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मंगलवार, 3 जून 2014

खुश हो लो ओ माताओं बहनों और स्त्रियों !!!

क्योंकि अभी नहीं हुई हमारे जुल्मों की इंतेहा
इसलिए 
अभी और होना है तुम्हें तिरस्कृत 
अभी और होना है तुम्हें बलात्कृत 
क्योंकि 
क़ानून हो या सत्ता 
संग हैं हमारे 
और तुम्हारे औजार हैं सब पुराने 
बस रोना गिड़गिड़ाना जानती हो 
ज्यादा से ज्यादा क्या 
जाओगी कानून के पास गुहार लगाने 
मगर वहां भी हम जैसों को ही पाओगी 
तो करती रहो शोर 
और दबती रहेंगी तुम्हारी आवाज़ें इसी तरह 
क्योंकि जानते हैं हम 
यहाँ नहीं बदला करते क़ानून 
ज़रा ज़रा सी बातों पर
 ( लड़के हैं गलती हो जाया करती है तो क्या उसके लिए फांसी दे दें )
इस सोच के नुमाइंदे जब तक 
हमारे साथ हैं तब तक 
ढूँढने हैं हमें अभी और नए नए तरीके 
सरिये औजार पत्थर बोतल 
तो हम भर चुके 
आंतें भी बाहर निकाल चुके 
पेड़ पर भी लटका चुके 
एसिड भी पिला चुके 
मगर नहीं भरा अभी हमारी अमानवीयता का घड़ा 
अभी बाकी है और जद्दोजहद 
हमारी मानसिकता की 
क्योंकि हम वो कालसर्प हैं जो मौत से भी नहीं डरा करते 
हा हा हा के दंश से ही उपजती हैं हम में क्रूर ऋचाएं 
इसलिए 
जब तक नहीं कर लें हम ईजाद 
नयी संभावनाएं तुम्हारे शोषण की 
तब तक बची हो तुम …… खुश हो लो ओ माताओं बहनों और स्त्रियों !!!

3 टिप्‍पणियां:

Shalini Rastogi ने कहा…

सही में , ये अत्याचारी पता नहीं क्रूरता की किस पराकाष्ठा पर जाकर रुकेंगे ... मर्मस्पर्शी रचना|

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

Unknown ने कहा…

Aap ki rachna marm sparshi to hai hi sath hi aatyachaar ke khilaf ek nayab koshish bhi hai or es aandolan me hum aap ke sath hai aap ko sadhuwad