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सोमवार, 1 जून 2015

कसैलेपन के स्वाद के साथ

सच कहूँ तो 
अब तुमसे कोई भी 
सवाल करने का मन ही नहीं करता 

बदलाव की प्रक्रिया में हैं हम दोनों ही 
शायद इसीलिए अब फिर से 
एक अजनबियत तारी होने लगी है 

तुम्हें जानकार भी 
शायद अब तक जान नहीं पायी 
और पूरी तरह शायद जान भी न सकूँ 

क्योंकि 
रोज रंग बदल जाती है इंसानी फितरत 
फिर कैसे संभव है 
उम्मीद की डोर का एक सिरा तुम्हें पकड़ा 
हो जाना निश्चिन्त 

अपने अपने किनारों पर चलते हुए भी 
साथ रहना हमारी नियति है 
एक दूरी और एक साथ के बीच कहीं बचा है एक रिश्ता 
तो उसे बचाए रखने को 
कटिबद्ध हैं हम दोनों ही 
फिर चाहे अजनबियत के छोर रोज अपने पाँव सुरसा से बढाए जा रहे हैं 

चुक चुकी हूँ अब 
रोज रोज की खिटपिट से बेहतर है 
अजनबियत की गोद में बैठ सफ़र को मंजिल तक पहुँचाना 

अब फर्क नहीं पड़ता है 
मिश्री की डली के साथ नीम चबाने में 
जुबाँ तो कब की सारे स्वाद भूल चुकी है 

कसैलेपन के स्वाद के साथ  
मैं खुश हूँ अपने निविड़ अंधेरों में .........


5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन में सुख दुख बराबर से आते हैं, सबके हिस्से में।

महेश कुशवंश ने कहा…

उन्हें मयस्सर नही अंधेरे भी ,
जो रोशनी बुझाये बैठे है ,
फर्क इतना है उन्हें हम अपना बनाए बैठे हैं

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ek ajeeb sa sanwaad liye hue kavita ..
bahut kuch chuppaye hue aur bahut kuch kahti hui ..
badhayi ji

KAHKASHAN KHAN ने कहा…

बहुत ही शानदार पोस्‍ट।

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जब तक जीने की चाह हो जीते रहें , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !