो
कितना मुश्किल होता है उस वक्त
एक तपते रेगिस्तान में
उम्मीद का दरिया बहाने का ख्वाब दिखाना

बस गुजर रहा है हर मंज़र आज इसी दौर से

देखें अब और कौन सा खंजर बचा है उस ओर से
यूं तो दफ़नायी गयी हूँ हर बार देह के पिंजर में
इस बार निकली हूँ आतिशी कफ़न ओढ कर
जलूँगी  या जला दूँगी
दुनिया तुझे इस बार आग लगा दूँगी
जो आज है चिन्गारी
कल उसे ही ज्वालामुखी बना दूँगी
बस ना ले मेरे सब्र  का और इम्तिहान
बस ना कर मेरे जिस्म से और खिलवाड
क्योंकि
पैमाना अब भर चुका है
हद पार कर चुका है
बस इक ज़रा सा हवा का झोंका ही
वज़ूद तेरा मिटा देगा
इस बार अपना वार चला देगा
गर चाहे बचना तो इतना करना
मुझे मेरे गौरान्वित वजूद के साथ जीने देना

एक आह्वान …………खुद का ……खुद से ……खुद के लिये ………जीने की जिजिविषा के साथ…………


क्योंकि सफ़ेद पड चुकी नस्ली रंगत बदलने के लिये

कुछ तो आवेश की लाली जरूरी होती है
और इस बार मैने चुरा लिया है लाल रंग थोडा सा दिनकर के ताप से
जरूरी तो नहीं ना हर बार धरा ही अवशोषित हो
वाष्पीकरण की प्रक्रिया में कुछ शोषण सागर का भी होना जरूरी है …………ज़िन्दगी के लिये

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

गीता ………जो भाव बन उतर गयी



श्री मद भगवद गीता भाव पद्यानुवाद श्री कैलाश शर्मा जी द्वारा रचित काव्य संग्रह बेशक संग्रहणीय  है। बेहद सरल भाषा में भावों को संजोना और कथ्य से भी कोई समझौता न करना एक बेहद  दुष्कर कार्य है क्योंकि भावों में बहने के बाद कथ्य  पर फर्क पड़  जाता है मगर जब प्रभु की असीम कृपा होती है और भक्त जब भावों के अथाह सागर में गोते लगाने लगता है और जब उसका अंतर्घट  प्रेम रस से लबालब भर जाता है तो उसके जल का बरतना जरूरी हो जाता है क्योंकि अगर प्रयोग न किया जायेगा तो ख़राब हो जायेगा और यदि निरंतर प्रवाह बना रहेगा तो स्वच्छ बना रहेगा। नित नवीन बने रहने के लिए उसे सब में बाँटना पड़ता है और ये सब प्रभु प्रेरणा के बिना संभव ही नहीं . यूँ तो सभी दिन रात धार्मिक ग्रन्थ पढ़ते हैं , कथा कीर्तन सुनते हैं मगर सब में भावों का दरिया नहीं बहता . ये तो जो उस उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है उसी की मूक वाणी में माँ सरस्वती का आह्वान होता है और जीव  वो सब कहने में सक्षम हो  जाता है जो वो स्वप्न में भी नहीं सोच सकता ........ये होता है भाव साम्राज्य .बस ऐसी ही परम कृपा जब कैलाश जी पर बरसी तो भावों ने पद्य रूप धारण कर लिया और सरल भाषा में गीता की कलि - कलि खोल दी . 

यदि मनुष्य अपने जीवन में श्री मद भगवद गीता के उपदेश उतार कर जीना शुरू कर दे तो उसका जीवन गृहस्थ में रहकर भी सन्यासी का हो सकता है क्योंकि ये कर्मयोग है और इसमें  शिक्षा कर्म की ही दी है क्योंकि इस पृथ्वी पर जो भी आया है उसे कर्म करना ही पड़ेगा वो उससे एक  क्षण भी विमुख नहीं रह सकता फिर चाहे सन्यासी ही क्यों न हो तो जब कर्म करना ही है तो सन्यास की क्या जरूरत , गृहस्थ में रहकर अपने कर्तव्यों को निरंतर करते हुए सिर्फ इतना ही तो करना है कि जो भी कर्म करो उन्हें प्रभु को समर्पित करते चलो बस यही तो मुख्य गीता ज्ञान है जिसे कैलाश जी ने अपनी भाव शैली में इतनी सरलता  से प्रस्तुत किया है जिसे यदि अल्पज्ञानी भी पढ़े तो समझ सके कि आखिर श्रीमद भगवद गीता कहना क्या चाहती है और यही किसी भी रचनाकार के लेखन का प्रमुख उद्देश्य होता है कि  जो उसने कहा वो बिना किसी प्रयास के दूसरे  के अंतस में उतर जाए  जिसका उन्होंने बेहद कुशलता से निर्वाह किया है . ईश्वर  की उन पर असीम अनुकम्पा है  जो नित्य निरंतर बनी रहे  इसी कामना के साथ कैलाश जी को हार्दिक बधाई देती हूँ .

जितना सुरुचिपूर्ण कैलाश जी का लेखन है उतना ही उम्दा प्रकाशन। हिन्द युग्म द्वारा प्रकाशित श्री मद भगवद गीता भाव पद्यानुवाद एक संग्रहनीय पुस्तक है . प्रिंटिंग और पेज बहुत  बढ़िया क्वालिटी के प्रयोग किये गये हैं साफ़ और सुन्दर शब्द मन मोहते हैं साथ ही कोई व्याकरणीय त्रुटि  न होने के कारण पुस्तक अपनी और आकर्षित करती है और ये किसी भी प्रकाशक के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात होती है .

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हिन्द युग्म 
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ईमेल : sampadak@hindyugm.com

ये कैलाश जी का ईमेल है :

kcsharma.sharma@gmail.com

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

आज मैं फिर जी उठी हूँ

उम्मीदों की पुडिया 
हर बार बाँधी मैंने 
और रख दी आस की टोकरी में 
ये सोच अब की बार जरूर 
एक नया रंग भरेगी 
मगर आस की टोकरी
हमेशा सूखती रही 
और मुझमे एक चेतना का 
संचार करती रही 
और अब और नहीं , और नहीं 
बहुत हुआ ख्वाबों के महल सजाना 
अब मैंने हकीकत से है आँख मिलाना 
बस जिस दिन ये प्रण लिया 
मेरी उम्मीदों की बगिया का 
हर फूल खिल उठा 
जीवन का हर पल महक उठा 
बस यही तो मैंने खुद से वादा किया 
अब खुद लडूंगी अपनी लडाई 
अपने वजूद का अहसास कराऊंगी 
सबको ये बतलाऊंगी 
हाँ , मैंने खुद को बदल लिया है 
एक क्रांति का बीज खुद में बो दिया है 
जहाँ न कोई नर मादा हुआ है 
बस एक इंसानियत का तरु विकसित हुआ है 
जिसकी शाखों पर विश्वास के फूल खिले हैं 
जो इस वर्ष  कैसे चहक उठे हैं 
जिसका दिग्दर्शन उस पल हुआ है 
जब बच्चे से लेकर हर बड़ा 
मेरे संग खड़ा है और उसने माना  है 
हाँ .........मैं नारी हूँ बेशक 
पर भोग्या नहीं ...............
बस इस वर्ष मैंने मुझे ये तोहफा दिया है 
आज मैं फिर जी उठी हूँ  
नारी हूँ, भोग्या नहीं  ...........इस अद्भुत अहसास के साथ




ये रचना उस जज्बे को सलाम है जो आज नारी की अस्मिता के लिए लड़ रहे हैं 

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

ख़ामोशी की गूँज ऐसी होनी चाहिए

क्या कहूं 
सत्ता बीमार है या मानसिकता 
इंसानियत मर गयी या शर्मसार है 
मौत तो आनी  है इक दिन 
मगर मौत से पहले हुयी मौत से 
कौन कौन शर्मसार है ?


क्योंकि 
न इंसानियत बची न इन्सान 
लगता है आज तो बस बेबसी है शर्मसार………

चेहरा जो ढाँप लिया तुमने
तो क्या जुर्म छुप गया उसमें
क्या करेगा ओ नादान उस दिन
जब तेरा ज़मीर हिसाब करेगा तुझसे

अब पीढियाँ ना हों शर्मसार
यारा करो कोई ऐसा व्यवहार

अब अंगार हाथ में रख
जुबाँ पर इक कटार रख 
देख तस्वीर बदल जायेगी
बस हौसलों की दीवार बुलंद रख 


ख़ामोशी की गूँज ऐसी होनी चाहिए 
सोच के परदे फाड़ने वाली होनी चाहिए 
व्यर्थ न जाये बलिदान उसका 
अब ऐसी क्रांति होनी चाहिए 
यही होगी सच्ची श्रद्धांजलि




जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक सुधार संभव नहीं क्योंकि देखो चाहे मृत्युदंड का प्रावधान है हत्या के विरुद्ध तो क्या हत्यायें होनी बंद हो गयीं नहीं ना तो बेशक कानून सख्त होना चाहिये इस संदर्भ में मगर उसके साथ मानसिकता का बदलना बहुत जरूरी है जब तक हमाiरी सोच नही बदलेगी जब तक हम अपने बच्चों से शुरुआत नहीं करेंगे उन्हें अच्छे संस्कार नहीं देंगे औरत और आदमी मे फ़र्क नहीं होता दोनो के समान अधिकार और कर्तव्य हैं और बराबर का सम्मान जब तक ऐसी सोच को पोषित नहीं करेंगे तब तक बदलाव संभव नहीं ।

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

अब तो तस्वीर बदलनी चाहिये

 इतनी लाठियाँ एक साथ ……नृशंसता की पराकाष्ठा………दोष सिर्फ़ इतना न्याय के लिये क्यों गुहार लगायी ?


बहुत हो चुका अत्याचार
बहुत हो चुका व्यभिचार
अब बन दुर्गा कर संहार
क्योंकि
बन चुकी बहुत तू सीता
कर चुकी धर्म के नाम पर खुद को होम
सहनशीला के तमगे से
अब खुद को मुक्त कर चल उस ओर
जहाँ ये नपुंसक समाज ना हो
जहाँ तू सिर्फ़ देवी ना हो
जहाँ अबला की परिभाषा ना हो
तेरी कुछ कर गुजरने की
एक अटल अभिलाषा हो
जहाँ तू सिर्फ़ नारी ना हो
समाज का सशक्त हिस्सा हो
जहाँ तू सिर्फ़ भोग्या ना हो
बराबरी का हक रखती हो
खुद को ना कठपुतली बनने देती हो
अब कर ऐसा नव निर्माण
बना एक ऐसा जनाधार
जो तेरी लहुलुहान आत्मा पर
फ़हराये अस्तित्व बोध का परचम
तू भी इंसान है ………स्वीकारा जाये
तेरा अस्तित्व ना नकारा जाये
तेरी रजामंदी शामिल हो
हर फ़ैसले पर तेरी मोहर लगी हो
कर खुद को इस काबिल
फिर देख कैसे ना रुत बदलेगी
खिज़ाँ की हर बदली तब हटेगी
और हर दिल से यही आवाज़ निकलेगी
बहुत हो चुका अत्याचार
अब तो ये पहचान मिलनी चाहिये
जिसमें हौसलों भरी उडान हो
तेरे कुछ कर गुजरने के संस्कार ही तेरी पहचान हों
तेरी योग्यता ही उस संस्कृति की जान हो
तेरी कर्मठता ही उस सभ्यता का मान हो 
ऐसी फिर एक नयी लहर मिलनी चाहिये
अब तो तस्वीर बदलनी चाहिये
अब तो तस्वीर बदलनी चाहिये …………

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

ओ देश के कर्णधारों ……अब तो जागो

कुम्भकर्णी नींद में सोने वालों अब तो जागो
ओ देश के कर्णधारों ……अब तो जागो
क्या देश की आधी आबादी से तुम्हें सरोकार नहीं
क्या तुम्हारे घर में भी उनकी जगह नहीं
क्या तुम्हारा ज़मीर इतना सो गया है
जो तुम्हें दिखता ये जुल्म नहीं
क्या जरूरी है घटना का घटित होना
तुम्हारे घर में ही
क्या तभी जागेगी तुम्हारी अन्तरात्मा भी
क्या तभी संसद के गलियारों में
ये गूँज उठेगी
क्या उससे पहले ना किसी
बहन, बेटी या माँ की ना
कोई पुकार सुनेगी
अरे छोडो अब तो सारे बहानों को
अरे छोडो अब तो कानून बनाने के मुद्दों को
अरे छोडो अब तो मानवाधिकार आदि के ढकोसलों को
क्या जिस की इज़्ज़त तार तार हुई
जो मौत से दो चार हुयी
क्या वो मानवाधिकार के दायरे मे नही आती है
तो छोडो हर उस बहाने को
आज दिखा दो सारे देश को
हर अपराधी को
और आधी आबादी को
तुम में अभी कुछ संवेदना बाकी है
और करो उसे संगसार सरेआम
करो उन पर पत्थरों से वार सरेआम
हर आने जाने वाला एक पत्थर उठा सके
और अपनी बहन बेटी के नाम पर
उन दरिंदों को लहुलुहान कर सके
दो इस बार जनता को ये अधिकार
बस एक बार ये कदम तुम उठा लो
बस एक बार तुम अपने खोल से बाहर तो आ सको
फिर देखो दुनिया नतमस्तक हो जायेगी
तुम्हारे सिर्फ़ एक कदम से
आधी आबादी को ससम्मान जीने की
मोहलत मिल जायेगी …………
गर है सच्ची सहानुभूति तभी ज़ुबान खोलना
वरना झूठे दिखावे के लिये ना मूँह खोलना
क्योंकि
अब जनता सब जानती है ………बस इतना याद रखना
गर इस बार तुम चूक गये
बस इतना याद रखना
कहीं ऐसा ना हो अगला निशाना घर तुम्हारा ही हो ……………

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

क्योंकि........ हूँ बलात्कारियों के साथ तब तक

हम थोथे चने हैं
सिर्फ शोर मचाना जानते हैं
एक घटना का घटित होना
और हमारी कलमों का उठना
दो शब्द कहकर इतिश्री कर लेना
भला इससे ज्यादा कुछ करते हैं कभी
संवेदनहीन  हैं हम
मौके का फायदा उठाते हम
सिर्फ बहती गंगा में हाथ धोना जानते हैं
नहीं निकलते हम अपने घरों से
नहीं करते कोई आह्वान
नहीं देते साथ आंदोलनों में
क्योंकि नहीं हुआ घटित कुछ ऐसा हमारे साथ
तो कैसी संवेदनाएं
और कैसा ढोंग
छोड़ना होगा अब हमें .......आइनों पर पर्दा डाल कर देखना
शुरू करना होगा खुद से ही
एक नया आन्दोलन
हकीकत से नज़र मिलाने का
खुद को उस धरातल पर रखने का
और खुद से ही लड़ने का
शायद तब हम उस अंतहीन पीड़ा
के करीब से गुजरें
और समझ सकें
कि  दो शब्द कह देने भर से
कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं होती
क्योंकि .........आज जरूरी है
बाहरी आन्दोलनों से पहले
आतंरिक दुविधाओं के पटाक्षेप का
केवल एक हाथ तक नहीं
अपने दोनों हाथों को आगे बढाने का
जिस दिन हम बदल देंगे अपने मापदंड
उस दिन स्वयं हो जायेंगे आन्दोलन
बदल जायेगी तस्वीर
मगर तब तक
कायरों , नपुंसकों की तरह
सिर्फ कह देने भर से
नहीं हो जाती इतिश्री हमारे कर्तव्यों की
और मैं ..........अभी कायर हूँ
क्योंकि........ हूँ बलात्कारियों के साथ तब तक
जब तक  नहीं मिला पाती खुद से नज़र
नहीं कर पाती खुद से बगावत
नहीं चल पाती एक आन्दोलन का सक्रिय पाँव बनकर
इसलिए
शामिल हूँ अभी उसी बिरादरी में
अपनी जद्दोजहद के साथ ................




 इस अभियान मे शामिल होने के लिये सबको प्रेरित कीजिए
http://www.change.org/petitions/union-home-ministry-delhi-government-set-up-fast-track-courts-to-hear-rape-gangrape-cases#

कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं.........

रविवार, 16 दिसंबर 2012

सब जानती हूँ ...........दिवास्वप्न है ये

इंतजार की हद पर ठहरा 
धूप का टुकड़ा 
देख कुम्हलाने लगा है
नमी का ना कोई बायस रहा है 
हवाओं में भी तेज़ाब घुला है 
ओट दी थी मैंने 
अपनी मोहब्बत के टीके की 
पर मोहब्बत ने भी अब 
करवट बदल ली 
ना सुबह का फेन बचा है
ना सांझ की कटोरी में 
कोई रेशा रुका है
कब तक आटे की गोलियां बनाती रहूँ
मछलियों को दाना डालती रहूँ 
सूखे तालाबों में मछलियों का होना
उनका दाना चुगना 
सब जानती हूँ ...........दिवास्वप्न है ये 
इंतज़ार के भरम सपनों की गोद में ही तो पलते हैं लोरियां सुनते हुए ...........

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

उपन्यास का इससे सुखद अंत और क्या होगा ?

 दर्द शापित होता है तभी तो अदृश्य होता है फिर भी भासित होता है ...........नींद की गोलियां भी बेअसर ..........उम्र की कडाही में खौलता रेशा रेशा तड़पने को मजबूर ..........कोई ऊँगली डालने को भी राजी नहीं वहां दर्द की तासीर बड़ी मीठी हो जाती है अपनी कडवाहट से ...........आखिर दर्द भी तो पनाह चाहता है न कसकने के आगोश में .........चिंदी चिंदी कर बिखरना आसान होता है मगर ठोस बनना मुश्किल फिर सीने के लिए कहाँ मिलता है कोई दरजी जो दर्द की एक- एक पोर को सीं दे और जोड़ दे उसमे कुछ रेशे अपनी पैरवी के ............नहीं मिलता कोई रंगरेजा जो उँडेल दे रंगों का इन्द्रधनुष और मिटा दे दर्द की ताबीर ...........मिटटी को कब मिला आसमान , कुटना, पिसना और मिटना ही तो नियति है फिर क्यों  न दर्द को ही सखी बनाया जाये और कुछ पल उसके आगोश में सिमटा जाए ............यूँ भी घूँट घूँट कर पीने से राहत मिलती है रेशमी दुल्हनों को ..............कोई जरूरी तो नहीं न दूल्हे  ने हर बार सेहरा ही लगाया हो ............बेनकाब आतिशों पर सायों की परछाईयाँ कब हमसफ़र बन कर साथ चलती हैं ...........यूँ भी दर्द की दुल्हन तो हमेशा ही सिन्दूर को तरसती है ..............कुछ दुल्हन बिन श्रृंगार के ही डोलियों में विदा होती हैं ............आखिर अंतिम विदाई के भी तो कुछ दस्तूर होते हैं निभाने के लिए ..........रेशम के कफ़न तो सबको नसीब होते हैं फिर विदाई की अंतिम बेला में कुछ तो दस्तूर बदलने चाहिए ............दर्द की किताब हो और आखिरी पन्ना फटा हुआ हो ...............उपन्यास का इससे सुखद अंत और क्या होगा ?

रविवार, 9 दिसंबर 2012

यादों की महकती शाम …………फ़र्गुदिया के नाम

अनुगूँज की गूँज बहुत देर तक सुनाई देती रहेगी ………सबने मिलना जो था 

फ़र्गुदिया के कार्यक्रम अनुगूँज मे अनामिका जी, वन्दना ग्रोवर, मुकेश मानस, अंजू शर्मा, असद ज़ैदी, अरुण कुमार शुक्ल, डाक्टर सुनीता कविता जी का कविता पाठ था जिसमें हम सबने शिरकत की और एक खुशनुमा शाम का आनन्द उठाया

 सरिता दास के साथ 


 संजू तनेजा अपने स्टाइल में :)


राजीव तनेजा जी 

कार्यक्रम की संचालिका और आयोजन कर्ता शोभा मिश्रा जी के साथ
संचालिका के पद को गरिमा देती शोभा जी का संचालन बेहद खूबसूरत रहा 
 वन्दना ग्रोवर जी का कविता पाठ शाम को महका गया 
क्षणिकाओं से शुरु होकर हास्य से भी मिलवा गया
पंजाबी कुडी ने रंग खू्ब जमा दिया 
जो पंजाबी कविता का तडका लगा दिया

 सीमांत सोहे्ल जी के साथ यादो भरी शाम


 दर्शकों बीच राजीव तनेजा

 वन्दना ग्रोवर का फूलों से स्वागत करते


असद ज़ैदी जी की कविताओं ने सोच को भी आईना दिखा दिया 

 पलों को सहेजते पल चेहरे से बयाँ हो रहे हैं 


 अनामिका …बस नाम ही काफ़ी है
कवितायें तो जैसे दू्सरे जहान से आयी हैं 
गहनता भी शरमा जाती है जब मौन मुखर होता है 

 ये हँसते मुस्कुराते लम्हे………हैं ना सहेजने योग्य

मज़ा तो यहाँ आया जब जो रोज़ बतियाते थे 
ना इक दूजे को पहचान पाये 
निशा कुलश्रेष्ठ , मृणाल के साथ 

 मुकेश मानस जी का स्वागत करते

 बलजीत जी के साथ राजीव तनेजा








 अंजू शर्मा कविता पाठ करते हुये 
जूते के जो गुणगान किये
सभी के चेहरे खिल गये




 आनन्द कुमार शुक्ल कविता पाठ करते हुये

 डाक्टर सुनीता कविता का स्वागत

  डाक्टर सुनीता कविता कविता पाठ करते हुये
स्त्री के अनेकों रूप का गुणगान कुछ ऐसे किया
हर स्त्री का चेहरा जैसे बयाँ हो गया 


 उपस्थित कविगण 

 एक शाम को कैमरे मे कैद करते राजीव तनेजा 







 सईद अयूब कार्यक्रम के आयोजक
 सरिता दास के साथ संजू तनेजा


 रविन्द्र के दास अपनी पत्नी के साथ 



चुलबुली  इंदु अनामिका जी का स्वागत करती


 इंदु, वन्दना ग्रोवर, सरिता दास, संजू तनेजा



 ओये होये किधर खो गये :)

 निशा के साथ 








 
 आखिर मे सईद अयूब जी ने समापन भाषण दे सबका आभार व्यक्त किया 


तो दोस्तों ये था कल की शाम का यादगार नज़ारा जहाँ काफ़ी नये चेहरों से परिचय हुआ तो साथ ही जिनसे रोज बतियाते हैं उनसे मिलने का भी लुत्फ़ उठाया ।
अंत मे राजीव तनेजा जी का आभार इन सुन्दर सुन्दर फ़ोटोग्राफ़्स के लिये अगर उन्होने ना लिये होते तो आज हम यहाँ आनन्द ना ले रहे होते :)

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

गर बच सके तो "कुछ" बचा लो

मिट रही है इंसानियत
बढ़ रही है हैवानियत
इंसानियत के नीलाम
 होने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो

बिक चुका  है जो जमीर

लालच हुआ अधीर
जमीर को बिकने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो

ये रगों मे लहू बन

रेंगते बेशर्मी के कीड़े
दरिंदगी की लाज शर्म भी
न जिन्हें रास आती
उन हैवानों की हैवानियत के
चंगुल में फंसने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो

चाहे मलाला हो

चाहे सोनाली हो
कट्टरपंथियों की नाक ना नीची हो
इस चरमपंथियों की गिरह से
बेबस मासूमों की
बलि चढ़ने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो

जो आधुनिकता की

भेंट चढ़ गयी हैं
संस्कारों की दौलत
उसे वस्त्रहीन होने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो

संस्कृति, संस्कार और सभ्यता 

एक सिक्के के दो पहलू
आज टके भाव भी न बिकते हैं
फिर भी आने वाली पीढ़ी के लिए
ईमान के इस खजाने को
नेस्तनाबूद होने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो


बस अपने हाथों में

इक ईमान की
इक सच्चाई की
इक इंसानियत की
इक इबादत की
कोई लकीर बना सको तो बना लो
खाली  हाथ आए
खाली ही जाना है
इस उक्ति को सार्थक
करने से पहले
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो
यारा ............
गर बच सके तो
"कुछ" बचा लो ..............

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

3 दिसम्बर ……ना भूली जा सकने वाली तारीख

नही भूल सकती आज का दिन
मेरी अबूझी पीडा में लगी एक फ़ांस
जो उम्र भर अब सिर्फ़ चुभती रहेगी
मगर पीडा को ना आकार दे पायेगी


जिसकी छाँव में जीवन गुजरा

पल पल कुसुम सा महका
और फिर एक दिन छीन लिया तुमने
आँखों से वो हर इक सपना
जो लहराता था एक बेटी के मनआँगन में
नेह का दरिया बनकर
जो था उसके जीवन का सम्बल
जहाँ जाकर भूल जाती थी वो
अपने जीवन की हर एक उलझन
जिसकी पनाह मे पाती थी
तुम्हारी गोद सा परम दुलार
कैसे कर देते हो तुम
जीवन का जीवन से बिछोह
जो तुम्हारा ही प्रतिरूप होता है
हर बेटी के जीवन की स्नेहमयी गुनगुनी धूप होता है
जिसकी छाँव तले वो निर्भय घूमा करती है
क्यों इतने निष्ठुर हो जाते हो 

जो उम्र भर का दर्द दे जाते हो
हे जीवनदाता ……क्यों आता है वो वक्त ज़िन्दगी में
जब छीन लेते हो तुम निज स्वरूप जीवनदाता को ……बेटियों से

जब तक स्वंय उस पीडा से ना गुजरो पीडा का आकलन नहीं कर सकते ।

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

मुझे ऐसा प्यार करना कभी आया ही नहीं

सुनो
जानते हो
मुझे प्रेम करना कभी आया ही नहीं
बस चाहतों ने सिर्फ़ तुम्हें चाहा
क्योंकि
तुम धुरी थे और मैं
तुम्हारे चारों तरफ़ घूमता वृतचित्र
कभी जो तुम्हें दिखा ही नहीं
तुमने महसूसा ही नहीं
बस वो ही त्याग किया मैने
क्या प्यार वहीं स्वीकृत है
जहाँ जताकर कुछ छोडा जाये
जहाँ बताकर अपने त्याग को
छोटा किया जाये
जहाँ जेठ की तपती धरती
अपने सेंक से तुम्हें भी तपा दे
जहाँ शून्य से भी सौ डिग्री नीचा तापमान हो
और तुम्हें अपनी कडकडाती हड्डियों
जकडी हुयी साँसों
पथरायी आँखों
का अहसास कराया जाये
तो क्या तभी प्यार होता है
सच जानम …………
मुझे ऐसा प्यार करना कभी आया ही नहीं

प्यार की खन्दकों में तेज़ाब भी खौलते हैं

फिर चाहे ऊपरी सतहें खामोश दिखती हों
इसलिये
सतही प्यार के फ़ूल खिलाने के लिये मैने वो आशियाना बनाया ही नहीं
लेकिन ये सच है ………जैसा तुमने चाहा
वैसा प्यार करना मुझे आया ही नहीं …………