पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

ये चुके हुए दिनों की दास्ताँ है

ये चुके हुए दिनों की दास्ताँ है

जहाँ चुक चुकी थीं संवेदनाएं
जहाँ चुक चुकी थीं वेदनाएं
जहाँ चुक चुकी थीं अभिलाषाएं
तार्रुफ़ फिर कौन किसका कराये

जहाँ चुक चुके थे शब्द
जहाँ चुक चुके थे भाव
जहाँ चुक चुके थे विचार
उस सफ़र का मानी क्या ?

एक निर्वात में गोते खाता अस्तित्व
किसी चुकी हुई डाल पर बैठे पंछी सा
न कहीं जाने की चाह
न कुछ पाने की चाह
न कोई कुंठा
न कोई दंभ
किसी भभकी हुई सिगड़ी पर
कोई लिख रहा हो प्रेमगीत

न अजान न प्रार्थना न गुरवाणी
समय के दुर्भिक्ष में फँसा
चुकने की कीमत अदा करता
कोई पीर पैगम्बर नहीं
कोई मुर्शिद नहीं
एक आम आदमी था वो

समय अपनी कौड़ियाँ वहीं फेंकता है जहाँ जमीन नम होती है
कि
चुकना समय की जीत का सबसे बड़ा पुरस्कार जो ठहरा 
 
आओ जश्न मनाएं ...

1 टिप्पणी:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 10 फरवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!