पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

गुरुवार, 18 जून 2015

ओ काले गुलाब ........




यूँ तो अनेक रंगी होना 
तुम्हारा सौन्दर्य है 
उसमे लाल रंग प्रेम का प्रतीक कहा गया 
मगर कभी देखा है खुद को श्याम रंग में 
देखना जरा 
लाल से ज्यादा श्याम रंग में दिल को बहुत लुभाते हो

वैसे पता है न 
कृष्ण भी काले ही थे ........और तुम भी

और सुनो 
नज़र का टीका भी काला ही होता है 
और आँख का काजल भी 
गाल पर तिल भी 
केशों का रंग भी 
और श्याम घन भी

जरूरी तो नहीं न प्रतीक बन सिमटे रहना 
कुछ पंक्तियों में 
कुछ शब्दों में 
या कुछ अक्सों में

सौन्दर्य के प्रतिमान तो
श्याम रंग में ही ज्यादा निखर कर आते हैं 
बस देखने वाले की नज़र में मोतियाबिंद न हो

रहस्यवाद की असीम परतों में छुपे होने पर भी 
अपने सौन्दर्य से रिझाना कोई तुमसे सीखे 
ओ काले गुलाब ........

( अभी इस काले गुलाब को देख उपजा ख्याल )

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (19-06-2015) को "गुज़र रही है ज़िन्दगी तन्‌हा" {चर्चा - 2011} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा है दी ..हमेशा की तरह

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

jyoti khare ने कहा…

गुलाब वह भी काला
नयें प्रतीक को लेकर लिखी बेहद प्रभावी रचना
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई

आग्रह है-- होना तो कुछ चाहिए
आप मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों