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शनिवार, 4 जून 2011

देह की देहरी लांघी तो होती

सिर्फ देह की देहरी को ही
न पूजा होता
कभी इससे भी ऊपर
उठा होता
कभी देह की देहरी को
लाँघ पाया होता 
तो शायद इन्सान 
बन पाया होता
इस देहरी के पार
इक बार झाँका होता
तो मन का हर 
पता पा गया होता
वो जो इसी दहलीज पर
टूटता बिखरता रहा 
उस रिश्ते को कुछ तो
संभाल पाया होता
इसकी चौखटों पर टंगे
ख्वाबों की जलन को
जान पाया होता
कुछ पल उस ऊष्मा 
में खुद को झुलसाया होता
तो शायद  दर्द सहने का 
सलीका जान पाया होता
बेजुबान अश्रुकणों को 
कभी ऊँगली लगायी होती
तेज़ाब के कहर से
तेरी आँख भर आई होती
तू इक पल कभी 
वहां रुका होता तो 
मन के कोने में पड़ी
अपनी खंडित प्रतिमा
देख पाया होता
और जो सैलाब बरसों से
रुका पड़ा था
हर तटबंध को तोड़ता
तेरे आगोश में 
सिमट आया होता
बस सिर्फ एक बार तूने
देह की देहरी लांघी तो होती       

28 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

सच कहा है.संवेदनशील अभिव्यक्ति.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहतरीन!

सादर

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

नमस्कार वन्दना जी,
ये रचना देह की देहरी को कभी लांगा तो होता बहुत पसंद आयी है,
उसकी भी मजबूरी होगी जो ना लांघी, ना इन्सान बन पाया,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेम तो मन के आँगन में ही पल्लवित होता है।

रजनीश तिवारी ने कहा…

बहुत अच्छी रचना ...

मीनाक्षी ने कहा…

मर्मस्पर्शी....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

स्त्री की देह ही नहीं ... देह से परे बहुत कुछ होता है , जहाँ प्यार ख्याल एहसासों की तहरीर होती हैं , लिखे होते हैं कुछ अनगाये गीत , लहराती हैं कुछ कोपलें , बया के घोसले सा होता है एक ख्याली घर , जिसमें सपनों के खिलौने होते हैं ....

Vivek Jain ने कहा…

वाह,संवेदनशील अभिव्यक्ति
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Richa P Madhwani ने कहा…

http://shayaridays.blogspot.com

मनोज कुमार ने कहा…

संवेदनाओं को अभिव्यक्ति मिली है, एक शे’र याद आ गया, शायद इस कविता से संबंधित न भी हो फिर भी ..

कब से दरवाज़ों को दहलीज़ तरसती है ‘निज़ाम’
कब तलक़ गाल को कोहनी पे टिकाये रखिए

कुश्वंश ने कहा…

बेजुबान अश्रुकणों को
कभी ऊँगली लगायी होती
तेज़ाब के कहर से
तेरी आँख भर आई होती

देह से परे भी जहाँ है और वही असली जहाँ है समझने की संवेदनशीलता कहाँ से लाये ये असंवेदनशील प्राणी, उसे तो समझाना ही गोगा और आप बखूबी कर रही है, बधाई

anupama's sukrity ! ने कहा…

स्त्री के मन की गहराई दर्शाती हुई सुंदर रचना ....!!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत भावपूर्ण....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बेजुबान अश्रुकणों को
कभी ऊँगली लगायी होती
तेज़ाब के कहर से
तेरी आँख भर आई होती

बहुत संवेदनशील रचना ... गहन अभिव्यक्ति .. इससे आगे ही तो कदम नहीं बढते ..

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत सुंदर भावाव्यक्ति , बधाई .....

SACCHAI ने कहा…

" ek sanvedan shil abhivyakti "

M VERMA ने कहा…

सिर्फ एक बार तूने
देह की देहरी लांघी तो होती
यह देहरी ही शायद बाधा है विदेह पथ में

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत संवेदनशील रचना..देह तो एक प्रतीक है...इसे प्रतीक बना आपने बढ़िया नारी मन की विवेचना की है...बहुत सुन्दर कविता...

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति , बधाई वंदना जी।

ZEAL ने कहा…

There is a beautiful world waiting beyond flesh. Only an enlightened person can sense that fragrance.

Maheshwari kaneri ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति् सुन्दर भाव…..….धन्यवाद

Maheshwari kaneri ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति्....

Dr Varsha Singh ने कहा…

शब्द-शब्द संवेदना भरा है...

Atul Shrivastava ने कहा…

सुंदर रचना....

आपकी रचना ने एक प्रसिध्‍द गजल की यादें ताजा कर दीं...

''जिस्‍म की बात नहीं है उनके दिल तक जाना है... लंबी दूरी तय करने में वक्‍त तो लगता है''

prerna argal ने कहा…

istree ke dard ko bayaan karati hui samvedan sheel rachanaa.badhaai sweekaren.



please visit my blog.thanks.

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही गहरी और संवेदनशील अभिव्यक्ति

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही गहरी और संवेदनशील अभिव्यक्ति

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर.....इस पोस्ट के लिए सलाम आपको......शरीर के बंधन से मुक्त होकर ही कोई मन तक पहुँचता है .....पर एक रास्ता इससे भी आगे जाता है और अंतिम पढाव तो वही है.....शानदार |