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गुरुवार, 16 जून 2011

गर तूने ख्वाहिश की होती

तू खुश रहा वीरानों में
जगलों में पहाड़ों में
कभी ज़िन्दगी के
तो कभी
महफ़िलों के
हाँ महफ़िलों के भी
वीराने होते हैं
जब महफ़िल बाहर होती है
और दिल वीरान होते हैं
तू क्या समझता है
तेरे दिल की वीरान पगडंडियाँ
और वहाँ खड़े शुष्क पेड़ अरमानों के
तेरे अकेलेपन के गवाह
मुझे नहीं दीखते
अरे मेरी आँख की वीरानियों से
ही तो तेरी राहें गुजरती हैं
और छोड़ जाती हैं
अंतहीन निशाँ तेरी
हसरतों के
जिन्हें मैं अपनी पलकों
की कोरों पर सजा लेती हूँ
और करती हूँ इंतज़ार
उस पल का जिस दिन
तू खुद मुझसे मांगे
अपने सपनों को
अपनी ख्वाहिशों को
सच कहती हूँ………
तोड़ लाती चाँद आसमाँ से
गर तूने ख्वाहिश की होती

29 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

करती हूँ इंतज़ार
उस पल का जिस दिन
तू खुद मुझसे मांगे
अपने सपनों को
अपनी ख्वाहिशों को ... poora ho intzaar

सदा ने कहा…

तोड़ लाती चांद आसमां से

गर तूने ख्‍वाहिश की होती ...

वाह .. बहुत खूब कहा है
इन पंक्तियों में ..बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव सुन्दर अभिव्यक्ति पूर्ण रचना...

कुश्वंश ने कहा…

सच कहती हूँ………
तोड़ लाती चाँद आसमाँ से
गर तूने ख्वाहिश की होती

कुछ देने का नाम ही जिन्दगी है , मांगने से मिलता नहीं कुछ भी , देने से भर जाता है सारा जहाँ . बेहतरीन शब्दांकन बधाई

Anita ने कहा…

प्रिय के लिये चाँद को तोड़ कर लाने की ख्वाहिश बहुत मासूम है और दिल की गहराई से निकली है... आमीन !

यादें ने कहा…

चाहत की गहराई ...अंतहीन !
शुभकामनाएँ !

prerna argal ने कहा…

जिन्हें मैं अपनी पलकों
की कोरों पर सजा लेती हूँ
और करती हूँ इंतज़ार
उस पल का जिस दिन
तू खुद मुझसे मांगे
अपने सपनों को
अपनी ख्वाहिशों को
सच कहती हूँ………
तोड़ लाती चाँद आसमाँ से
गर तूने ख्वाहिश की होतीbahut hi sunder prastuti dil ko choo gai,badhaai aapko.

shikha varshney ने कहा…

हाँ महफ़िलों के भी
वीराने होते हैं.
क्या बात कही है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मुझे नहीं दीखते
अरे मेरी आँख की वीरानियों से
ही तो तेरी राहें गुजरती हैं

और करती हूँ इंतज़ार
उस पल का जिस दिन
तू खुद मुझसे मांगे
अपने सपनों को
अपनी ख्वाहिशों को

बहुत खूब ...सुन्दर अभिव्यक्ति ...

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι ने कहा…

और इन्तज़ार करती उस पल का जिस दिन
तू ख़ुद मुझसे मांगे अपने ख़्वाबों को अपनी ख़्वाहिशों को। बेहतरीन ख़यालात।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता... सपनो का सुन्दर चित्रण....

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

bahut sundar, intjaar aur intjaar ...............

Arunesh c dave ने कहा…

आज तक चांद तोड़ लाने के वादे पुरूषो ने ही किये थे बधाई आप इस मामले मे विश्व की प्रथम महिला बन गयी हैं :)

PK Sharma ने कहा…

kya kehne vandna ji ke

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

M VERMA ने कहा…

हाँ महफ़िलों के भी
वीराने होते हैं
यकीनन .. खूबसूरत रचना

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut hi sunder abhivakti...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

औरों के मन में क्या है, कैसे पता चले?

निर्मला कपिला ने कहा…

कुछ रुहानी एहसास कहने के नही होते बस समझ लिये जाते हैं बिना कहे। अच्छी रचना। शुभकामनायें\

विजय रंजन ने कहा…

Sach mein Vandana ji..khwahishein khwab hain jinko poora karne ke liye prayas karna parta hai...par prayas karne ke liye khwahishein to hon dil mein...

Kailash C Sharma ने कहा…

तोड़ लाती चाँद आसमाँ से
गर तूने ख्वाहिश की होती...

लाज़वाब...बहुत खूबसूरत प्रस्तुति..

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

Manish Kr. Khedawat ने कहा…

dil se likhi ek behtareen rachna

______________________________
मैं , मेरा बचपन और मेरी माँ || (^_^) ||

राजनेता - एक परिभाषा अंतस से (^_^)

अजय कुमार ने कहा…

खूबसूरत भाव से सुसज्जित सुंदर रचना ।

mahendra verma ने कहा…

अरे मेरी आँख की वीरानियों से
ही तो तेरी राहें गुजरती हैं

इन पंक्तियों का काव्य सौष्ठव देखते ही बनता है।
बहुत ही सुंदर।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Bahut khoob ...

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) ने कहा…

कुछ ऐसी ही भावनाएं है अंतर्मन में..छू गयी उन्हें आपकी ये रचना..धन्यवाद आपका.. :)

आशुतोष की कलम ने कहा…

समर्पण की पराकाष्ठा

नश्तरे एहसास ......... ने कहा…

तोड़ लाती चाँद आसमाँ से गर तुने ख्वाहिश जो की होती.....

कुछ शब्दों ने ही दिल के दर्द को कह डाला....

वाह बहुत सुंदर लिखा है आपने:):)