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शनिवार, 2 जुलाई 2011

कैलेण्डर ज़िन्दगी का

 

दोस्तों 
ये कविता जुलाई माह के गर्भनाल अंक मे छपी है और अभी तक आपने इसे पढा भी नही है तो आज ये आपके समक्ष है। 


33 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

और फिर एक दिन कैलेण्‍डर बदल जाता है...

वाह ...बिल्‍कुल सही कहा है इस पंक्ति में ...रचना प्रकाशन की बहुत-बहुत बधाई ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब ...ज़िंदगी का अलग अंदाज़ पेश करने का ...

Rakesh Kumar ने कहा…

दुनिया अजब सराये फानी देखी
हर चीज यहाँ की आनी जानी देखी
जो जा के न आये वो जवानी देखी
जो आ के न जाये वो बुढ़ापा देखा.

और फिर बुढ़ापे के बाद कैलेण्डर बदल दिया जायेगा.
एक नया कैलेण्डर जारी हो जायेगा
आईये इस खुशी/गम में मिलकर गायें.

'बस आज की रात है जिंदगी
कल तू कहाँ मैं कहाँ '

शिखा कौशिक ने कहा…

बहुत सुन्दर ... .आभार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सारगर्भित कविता, बधाई।

रजनीश तिवारी ने कहा…

samay calander ki tareekhon ke saath bitataa chala tata hai . bahut sundar rachna .

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत खूब ...रचना प्रकाशन की बहुत-बहुत बधाई

रविकर ने कहा…

बहुत-बहुत बधाई ||

prerna argal ने कहा…

bahut sunder jindagi ko alag andaaj main prastut karane ke liye.badhaai aapko.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

sabse pahle to badhai:)
hamari shubhkamnayen hai ki aap hindi se juri sabhi patrikaon me sthan payen...:)
aur mujhe lagta hai ki aapke rachna me ye kuwwat bhi hai..:)

waise jindagi aur calender dono sayad sahchar shabd hi to hain...dono ko badalna hai...:)

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

sabse pahle to badhai:)
hamari shubhkamnayen hai ki aap hindi se juri sabhi patrikaon me sthan payen...:)
aur mujhe lagta hai ki aapke rachna me ye kuwwat bhi hai..:)

waise jindagi aur calender dono sayad sahchar shabd hi to hain...dono ko badalna hai...:)

Dr Varsha Singh ने कहा…

फिर एक दिन कैलेण्‍डर बदल जाता है...

सच है...
बहुत सुन्दर कविता.

नश्तरे एहसास ......... ने कहा…

बहुत खूब कहा है आपने कैलेंडर की तरह ज़िन्दगी भी बदल ही जाती है,

आभार!!

shikha varshney ने कहा…

गर्भनाल में ही पढ़ लिया है :)
बहुत सुन्दर कविता है.

कुश्वंश ने कहा…

खूब कहा ,जिन्दगी एक कलेंडर ही है, दिन, महीने साल ,छुट्टी, लला हरे पीले नीले रंग जिन्दगी ही तो है वाह प्रकाशित कविता के लिए बधाई

शारदा अरोरा ने कहा…

sach kahaa ...bahut bahut badhaaee..

Vivek Jain ने कहा…

बहुत सुन्दर कैलेण्‍डर, ज़िंदगी का अलग अंदाज़
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

ईं.प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बहुत अच्छी रचना |
कृपया मेरे ब्लॉग में भी पधारें |

www.pradip13m.blogspot.com

अजय कुमार ने कहा…

सही तस्वीर ,बधाई

कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा ने कहा…

कैलेंडर की प्रतीकात्मक व्याख्या सुंदर लगी ,..बधाई

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut bahut badhaai

मनोज कुमार ने कहा…

ज़िन्दगी का यह सफ़र यूं ही चलता रहता है कटता रहता है।
बेहतरीन रचना।

sushma 'आहुति' ने कहा…

bilkul sahi kaha apne... jinvan nirantar chalta hi rahta hai..

Arunesh c dave ने कहा…

बधाई के साथ अनुरोध भी कर रहा हूं कि अब समय वीर रस मे देश प्रेम से ओत प्रोत कविताएं लिखने का आ चुका है आप भी इस ओर अग्रसर हों

mridula pradhan ने कहा…

han sach men zindgi bilkul calender ki tarah hi hoti hai,roz ek naya panna......khul jata hai.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी यह रचना वाकई में बहुत सुन्दर है!
गर्भनाल पत्रिका में प्रकाशन के लिए बधाई स्वीकार करें!

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri ने कहा…

बहुत ही सुन्दर ...जीवन का परिवर्तनशील कलेंडर ..सुन्दर रचना शुभ कामनाएं...

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपकी रचना 'कैलेण्डर जिंदगी' का बहुत ही अच्छा लगा।
धन्यवाद।

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत खूब ! सच में ज़िंदगी एक कलेंडर से बिलकुल अलग नहीं है..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..आभार

दिगम्बर नासवा ने कहा…

हमने तो गर्भनाल में भी पढ़ लिया था ... आज फिर पढ़ लिया ... बहुत बहुत बधाई ...

Anita ने कहा…

बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें!

Sanat Pandey ने कहा…

GAJAB KA KALENDER HAI MAM

Sanat Pandey ने कहा…

KYA BBA HAI