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बुधवार, 24 अगस्त 2016

मोहब्बत का पीलापन

मेरी मोहब्बत के अश्क
जज़्ब ही हुए
बहने को जरूरी था
तेरी यादों का कारवाँ

लम्हे ख़ामोशी से समझौता किये बैठे हैं
इंतज़ार की कोई धुन होती तो बजाती

इतनी खाली इतनी उदास मोहब्बत
ये मोहब्बत का पीलापन नहीं तो क्या है ?

और ये है मोहब्बत का इनाम
कि
अब तो आह भी नहीं निकलती

मेरी मोहब्बत के रुसवा होने का अंदाज़ ज़माने से कुछ जुदा ही रहा 
फिर उस इश्क का इकतारा कैसे बजाऊँ
जिसके सब तार टूट चुके हों 
 
आमीन कहने को जरूरी है कोई इक दुआ .........
 


1 टिप्पणी:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25 - 08 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2445 {आंतकवाद कट्टरता का मुरब्बा है } में दिया जाएगा |
धन्यवाद