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शनिवार, 1 नवंबर 2008

जिसे खोजती हूँ गली गली
मुझी में छुपा है वो कहीं
यह जानती हूँ मगर
फिर भी उसे सामने
ला नही पाती
कैसे ढूँढूं ,किस्से पता मीले
कोई तो मिला दे मुझे
मेरे श्याम से
एक दर्श दिखा दे
नैना तरस रहे हैं
एक झलक को
कैसे मिलोगे
कुच्छ तो बताओ
कभी सपने में ही आ जाओ
कहाँ तुम्हें पाऊँ में
अब तो बता जाओ
जान पर बन रही है
मिलने की तड़प भारी है
कोई तो बताये कहाँ खोजूं
कैसे तुम्हें खोजूं
कहाँ मिलोगे
कब मिलोगे
कैसे मिलोगे
अब तो हार गई हूँ
अब आ के संभल लो

2 टिप्‍पणियां:

adil farsi ने कहा…

वन्दना जी आप से कविता लिखने मे कुछ शब्दों में गलती हो गयी है जैसे..किस्से-किस से, दर्श-दर्स ,कुच्छ-कुछ....

Rohit Tripathi ने कहा…

sundar rachna

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खो देना चहती हूँ तुम्हें..