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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

"दश पुत्र समां कन्या, यस्या शीलवती: सुता "


"दश पुत्र समां कन्यायस्या शीलवतीसुता 
कितना हास्यास्पद लगता है ना 
आज के परिप्रेक्ष्य में ये कथन 
दोषी ठहराते हो धर्मग्रंथों को
अर्थ के अनर्थ तुम करते हो 
नारी को अभिशापित कहते हो
दीन हीन बतलाते हो
मगर कभी झांकना ग्रंथों की गहराइयों में
समझना उनके अर्थों को
तो समझ आ जायेगा
नारी का हर युग में किया गया सम्मान
ये तो कुछ जड़वादी सोच ने 
अपने अलग अर्थ बना दिए 
और नारी को कहो या बेटी को या पत्नी को
सिर्फ भोग्या बना डाला 
सिर्फ अपने वर्चस्व को कायम रखने को
तुमने बेटी के अधिकारों का हनन किया
जबकि इन्ही ग्रंथों ने 
एक शीलवान कन्या को 
दस पुत्रों समान बतलाया 
तो बताओ कैसे तुमने
गर्भ में ही कन्या का गला दबाया
और पुत्र की चाहत को सर्वोपरि बतलाया

पुत्र भी कुल कलंकी होते हैं
बेटियां तो दो घरों को संजोती हैं
ये सब तुम्हारा रचाया व्यूह्जाल था 
जिसमे तुमने नारी को फंसाया था
समाज मर्यादा का डर दिखलाया था 
वरना नारी कल भी पूजनीय थी
वन्दनीय थी शक्ति का स्त्रोत थी
और आज भी उसकी महत्ता कम नहीं
बस अब इस सच को तुम्हें समझना होगा
धर्मग्रंथों का फिर से विश्लेषण करना होगा
क्यूँकि तुमने इन्हें ही नारी के खिलाफ हथियार बनाया था 
एक बार फिर से सतयुग का आह्वान करना होगा
और हर कथन का वास्तविक अर्थ समझना होगा 

16 टिप्‍पणियां:

"अनंत" अरुन शर्मा ने कहा…

वाह वंदना जी आपको प्रणाम , सही मुद्दा उठाया है आपने,
ज़माने से हटकर कुछ करना होगा,
जीना होगा या फिर मरना होगा.

सदा ने कहा…

गहन भाव लिए बहुत ही सशक्‍त अभिव्‍यक्ति ।

Sriprakash Dimri ने कहा…

शशक्त अभिव्यक्ति ..नारी को सबला बनना होगा......प्रेरक आह्वान ...सादर !!

गुड्डोदादी ने कहा…

अपने वर्चस्व को कायम रखने को तुमने बेटी के अधिकारों का हनन किया जबकि इन्ही ग्रंथों ने एक शीलवान कन्या को दस पुत्रों समान बतलाया तो बताओ कैसे तुमने गर्भ में ही कन्या का गला दबाया और पुत्र की चाहत को सर्वोपरि बतलाया पुत्र भी कुल कलंकी
बहुत सुंदर व्याख्या किस पंक्ति पर ना लिक्खुं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (22-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

naari utthan desh ka uthhan..:)

sangita ने कहा…

सशक्त अभिव्यक्ति

रचना ने कहा…

tum bas yuhi alakh jagaati raho
ham bas yuhi aa kar apna gyaan badhaatae rahaege

what a beautiful piece of work
keep it up

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

बहुत खूब वंदना....नारी के जीवन को समझाने के लिए

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सशक्त लेखन ...

Vinay Prajapati ने कहा…

उत्कृष्ट कृति

--- शायद आपको पसंद आये ---
1. अपने ब्लॉग पर फोटो स्लाइडर लगायें

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक मुद्दा उठाती सशक्त अभिव्यक्ति...

Rakesh Kumar ने कहा…

खूब कोसा है आपने वन्दना जी कन्या की अवहेलना
करने वालो को.

सार्थक और सशक्त प्रस्तुति.

मनोज कुमार ने कहा…

इस सामाजिक दंश को हम झेलने को विवश क्यों हैं?
इसके प्रति हर स्तर पर प्रतिकार होना चाहिए।

RAJWANT RAJ ने कहा…

stri vimarsh ko prtidhvnit krti ek sshkt rchna ke liye sadhuwaad .

JAI SHARAN ने कहा…

बहुत सार्थक मुद्दा