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बुधवार, 28 मई 2008

पहचान औरत की

क्या औरत की ज़िंदगी हमेशा काँटों भरी ही रहेगी?हर औरत एक मुकम्मल जहाँ चाहती है मगर क्या उसे कभी mil पाता है उसका जहाँ?क्यों हर बार उसके साथ ही ऐसा क्यों होता है?एक औरत को उसका घर कभी नही milta चाहे क्यों न उसे सारी umra घर की मालकिन कहा जाए मगर क्या वास्तव में वो कभी घर की मालकिन बन पाती है?
आज हर जगह कम या ज्यादा औरत की यही हालत है.उसे हर जगह यही अहसास करवाया जाता है की वो एक औरत है तो चाहे पित के घर रहे या pita के हर काम के liye आज भी औरत को यही ahssas करवाया जाता है की जब वो अपने घर चली जाए तब जो चाहे करे मगर उसे ta-umra यह समझ नही आता की उसका घर कौन सा है kyunki pita कहते हैं की अपने pati के घर जो चाहे करना और जब pati के घर हो तो वो कहते हैं की pita के घर यह kiya कभी .ऐसे में कोई बताये की औरत का घर कौन सा है?क्या उसकी अपनी कोई शख्सियत नही होती ?आज भी कितना ही पढ़ लिख जाए मगर उसके नसीब में औरत होने का ठप्पा उसे कुच्छ भी अपनी मरजी से न करने के लिए क्यों मजबूर करता है?आज दुनिया चाहे कहीं भी पहुँच गई हो मगर इंसान की सोच आज भी वो ही है.purush आज भी नही बदला . उसकी सोच और उसकी मानसिकता आज भी वैसी ही है जैसी पहले थी .ऐसे में कैसे औरत ख़ुद को समाज में sthapit करे ?लोग कह सकते हैं की अपने हक के liye लड़े अपनी बात कहे मगर एक औरत का दर्द सिर्फ़ एक औरत ही समझ सकती है .आज औरत को घर और बाहर सब देखना होता है और अपनी गृहस्थी भी .ऐसे में अगर वो अपने हक के liye लड़ती है तो घर छूटता है जिसके liye उसने सारी ज़िंदगी दे दी और न लड़े तो hashra वोही होता है जो है आज भी .तो ऐसे में वो क्या करे,क्या कभी इस purushmay समाज में क्या कभी उसे भी वो मुकाम मिल पायेगा जिसकी वो हक़दार है?

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

अभी समय सब सहने का है,

सास बनोगी तब जानोगी।

जीवन के इन गलियारों को,

सही वक्त पर पहचानोगी।।