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गुरुवार, 21 मार्च 2013

आना चाहते हो ना इस पार

सुनो 
आना चाहते हो ना इस पार 
मेरे गमों को 
मेरे दर्द को 
अपने जीने की 
वजह बनाने को 
तो ध्यान से आना 
यहाँ बुझी चितायें भी 
शोलों सी भभकती हैं 
अरे रे रे संभलना ………
ये जो धार है ना अश्कों की
इन पर पाँव ज़रा संभल कर रखना
कहीं फ़फ़ोले ना पड जायें
और मेरे दर्द में
एक इज़ाफ़ा और कर जायें
जानते हो ना ………
मैं चाहे कितना सिसकूँ , तडपूँ
मगर तुम्हारी रूह पर
दर्द की हल्की सी लकीर भी गंवारा नहीं ………
यूँ भी अश्कों की धार पर चल
मंज़िल तक पहुँचने के लिये दहकते पलाश पार करने होते हैं
क्योंकि
बन्दगी के भी अपने आयाम हुआ करते हैं

12 टिप्‍पणियां:

कुश्वंश ने कहा…

बेहद गंभीर रचना , कहने को बहुत कुछ है शब्दों में बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

प्रेम भाव से सराबोर सुंदर रचना

manoj jaiswal ने कहा…

बेहतरीन कविता,आभ़ार।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बन्धन तो बन्धन होता है, सुखमय कैसे हो सकता है..

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

दर्द भी बहुत है

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

संभल कर आना... तुम्हारी ज़रा सी पीर भी सह्य नहीं. भावुक रचना, शुभकामनाएँ.

dr.mahendrag ने कहा…

prem ki bhavnaon se bhari kavita

Ratan singh shekhawat ने कहा…

बढ़िया रचना
घूरने के खिलाफ बने कठोर कानून के बाद

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... उनको एक चोट भी गवारा नहीं ..
प्रेम की इन्तेहा ...

Anita ने कहा…

इश्क का नया अंदाज...सुंदर कविता..

राजेश उत्‍साही ने कहा…

प्‍यार तो ऐसे ही किया जाता है...

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

गहन भाव लिए, कुछ ताने देती हुई , कुछ पीड़ा का अह्शाश करती हुई हमेशा की तरह एक और सार्थक रचना