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रविवार, 14 मार्च 2010

कोई तो जगे

अँधा हूँ मगर
आँख वालों को
आईना बेचता हूँ
शायद अपना अक्स
नज़र आ जाये
किसी को

गूंगा हूँ मगर
जुबान वालों को
शब्द बेचता हूँ
शायद कोई जुबाँ
के ताले खोले
कोई तो सत्य
की चादर ओढ़े

बहरा हूँ मगर
कान वालों को
गीत सुनाता हूँ
शायद सुनकर
किसी का तो
खुदा जगे
कोई तो वक़्त की
आवाज़ सुने

21 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आज तो बहुत ही सुन्दर शब्द चित्र लगाए हैं!
सोचने को विवश करते हैं!

यशवन्त मेहता "फ़कीरा" ने कहा…

काश कि इनकी भाषा सब समझ सकें

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

अँधा हूँ मगर
आँख वालों को
आईना बेचता हूँ
शायद अपना अक्स
नज़र आ जाये
किसी को
वंदनाजी
सुंदर बाते शब्दों के माध्यम से आपने कही है. अच्छी रचना के लिए आभार!
आपका अपना
महावीर बी सेमलानी

M VERMA ने कहा…

अँधा हूँ मगर
आँख वालों को
आईना बेचता हूँ
शायद अपना अक्स
नज़र आ जाये
किसी को

बहुत सुन्दर, इस समाज को आईने की सख्त जरूरत है

Mithilesh dubey ने कहा…

बेहद सुन्दर व भावपूर्ण रचना लगी ........

रश्मि प्रभा... ने कहा…

waah......bahut hi badhiyaa, jagane ka mul mantra

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

waah kya baat hai vandna ji
dhimi he sahi par kraanti to laaaunga ,,,,
rookte hi sahi par lax to paaunga ,,,
vo laakh mukre apne vaado se ,,,
par mai har pal yaad dilaaunga ,,,
saadar
praveen pathik
9971969084

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

Kya baat hai....achhi rachna hai!

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

मैंने कल सही कहा था ना कि आप बहुत ही उम्दा लिखने लगी है। उसका एक उदाहरण इस रचना में मिल रहा है।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

vandana ji,
is bar bhi aapne kamaal likha hai...

bahut he badhiya..

sangeeta swarup ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव.....सच कितने अंधे,गुने और बहरे हो गए हैं हम लोग....

विचारणीय रचना...बधाई

मनोज कुमार ने कहा…

विचारोत्तेजक!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

sach me ek aaina dikhati si hi kavita hai aaj to.. shreshth rachna

CS Devendra K Sharma ने कहा…

waah bahut khoob

viradhabhas ko bahut ache se pesh kiya hai!!

अँधा हूँ मगर
आँख वालों को
आईना बेचता हूँ
शायद अपना अक्स
नज़र आ जाये................very well thought

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

सच है इन्सान गूंगा, बहरा और अँधा ही तो बना हुआ है .....आईना दिखाती नज़्म ......!!

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही अच्छी नज़्म है...सच्चाई बयाँ करती हुई....आज इन्सान ना तो सच्चाई देखना चाहता है ,ना सुनना और ना ही बोलना...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सच्ची और अच्छी नज़्म...ढेरों बधाईयाँ..
नीरज

Suman ने कहा…

nice

suman ने कहा…

nice

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत ग़ज़ब की कोशिश है .... पर किसी के कान में जू नही रेंग़ेगी .... मोटी चॅम्डी के हैं सब ...