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मंगलवार, 21 जुलाई 2015

लेखन कभी भी उम्र का मोहताज नहीं होता ........

रजनी गुप्त जी की वाल पर एक आलेख पढ़ा जिसमे उन्होंने भी वो ही मुद्दा उठाया हुआ था जो मैं पिछले कुछ सालों से सोच रही थी तो आज अपने दिल की बात कहने का मौका मिल गया :


  साहित्य में बहुत से लोग लेखन एक उम्र के बाद ही शुरू 

करते हैं तो उन्हें किस श्रेणी में रखा जाएगा वरिष्ठ या 

युवा? मान लो किसी ने शुरू ही ४० की उम्र में लेखन किया 

हो तो उसे किस दृष्टि से देखा जायेगा युवा या वरिष्ठ ?



अब सोचने वाली बात है कि जब उसने लिखना ही देर से 

शुरू किया तो पहचान भी देर से ही मिलेगी और छपेगा भी 

देर से ही तो ऐसे में वो यदि अपना पहला संग्रह ज्ञानपीठ 

या हिंदी अकादमी आदि में देना चाहे तो भी नहीं दे सकता

 क्योंकि वहां तो नवलेखन की अधिकतम उम्र ही ४० है ? 

या बहुत सी ऐसी जगह देखीं जहाँ यदि कोई पुरस्कार या 

सम्मान किसी कृति को देना है तो भी उम्र सीमा ४० है तो 

ऐसे में वो तो कोई भी राह नहीं चुन सकता ? बहुत से 

लेखकों को इन्ही वजहों से मन मसोसते हुए अक्सर देखा 

जाता है जब वो कहते हैं कि यार उम्र से मात खा गए वर्ना 

हम भी साहित्यकार थे काम के और ये बात होती भी उतनी

 ही सही थी जितनी संजीदगी से वो कहते क्योंकि उनका 

लेखन होता ही ऐसा है लेकिन सिर्फ उम्र के कारण सही 

मूल्यांकन नहीं हो पाता .


क्या जरूरी नहीं इन मुद्दों पर वरिष्ठ साहित्यकारों और

 अकादमियों को सोचना चाहिए और एक लेखक के लेखन
 
की उम्र से महत्त्व देना चाहिए न कि लेखक की उम्र से ?



अभी कुछ दिनों पहले कहीं पढ़ा था कि एक लेखक ने अपना लेखन ही ८० वर्ष की उम्र में शुरू किया था तो उसे किस श्रेणी में रखा जाए और किस दृष्टि से क्योंकि उम्र के हिसाब से वरिष्ठ हैं तो लेखन के हिसाब से युवा तो क्या ये उचित नहीं कि साहित्य में लेखक की उम्र और उसके लेखन की उम्र में फर्क किया जाए क्योंकि लेखन कभी भी उम्र का मोहताज नहीं होता ........ लेखन शक्ति तो एक बच्चे में भी हो सकती है और एक बुजुर्ग में भी लेकिन किसने लेखन को उच्चता प्रदान की ये ज्यादा मायने रखता है क्योंकि हो सकता है एक वरिष्ठ का लेखन उतना परिपक्व न हो जितना एक युवा का . तो क्यों न ये देखा जाए कौन कितने वक्त से लिख रहा है और क्या लिख रहा है ? क्या उसका लेखन देश समाज को सही दिशा देने में सक्षम है ? यदि ऐसे प्रश्नों पर कोई खरा उतर रहा है उसी हिसाब से उसके लेखन की उम्र का आकलन करते हुए युवा या वरिष्ठ की श्रेणी में रखा जाये तो ये साहित्य के लिए एक बेहतर स्थिति प्रदर्शित करेगा और प्रतिभा का समुचित आकलन भी किया जा सकेगा . 

5 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 22 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Rangraj Iyengar ने कहा…


आपने और रजनी जी ने तो मुद्दा उठाया है.

यहां लेकन की गुणवत्ता के अलावा उम्र बाीच में दखल क्यों देने लगा.
शायद आप का सवाल उनसे है जो उम्र के अनुसार रचनाएं चुनते हैं - पुरस्कृत करने के लिए.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (22-07-2015) को "मिज़ाज मौसम का" (चर्चा अंक-2044) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

लेखक का उम्र से भी रिश्ता होता है आज तक तो नहीं सोचा कभी :)

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बेह्तरीन