पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लॉग से कोई भी पोस्ट कहीं न लगाई जाये और न ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

सोमवार, 11 जुलाई 2011

देखा है तुमने कहीं जलता आशियाँ?

मेरे मन की वसुधा पर
अब घास उगती ही नही
फिर किस नेह जल से
सिंचित करोगे और किसे
देखो ना…………
हरियाली भी दम तोड चुकी है
और जमीन इतनी बंजर हो चुकी है
भावों की खेती भी नही होती
देखा है तुमने कहीं जलता आशियाँ?

34 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

हरियाली भी दम तोड चुकी है
और जमीन इतनी बंजर -- कमाल का एक्सप्रेशन .. वाह

नीरज गोस्वामी ने कहा…

फिर किस नेह जल से सिंचित करोगे....वाह...अद्भुत शब्द और भाव....
नीरज

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

कम शब्दों में गंभीर कविता... बहुत सुन्दर

रश्मि प्रभा... ने कहा…

jab mann ke srot sookh gaye to ab prashn kahan kaisa kisse

Rakesh Kumar ने कहा…

वंदना जी शुभ शुभ बोलिए.
बरसात का मौसम है.
हरियाली का दम तोड़ेंगीं तो सूखा पड़ जायेगा.
मन की मत पूछियेगा.
मन में ही आनंद का सागर भी लहरा रहा है.
जरा आवाहन कीजियेगा,सुखद बरसात न हो तो कहना.जब पद्मनाभं मंदिर में खजाना मिला है,
तो मन-मंदिर के खजाने का तो कोई ओर छोर ही नहीं है.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

Anita ने कहा…

बहुत सुंदर !
जलता आशियाँ ही नहीं हमने तो परमात्मा का सागर भी देखा है जो आज भी सींच रहा है आपके मन की वसुधा को ही नहीं हरेक के मन की धरा को तभी तो बार बार हार कर भी मन जीत जाता है...

शिखा कौशिक ने कहा…

gahan bhavon ko abhivyakt kiya hai .aabhar

Kailash C Sharma ने कहा…

और जमीन इतनी बंजर हो चुकी है
भावों की खेती भी नही होती....

बहुत मर्मस्पर्शी और भावपूर्ण..कमाल के अहसास..आभार

shobhana ने कहा…

दिल को छूती कविता |

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

संवेदना को झकझोर गयी आपकी कविता !
आभार !

रविकर ने कहा…

बधाई ||
अच्छी प्रस्तुति ||

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहरा।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

:)...
gahri soch ke saath likhi gayee...rachna..

राकेश कौशिक ने कहा…

क्या बात कही है - गागर में सागर

मनोज कुमार ने कहा…

घास की खूबी है कि वह पत्थर पर भी उग आती है, शायद इसीलिए ‘ नेह जल से सिंचित ’ किया जा रहा होगा।

बेनामी ने कहा…

इतना दर्द.......सुभानाल्लाह|

सदा ने कहा…

भावों की खेती भी नहीं होती .. यह पंक्ति लाजवाब ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

जब बंजर जमीन में इतने शब्द उग रहे हैं
तो जब उर्वरा होगी भूमि तो रचनाओं की बाढ़ निश्चितरूप से आ जाएगी!

कुश्वंश ने कहा…

मेरे मन की वसुधा पर
अब घास उगती ही नही

गंभीर कविता... बहुत सुन्दर , आभार.

रजनीश तिवारी ने कहा…

बहुत ही सुंदर

sushma 'आहुति' ने कहा…

खुबसूरत प्रस्तुती....

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

bahut udas rachna ..door door tak udaasi chhayi hai ...!!

Manish Kr. Khedawat ने कहा…

dil ke dard ko alfazo mein bahut khoob piroya hai :)
________________________________
राजनेता - एक परिभाषा अंतस से ||

S.N SHUKLA ने कहा…

Sundar, ati sundar, badhai

बेनामी ने कहा…

kya kehna..aapka

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

भावों की रिक्तता को कहती अच्छी प्रस्तुति

अभिषेक मिश्र ने कहा…

न्यूनतम शब्दों में अद्भुत अभिव्यक्ति. काफी प्रभावित किया आपकी रचना ने. आभार.


अंबेडकर और गाँधी

संजय भास्कर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार....!

vijay ने कहा…

bahut achchi kavita.

vijay ने कहा…

bahut achchi kavita ...sadhuvad

vijay ने कहा…

bahut achchi kavita.sadhuvad...

Maheshwari kaneri ने कहा…

सुन्दर और भाव पूर्ण प्रस्तुति के लिए आभार...

Vivek Jain ने कहा…

हरियाली भी दम तोड चुकी है
और जमीन इतनी बंजर
कमाल के भाव,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/