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बुधवार, 30 जुलाई 2014

पड़ावों के शहरों में आशियाने नहीं बना करते …

इतनी कसक 
इतनी कशिश 
और इतनी खलिश 
कि  नाम जुबान पर आ जाए 
तो 
कभी इबादत 
कभी गुनाह 
तो कभी तौबा बन जाए 
और एक जिरह का पंछी 
पाँव पसारे 
बीच में पसर जाए 

जहाँ न था कभी 
हया का भी पर्दा 
वहां अभेद्य दीवारों के 
दुर्ग बन जाएं 
तो क्या जरूरी है 
शब्दों को गुनहगार बनाया जाए 
कुछ गुनाह मौत की नज़र कर दो 
अजनबियत से शुरू सफर को 
अजनबियत पर ही ख़त्म कर दो 
जीने को इतना सामाँ काफी है 
कि  सांस ले रहे हो तुम 
हर प्रश्नचिन्ह के बाद भी 

वैसे भी पड़ावों के शहरों में आशियाने नहीं बना करते ……… 

9 टिप्‍पणियां:

Anusha Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति

Misra Raahul ने कहा…

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति।
नई रचना : इंसान

Anita ने कहा…

जिरह से कोई बात कभी बनती नहीं देखी गयी..सुंदर रचना

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत भावपूर्ण लाज़वाब प्रस्तुति...

Misra Raahul ने कहा…

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति।
नई रचना : सूनी वादियाँ

Smita Singh ने कहा…

वाह क्या बात है। बेहद सुन्दर लिखा है आपने

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज गुरुवार ३१ जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- कलम के सिपाही को नमन– ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ...
एक निवेदन--- यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें.
सादर आभार!

Prasanna Badan Chaturvedi ने कहा…

बेहद उम्दा...
@मुकेश के जन्मदिन पर.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

बहुत सुन्दर .....