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बुधवार, 1 मार्च 2017

मेरे फुफकारने भर से

मेरे फुफकारने भर से 
उतर गए तुम्हारी 
तहजीबों के अंतर्वस्त्र 
सोचो 
यदि डंक मार दिया होता तो ?

स्त्री 
सिर्फ प्रतिमानों की कठपुतली नहीं 
एक बित्ते या अंगुल भर नाप नहीं 
कोई खामोश चीत्कार नहीं 
जिसे सुनने के तुम 
सदियों से आदि रहे 
अब ये समझने का मौसम आ गया है 
इसलिए 
पहन लो सारे कवच सुरक्षा के 
क्योंकि 
आ गया है उसे भी भेदना तुम्हारे अहम् की मर्म परतों को…… ओ पुरुष !

2 टिप्‍पणियां:

संजय भास्‍कर ने कहा…

.. बहुत सुन्दर, प्रसंशनीय!!!

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 02-03-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2600 में दिया जाएगा
धन्यवाद