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बुधवार, 15 दिसंबर 2010

मुमकिन है तुम आ जाओ

जब चाँद से आग बरसती हो
 और रूह मेरी तडपती हो
मुमकिन है तुम आ जाओ

जब आस का दिया बुझता हो
और सांस मेरी अटकती हो
मुमकिन  है तुम आ जाओ

जब सफ़र का अंतिम पड़ाव हो
और आँखों मेरी पथरायी हों
मुमकिन है तुम आ जाओ 


अच्छा चलते हैं अब
सुबह हुयी तो
फिर मिलेंगे

38 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

वक्रोक्त में लिखी गई रचना का सौन्दर्य देखते ही बनता है!

अरविन्द जांगिड ने कहा…

सुन्दर रचना, साधुवाद.

मनोज कुमार ने कहा…

इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
आज की कविता का अभिव्‍यंजना कौशल

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना है...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

खुदा करे कि कयामत हो और तू आये।

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और नाज़ुक अभिव्यक्ति। बधाई।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

इंतज़ार इंतज़ार इंतज़ार .............
जी हाँ,मुमकिन हैं.......................

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

क्या बात है .....चाँद से आग बरसा दी.....आखिरी लाइन बिलकुल भी अच्छी नहीं लगीं.....एकदम अलग सी हो गयीं|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ओह ऐसी विरह कि ...चाँद भी आग बरसाने लगा ...चाँदनी जलाने लगी ....

जल्दी सुबह हो जो मिलने की आस बंधे ...और सूरज शीतल लगे

ajit gupta ने कहा…

उम्‍मीद पर ही दुनिया कायम है।

GirishMukul ने कहा…

Anokhee soch
badhaiyan

रश्मि प्रभा... ने कहा…

subah zarur hogi ...

यशवन्त ने कहा…

बेहतरीन!

सादर

Pratik Maheshwari ने कहा…

सुन्दर रचना.. काफी दिनों बाद कुछ पोस्ट किया आपने..

रजनी चालीसा का जप करने ज़रूर पधारें ब्लॉग पर :)

आभार

nivedita ने कहा…

वो सुबह कभी तो आयेगी ....

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

आशा पर आसमान टिका है और कितनी जिन्दगी इसी आशा के सहारे चल रही हैं. उसको बहुत सुंदर शब्दों में आपने व्यक्त किया है.

ehsas ने कहा…

बेहद संवेदनशील रचना। आभार

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

aash ki saans me hi to zindgi atki hai!
vyakul rachna.
bahut sundar.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

"aaye ya nahi????"...:)

kitna pyar hai, aapke shabdo me...

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

विरह व्यथा को कितने सुंदर शब्दों में ढाला है आपने!....मिलन की आस कितनी बलवती है!....

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!

संजय भास्कर ने कहा…

बेहतरीन रचना है...वंदना जी

Sunil Kumar ने कहा…

उम्मीद के सहारे जीने का मज़ा ही कुछ और है

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर रचना!

राजेश उत्‍साही ने कहा…

एक अच्‍छी भली कविता ने अंत में दम तोड़ दिया।

Kajal Kumar ने कहा…

अच्छा है जी

अरूण साथी ने कहा…

इन्तजार,,

वन्दना महतो ! ने कहा…

सुबह हुई तो फिर मिलेगे..... ख़ूबसूरत!

saanjh ने कहा…

mumkin hai tum aa jao......

bada khoob andaaz hai....khoobsurat nazm :)

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

dekho sab to aa gaye hain ....ab aur kiska intzar hai ...bata to do :)

रंजना ने कहा…

वाह ...वाह...वाह...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

वंदना जी, बहुत प्‍यारी कविता है। बधाई।

---------
प्रेत साधने वाले।
रेसट्रेक मेमोरी रखना चाहेंगे क्‍या?

"पलाश" ने कहा…

वंदना जी इसे संयोग ही कहेगें की आपकी "मुमकिन है तुम आ जाओ" मुझे अपनी " अब तो प्रियतम आ जाओ " के काफी करीब लगी जहाँ आपने कहा सुबह हुई तो फिर मिलेगे..
और हमने कहा
सूरज भी आने को है
अब तो प्रियतम आ जाओ ......

बहुत अच्छी रचना
आपसे भी एक जुडाव सा महसूस होने लगा है

mahendra verma ने कहा…

जब चांद से आग बरसती हो
और रूह मेरी तड़पती हो
मुमकिन है तुम आ जाओ।

मन के कोमल भावों को अभिव्यक्त करती अति सुंदर रचना।

डॉ. नूतन - नीति ने कहा…

vandna ji bahut pyari kavita hai... isi liye isey mai dubara charchamanch me rakh rahi hoon.. aapkaa abhaar..

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत ही खुब लिखा है आपने......आभार....मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित नई रचना है "प्रभु तुमको तो आकर" साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद

unkavi ने कहा…

sundar.....
wo sabah kabhi to aayegee.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

क्या प्रवाह है इस कविता में.. लहरों की तरह बलखाती कविता.. भावों का रेला है... सुन्दर कविता