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बुधवार, 20 जुलाई 2011

चलिए आपसे मिली आखिरी सौगात उम्र भर याद रहेगी .

दोस्तों
समझ नहीं आता दुनिया कैसी है ? क्या सही बात का जवाब देना हंगामा कहलाता है ? कोई हमसे कुछ पूछे और हम यदि उसकी बात का जवाब दे दें तो क्या वो गलत बात है ? और खास कर जब आपको सब जानते हों और सब आपसे कुछ कह रहे हों तो क्या उनकी बात का जवाब ना देकर चुप रहना गलत नहीं होगा? क्या ये उन सबके प्रति अन्याय नहीं जिन्होंने आपको इतना चाहा हो, इतना मान दिया हो इतना स्नेह दिया हो ...........क्या उन सबके किसी प्रश्न का जवाब देना गुनाह है ..........उसे हंगामा कह देना कहाँ तक उचित है ? उसी में यदि कोई किसी बात का इशु बना रहा हो तो उसे भी सही ढंग से बात कह देना क्या गलत है क्योंकि इसी तरह गलतफहमियां पैदा होती हैं कुछ लोग दो लोगों के बीच इसी तरह गलतफहमियां पैदा कर देते हैं और यदि उस बात का जवाब दे दिया तो क्या गुनाह किया?
आप सब जानते हैं काफी वक्त से मैं चर्चामंच से जुडी रही . अब पिछले कुछ वक्त से मुझे लग रहा था कि मैं अब ढंग से चर्चा नहीं कर पाऊँगी तो इस बात का संकेत कई महीनों पहले से शास्त्री जी को देने लगी थी तो उनका कहना था कोई नहीं जब तक कर सकती हो करती रहो.............अब पिछली चर्चा सोमवार १८ जुलाई को लगायी जिसमे मैंने अपने जाने के संकेत सभी पाठकों को दे दिया ताकि कल को सब ये ना कहें कि आपने मेरी पोस्ट नहीं ली चर्चा मंच पर क्योंकि काफी पाठक कहते हैं इसलिए सूचित करने में क्या बुराई है ये सोच सबको लिख दिया जो शास्त्री जी को पसंद नहीं आया जब मैंने उन्हें चैट पर सूचित किया तो कहने लगे वहाँ क्यूँ लिखा तो मैंने यही बात कही तो कहने लगे इसलिए मैंने आपकी पोस्ट का शीर्षक नहीं बदला.........चलो कोई बात नहीं उसके बाद मैंने जब सभी पाठकों के कमेंट्स पढ़े तो उनमे से कुछ पाठकों ने तो मेरे पास भी अलग से भेजे और कुछ वहीँ देखे कि आप मत जाइये या आप पुनर्विचार करिए तब मैंने सोचा कि मुझे अपने जाने के कारणों को सबको बता देना चाहिए उन्हीं में एक कमेन्ट रविकर जी नए चर्चाकर हैं उनका था जिन्होंने मेरी एक पोस्ट निर्मल हास्य का जिक्र करके मेरे जाने को उससे जोड़ना चाहा अब तो जवाब देना बहुत जरूरी बन गया था कि कहीं इस वजह से गलतफहमियां ना हो जायें क्यूँकि मेरे और शास्त्री जी के बीच ऐसी कोई बात थी ही नहीं और इस तरह की बात तो विवाद को जन्म दे सकती थी या ग़लतफ़हमी कर सकती थी जिसका जवाब मैंने  सिर्फ उन्ही लोगों को दिया जिन्होंने मुझे रुकने के लिए कहा था ना कि हर टिप्पणीकर्ता को जो इस प्रकार था...........
दोस्तों

सबसे पहले तो मै सबको ये बताना चाहती हूँ कि आजकल मेरी व्यस्तता कुछ ज्यादा बढ गयी है जिस वजह से मै कोई काम सही ढंग से नही कर पा रही हूं जिस वजह से मैने ये निर्णय लिया है इसमे कोई ऐसी वैसी बात नही है क्योंकि मैने एक नयी श्रंखला शुरु की है एक प्रयास पर जिसके लिये मुझे काफ़ी वक्त चाहिये होता है उसे ऐसे ही तो नही लिखा जा सकता और इसका संकेत तो मै शास्त्री जी को काफ़ी वक्त से दे रही थी कि मै अब ज्यादा वक्त नही दे पाऊँगी ये सब कोई अचानक नही हुआ है और दूसरी बात अगले छह महीनो तक मेरा कथाओ मे जाना लगातार होना हैजिस वजह से भी मुझे बहुत मुश्किल होगी इसी कारण मैने ये निर्णय लिया है………जहाँ तक रविकर जी आप उस हास्य कविता की बात कर रहे हैं तो वो सिर्फ़ एक निर्मल हास्य ही है उसका इससे कोई लेना देना नही है क्योंकि शास्त्री जी तो खुद सक्रिय रहे हैं हमेशा तो उनके लिये क्यों कहा जायेगा…………हास्य को आप इस दृष्टि से देखकर सबके दिलो मे गलत संदेश दे रहे है जो गलत बात है………सब यही सोचेंगे कि मेरे और शास्त्री जी के बीच कोई अनबन हो गयी है जबकि हमारे बीच ऐसी कोई बात नही है सबकी अपनी मजबूरीयां होती हैं अगर शास्त्री जी चाहेंगे तो जब मै इन सबसे फ़्री हो जाऊँगी तो दोबारा भी सक्रिय होने का प्रयत्न करूँगी।
ये जानकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई कि मुझे मेरे पाठक दोस्त कितना चाहते हैं उन सबकी मै तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
 
अब बताइए इसमें मैंने ऐसी कौन सी बात कह दी जिससे हंगामा होने की वजह बन सकती थी?
क्या रविकर जी को इस बात को इस तरह कहना चाहिए था.........यूँ तो शास्त्री जी ने मेरी १८ जुलाई वाली पोस्ट अपने चर्चामंच से हटा दी है मगर मैंने अपने trash बॉक्स में से रविकर जी की वो टिप्पणी  निकाली है ताकि सच सबको पता चल सके जो इस प्रकार थी -----------

रविकर has left a new comment on your post "हो सकता है विदाई का वक्त आ रहा हो ……चर्चा मंच":

हो सकता है विदाई का वक्त आ रहा हो ||

शीर्षक कुछ समझ नहीं आया बन्दना जी |
क्या कोई संकेत दिख रहा है ??
हो सकता है ----
इस हो सकता है को कौन सुनिश्चित करता है ?
कृपया हमें भी संकेत समझने का संकेत देकर उपकृत करें || सादर ||


हाँ याद आया--
शुक्रवार ८ जुलाई को आप ने निर्मल हास्य प्रस्तुत किया था |
क्या यह संकेत तभी प्राप्त हो गया था |

मुझे इसलिए याद है --
क्योंकि मैंने भी टिप्पणी लिखी थी ||
नया हूँ कृपया मार्ग-दर्शन करें ||

ब्लॉगर ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आद. वंदना जी,
चर्चाकार की व्यथा बयान करती निर्मल हास्य की कविता बहुत अच्छी लगी ,शायद इसलिए भी कि इसमें सच्चाई की खुशबू भी समाहित है !
आभार !

८ जुलाई २०११ १०:०० पूर्वाह्न
ब्लॉगर रविकर ने कहा…

आपका हार्दिक अभिनन्दन ||

आभार ||

८ जुलाई २०११ १०:२७ पूर्वाह्न
हटाएं
ब्लॉगर Dr Varsha Singh ने कहा…

हर कोई तुझे सिर्फ
चर्चाकार ही बुलाएगा
और तू अपना असली नाम भूल जायेगा
पर व्यवस्थापक तो मौज उडाएगा
सबसे बढ़िया जुगाड़ है ये
सबको काम पर लगा देना
और खुद नाम कमा लेना


बहुत खूब...
करारा कटाक्ष....

८ जुलाई २०११ १०:४६ पूर्वाह्न
ब्लॉगर यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आपकी एक पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

८ जुलाई २०११ १०:४९ पूर्वाह्न
ब्लॉगर संतोष कुमार ने कहा…

vandana ji bilkul sahi kaha hai.

Aabhaar !!

८ जुलाई २०११ ११:३२ पूर्वाह्न
ब्लॉगर यादें ने कहा…

मिठाई में लपेटी,कड़वी सच्चाई .
वन्दना जी ,बधाई हो बधाई ||
शुभकामनायें !



Posted by रविकर to चर्चा मंच at July 18, 2011 4:39 PM

अब निर्मल हास्य को कोई इस तरह घसिटेगा ये तो मैं सोच भी नहीं सकती थी और उन्होंने आज हमारे बीच ग़लतफ़हमी कर दी मगर
मेरे दिल में ऐसी कोई बात नहीं थी तो मैंने सिर्फ सही बात कहकर बात ख़तम कर दी मगर मुझे अब लगता है कि शायद ग़लतफ़हमी तो पैदा कर दी गयी है शास्त्री जी के मन में ...........क्यूँकि उनका एक मेल मुझे मिला जिसमे उन्होंने मुझे इस तरह धमकाया है जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो सच कहकर...........जो उन्होंने मुझे भेजा है वो इस प्रकार है.............


वन्दना जी!
जाने वाले ढंढोरा पीट कर नहीं जाते!
आप इस तरह से मेल क्यों भेज रहीं हैं?
इससे आपका अभिप्राय क्या है?
आप चर्चा मंच पर चर्चाकार के रूप में आयी आपका आभार!
मगर चली गईं हैं तो इतने हंगामें की क्या जरूरत है?
आखिर आप इस तरह से क्या साबित करना चाहती है ?
क्या आपके बिना चर्चा मंच बन्द हो जाएगा या आप जब यहाँ नहीं थी तो क्या चर्चा मंच पर पोस्ट नहीं लगती थी?
शुभकामनाएँ!

--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
Phone/Fax: 05943-250207, Mobiles: 09368499921, 09997996437
Website - http://uchcharan.blogspot.com/

आज ये पढ़कर इतना दुःख हुआ कि पूछिये मत ..........आँख में आँसू आ गए कि सही बात को लोग किस दृष्टि से देखते हैं ..........मुझे भी पता है कि ना मेरे आने से या जाने से कहीं कोई फर्क नहीं पड़ने वाला..........ये तो शास्त्री जी एक छोटी सी जगह है मगर ये दुनिया इतनी बड़ी है जब इसे मेरे रहने ना रहने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला तो चर्चामंच के बारे में मैं ऐसा क्यूँ सोचूंगी? आपको इतना बुरा लगा कि आपने ऐसा सोच लिया और मेरी वो पोस्ट भी अपने मंच से हटा दी इसका क्या मतलब निकलता है? आप ही बता दें ? हाँ , आपके इस व्यवहार से मेरा दिल जरूर टूटा है क्यूँकि मैंने जब तक चर्चामंच लगाया दिलोजान से लगाया चाहे कितनी भी मजबूरी रही मगर काम किया ये सोच कर कि एक जिम्मेदारी है हमारी और आज भी ये जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभा पाऊँगी यही सोचकर मना किया मगर रविकर जी ने जिस तरह बात बनाई और उसका आपने क्या अर्थ निकाला ये आप जाने मगर आपने उन्हें कुछ नहीं कहा बल्कि मुझमे ही दोष दिखा दिया............चलिए ये भी सीख लिया कि कैसे यहाँ की दुनिया में जीना है...............

आपने तो आज के चर्चामंच पर भी हमें ही कसूरवार ठहरा दिया ये कहकर की 

मुझे गर्व है कि आज हमारे पास ऐसा एक भी चर्चाकार नहीं है जो आपसे यह कहे कि आप चर्चा मंच पर आयें और ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ!
हाँ इतना जरूर है कि यदि किसी के ब्लॉग की चर्चा इस चर्चा पत्रिका में की जाती है तो यदि चर्चाकार चाहे तो वह सूचित कर सकता है कि आपके ब्लॉग की पोस्ट का लिंक हमने चर्चा मंच पर लगाया है। मगर यह बाध्यता नहीं होनी चाहिए कि लोग आयें और अपने सुझावों से हमें अवगत कराएँ या हमारा हौसला बढ़ाएँ!



अगर सबको सूचित करना बुरा था तो आप हमें पहले ही हटा देते तो ज्यादा अच्छा था मगर आज तो आपने बता दिया कि आपके दिल में हमारे लिए कितनी जगह रह गयी है मुझे तो काफी लोग कहा करते थे कि चर्चा में ऐसा नया करो वैसा करो मगर मैं कह देती थी कि शास्त्री जी का ब्लॉग है उनसे कहिये यदि वो कहेंगे तो कर दूंगी मगर आपको तो हमारा इस तरह सबसे कहना भी बुरा लगा जानकर आज दिल हद से ज्यादा दुखा है
चलिए आपसे मिली आखिरी सौगात उम्र भर याद रहेगी .

आज बस दिल इस ब्लॉगजगत से इतना दुखा है जितना पहले कभी नहीं दुखा कम से कम शास्त्री जी जैसे इन्सान से मुझे ये उम्मीद नहीं थी कि वो मुझसे ही इस तरह का व्यवहार करेंगे जिनके लिए मेरे दिल में इतना मान सम्मान है ........अगर सरल मन से सच कह देना गुनाह है तो हाँ मैंने गुनाह किया है ...............और अब यहाँ के किसी भी ब्लॉग से जुड़ने का मन ख़त्म हो गया है इसलिए यशवंत जी से अनुरोध है कम से कम वो तो मुझे अपनी हलचल से विदा दें क्यूँकि मैं इससे ज्यादा गम नहीं झेल सकती ...........दिल दुखता है ऐसी बातों से ...........जितने भी ब्लोग्स के साथ जुडी हूँ उन सबसे अनुरोध है मुझे अपने ब्लॉग के admin अधिकारों से अलग कर दें अब सिर्फ मैं अपने ब्लोग्स पर ही लिखूंगी.............

45 टिप्‍पणियां:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

हिंदी ब्लॉग्गिंग में यदि ऐसा ही चलता रहा तो हिंदी ब्लोगिंग का 'विवाद' का पर्याय रह जायेगा... मुझे ब्लोगिग में आये कोई दो वर्ष हुए हैं और इन दो वर्षो में कितने ही विवाद देख चूका हूँ.. सच को सच कहने से तो तूफ़ान खड़ा हो जाता है.. शब्दों के मायने बदल जाते हैं... बातचीत के सन्दर्भ बदल दिए जाते हैं... कई व्यंग्य तो मुझे पर भी लिखे जा चुके हैं... मुझे तो एक प्यारा सा नाम भी दिया जा चूका है... ब्लॉग्गिंग के पुरेधाओं को समझाना चाहिए कि हिंदी ब्लोगिंग की रचनाएं अभी मूल धारा के साहित्य से काफी कमजोर है... अभी जरुरत है ब्लोगर को सही मार्गदर्शन और मिल कर काम करने की.. एक विवाद से ब्लोगिंग कई मील पीछे चला जाता है... वंदना जी तो एक प्रतिष्ठत ब्लोगर हैं... नए ब्लोगरों को प्रोत्साहित करती हैं... सबके ब्लॉग पर पहुँचती हैं.. मेरा निजी अनुभव है कि मेरी प्रारंभिक पाठिकाओं में से एक हैं वे.... उनके नाम के साथ कोई विवाद जुड़ेगा कभी ऐसा लगता नहीं था मुझे... खैर... अपने ब्लॉग पर सक्रिय रहे और साहित्य की साधना करें इस कामना के साथ...

राजेश उत्‍साही ने कहा…

जो कुछ हुआ अच्‍छा नहीं हुआ। पर वंदना जी यह भी कहते हैं जो होता है भले के लिए होता है। हो सकता है आपके श्रीकृष्‍ण जी इसमें भी कोई हित देख रहे हों।
*

आप इस कदर दुखी न हों। पर जिस तरह से आप अपने निजी जीवन में रिश्‍ते बनाने में सावधानी बरतती हैं मुझे लगता है वह सावधानी आपको यहां भी बरतने की जरूरत है। और फिर यह अभासी दुनिया भी हमारी वास्‍तविक दुनिया का ही तो प्रतिबिम्‍ब है। यहां भी सब तरह के लोग हैं ही । बस हमें कभी कभी पहचानने में देर लगती है। कोई बात नहीं देर आयद दुरुस्‍त आयद।
*

आपने यह आग्रह किया ही है कि जहां भी आप सामूहिक ब्‍लाग में हैं,वहां से अपने आपको अलग कर रही हैं। मुझे लगता है यह एक अच्‍छा कदम है। पर फिर भी यह कहूंगा कि सामूहिक ब्‍लाग में होना अच्‍छी बात है, पर यहां भी चुनाव में सावधानी बरतें तो बेहतर है।
*

और हम हर कदम पर आपके साथ हैं। हमारा स्‍नेह और शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

वंदना

relax हो जाओ

जिंदगी में लगभग 95% झगडे सिर्फ और सिर्फ ग़लतफ़हमी के कारण ही होते है .
शांत हो जाओ .
कुछ दिनों के लिये सब कुछ लिखना पड़ना बंद कर दो .. मन ठीक हो जायेगा , फिर से शुरू कर देना.

हिंदी ब्लॉगजगत को तुमसे जो भी contribution मिला है .. वो सभी को मालुम है . इस तरह कि छोटी मोती बाते , उस contribution पर नहीं धुल डाल सकती है ..

सब कुछ ठीक हो जायेंगा जी ..

बस कुछ दिन प्रभु जी की कथा में ध्यान लगाओ , क्योंकि ये दुनिया भी उसकी , ये ब्लॉगजगत भी उसका , ये ब्लॉगर भी उसके .. सबको सद्बुद्धि वही दे सकता है ,

तुम तो बस कुछ दिनों के लिये सब बंद कर दो , देखना , सब ठीक हो जायेंगा ,
हरे कृष्ण हरे राम

आपका
विजय

सदा ने कहा…

वंदना जी,

आपकी यह पोस्‍ट बहुत कुछ सोचने का मजबूर करती है ..इसमें कोई दो राय नहीं की आपने ब्‍लॉग जगत में जहां भी सहयोग किया बहुत ही लगन व मेहनत से किया ..आज यह स्थिति निर्मित हुई जिसकी वजह से आप दुखी हैं पढ़कर अच्‍छा नहीं लग रहा ..अक्‍सर ऐसा हो जाता है जाने-अंजाने ..आप सिर्फ वही करें जो आपको सुकून दे अपने दिमाग में किसी भी तरह का तनाव मत रखें ..शुभकामनाओं के साथ ।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

vandana ,

jis katha ke liye tumne charcha manch chhoda hai vah bahut badi niyamat hai. ham jo rasta chunate hain jaroori to nahin ki usa par jeevan bhar chalte hi rahen. halat insaan ko kahan se kahan panhucha dete hain.
kisi kee baton ko dil par mat lo. abhi jahan bahut bada hai aur jeevan bhi pata nahin ham kitane path apanayen aur kitane apane aap hi chhodane pad jaayen. aarop aur pratyaropon se darate nahin hain.
phir tum jaisi bahadur insaan agar aisa karegi to phir kya hoga? bhool jao jo bhi hua.
beeti tahi bisar de, aage ki sudhi le.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

जाने वाले ढिंडोरा पीटकर नहीं जाते। जग की रीत तो यही है कि लोग अचानक चले जाते हैं!
चर्चा मंच पर कितने ही लोग आये और चले गये।
फिर आपको यहाँ से जाना इतना बुरा क्यों लगा।
खुशामद करने की मेरी आदत नहीं है। जब तक जिसका जी चाहे खुश होकर चर्चा करे। अन्यथा मैं तो स्वयं ही सक्षम हूँ!
आवागमन तो लगा ही रहता है।
मैंने भी "चर्चा हिन्दी चिट्ठो की" पर बहुत सेवा की थी मगर जब छोड़ा तो किसी से कोी शिकवा नहीं किया।
संगीता स्वरूप जी भी तो चर्चाकार थी और बहुत मन से चर्चा करतीं थी। मगर जब उनकी इच्चा न हुई चर्चा की तो सादर विदा हो गईं। न कोई शोर-शराबा और न कोई हंगामा।
मेरी शुभकामनाएँ हमेसा आपके साथ हैं मगर मैं दिल में कुछ नहीं रखता। साफ कहना मेरा स्वभाव है।
आपके पास मेरा फोन नम्बर है, इतना ही नहीं फेसबुक और गूगल टॉक भी आप बात नही कर सकतीं थीं मुझसे।
आपका पोस्ट लगा कर लोगों को क्या बताना है? इसका मतलब तो यह हुआ कि आप सीधे-सीधे चर्चा मंच की और मेरी भी शत्रु हो गईं हैं!

वन्दना ने कहा…

@arun chandra roy ji, @rajesh utsahi ji, @vijay ji, @sada ji, @ rekha ji

मेरी तरफ़ से कोई मनोमालिन्य नही है सिर्फ़ इतना चाहती थी कि कुछ लोग गलतफ़हमियाँ कैसे पैदा कर देते हैं उनसे बचकर रहा जाये कम से कम मेरे बाद आने वाले और लोग तो जान ही जायें कि कैसी दुनिया है ब्लोगजगत की कि अच्छे दोस्तों को भी गलतफ़हमियों मे डाल देती है…………हाँ इंसान हूँ तो दिल तो दुखता ही है क्योंकि कोई भी काम यदि तन और मन से करो और उसका ये प्रतिफ़ल मिले तो एक बार दिल दुखता है मगर कोई बात नही ये जानती हूँ ये दुनिया ऐसी ही है इसलिये सिर्फ़ कुछ दिन लगेंगे या शायद कुछ घंटे इससे उबरने मे…………मेरे दिल मे अब भी शास्त्री जी के लिये कोई मैल नही है बस दिल दुखा कि आज मै इतनीबुरी हो गयी ये सोचकर्………बाकि ना उनके लिये सम्मान मे कमी आयेगी ना विचारों मे…………रही बात ब्लोगजगत की तो जानती हाँ यहाँ की दुनिया को इतने सालों से……………फिर भी आप सब दोस्तों की शुक्रगुजार हूँ जो मुझे अपनी बातो से इतना हौसला दिया…………रेखा जी आप सही कह रही है ये भी उसी की लीला का ही कोई भाग है और मै भी इसी मे विश्वास करती हूँ जो होता है अच्छे के लिये होता है………आप सबका हार्दिक धन्यवाद।

वन्दना ने कहा…

@shastri ji
मैने आपको क्या कहा है बताइये मैने तो यहीकहा ना जो रविकर जी ने कहा और उनकी बात का जवाब दिया मगर आपको वो भी नागवार गुजरा यहाँ तक कि आपने वो पोस्ट ही हटा दी चर्चा मंच से …………मैने तो अपने आप छोडा है और अपनी मुश्किले बता दी थीं आपको मगर आपने ही मुझे इस तरह कटघरे मे खडा कर दिया जैसे मैने कोई गु्नाह किया हो रविकर जी को जवाब देकर्…………ना मै आपकी दुश्मन हूँ ना ही चर्चामंच की ये गलतफ़हमी आप मत पालिये…………लेकिन सच को तो सच ही कहूँगी ना उससे तो नही हट सकती ना।

एम सिंह ने कहा…

जिसकी जितनी सोच होती है, वह उसी के मुता‍बिक चीजों को समझता है.

दुनाली पर देखें-
अन्‍ना को मनमौन की जवाबी चिट्ठी

shikha varshney ने कहा…

वंदना जी ! ऐसे दिल छोटा करेंगी तो कैसे चलेगा.जब हम अपना काम पूरी इमानदारी से करते हैं तो वहाँ किसी के भी कुछ भी कहने का फरक नहीं पड़ना चाहिए.
जहाँ तक सुझाव मांगने की बात है.मुझे नहीं लगता ये कोई गुनाह है.प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से हर कोई अपने काम का फीडबेक चाहता है.और बाध्यता को किसी पर भी नहीं है.
दुनिया बहुत बड़ी है और बहुत कुछ होता रहता है ..बस अपना मार्ग निर्धारित कीजिये और चरैवेति चरैवेति....
आप एक अच्छी रचनाकार हैं.बस अपना धर्म निभाइए.रिलेक्स....

रविकर ने कहा…

आप नाराज न हों |
मेरी तरफ से कोई गलत फहमी पैदा नहीं की गई ||
शीर्षक " हो सकता है विदाई का वक्त आ रहा हो ---"
यह आप ने लिखा ||

इससे दोहरा "संदेह" व्यक्त हो रहा है | इसी बात पर मैंने लिखा ||

सारे विवाद कि जड़ हूँ --स्वीकार

पर यह मुखड़ा आप का है और-----
इसमें मैंने व्यर्थ बुद्धि लगाईं ||

सारे ब्लाग जगत से
सहानुभूति मिल रही है स्वीकार करे |

मेरा मंतव्य आपको दुखी करना नहीं था |

आपका शीर्षक आप जाने ||

मनोज कुमार ने कहा…

हर चीज़ में एक गुड होता है जी।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

devi:)
shanti shanti!!
ye to duniya hai ma'm!! jisme ham jab tak dost hote hain, ek dusre ki khubhi dekhte hain...aur jaise hi rashta alag sa najar aata hai...ek dusre ke liye mangadhant baaten kahi jati hai.........!
par haan ek pratishthik blogger jisko ham jaise navedit log follow karte hain, unke saath aisa dekh kar andar se dukh hota hai...!!

वन्दना ने कहा…

@ravikar ji

यदि आपको मुखडा समझ नही आया था तो सिर्फ़ उतना लिखकर ही मुझसे पूछ सकते थे मगर आपने तो मेरी हास्य कविता को इस तरह यहाँ बलि का बकरा बना दिया जिसने गलतफ़हमी पैदा कर दी…………हास्य और व्यंग्य मै अक्सर लिखती रहती हूँ सभी जानते हैं और ये सिर्फ़ किसी एक के लिये कभी नही लिखा जाता आप भी जानते है तो आपको क्या जरूरत थी उसे वहाँ इस तरह उल्लखित करने की जिससे गलत संदेश जाये…………आपके एक गलत काम की वजह से आज शास्त्री जी ये सोचने लगे कि जैसे मैने सच कहकर गलती कर दी…………उन्होने आपको कुछ नही कहा कि आपने ऐसी विवादास्पद बात वहाँ क्यो लिखी अगर आपको कहा होता और पोस्ट नही हटायी होती तो भी कोई बात नही थी मगर आपकी जगह सिर्फ़ मुझमे दोष दिखाना तो गलत था ना…………कभी भी कोई बात कहिये सोचकर कहिये ताकि बाकी लोगो तक तो गलत संदेश ना जाये।

ये मंच मैने खुद छोडा है तो इसमे मुझे क्यो तो दुख होगा और क्यो मै हंगामा चाहूँगी ये सोचने वाली बात है…………लेकिन यदि मुझ पर बेवजह इल्ज़ाम लगेगा तो मै उन लोगो मे से भी नही हूँ जो सिर झुकाकर सहन कर ले……………सच सबको बताना फिर जरूरी हो जाता है…………

सारे ब्लाग जगत से
सहानुभूति मिल रही है स्वीकार करे |
आपका शीर्षक आप जाने ||
ये शब्द अभी आपने ही कहे हैं ना…………मुझे सहानुभूति की कोई जरूरत नही है और ना ही मैने ये सब सहानुभूति के लिये किया है ये सब इसलिये लिखा है ताकि बाकी लोगो को भी पता चले कि कैसे गलतफ़हमियाँ पैदा की जाती हैं ………आपने तो अब भी व्यंग्यात्मक लहजे मे बात कही है……………नुकसान तो आप कर ही चुके हैं दो दोस्तों के बीच का…………अब कोई क्या जानेगा और क्या करेगा…………शुक्रिया आपका

Shah Nawaz ने कहा…

वंदना जी,

अक्सर अपनों के बीच गलत फहमियां हो जाया करती हैं, गम ना करें.... जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा....

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी आपको शायद याद हो ...मैंने आपके निर्मल हास्य पर भी यही टिप्पणी की थी मैं कोशिश करता हूँ की इस चर्चा वगैरह से बचकर रहू.......जहाँ चार बर्तन इकट्ठे होते हैं वहां आवाज़ ज़रूर आती हैं.......आप एक अच्छी इंसान हैं मैं जनता हूँ की आपको सहानुभूति की कोई आवश्यकता नहीं है........ये बात तो अब सर्वविदित है की ब्लॉगजगत में मीडिया की तरह बात को तोड़-मरोड़ के पेश किया जाता है.........हाँ आपकी बात सही है इंसान हैं तो दिल तो दुखता ही है.....आप अपना काम ईमानदारी से करती रहिये.......सच कहने वालों पर दुनिया ने हमेशा ही सितम ढाएं हैं........दुनिया की परवाह मत कीजिये.........कुछ तो लोग कहेंगे...लोगों का काम है कहना........मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वंदना ,
इन समस्त घटनाओं पर केवल अफ़सोस ही प्रकट किया जा सकता है ..हर इन्सां की सोच अलग होती है ,
किसी के रहने या न रहने से दुनिया ख़त्म नहीं होती ..यह सभी जानते हैं...दुनिया भी चलती है और चर्चा मंच भी चलेगा ..
चर्चाकार अपनी किसी मजबूरी के कारण ही चर्चा करना छोड़ता है .. इतने समय तक साथ काम करने के बाद यदि रूखा व्यवहार मिलता है तो मन ज़रूर दुखी होगा .. पर जो होता है अच्छे के लिए होता है ..यही सोच कर अपने सृजन में मन लगाओ ..

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आहत मन को राहत प्रदान करने के कुछ सूत्र
1. जो होता है सदैव अच्‍छे के लिए होता है । हो सकता है ऐसा होने से और बुरा होना टल गया हो।

2. होनी को कोई नहीं टाल सकता।

3. मन से किसी भी बात को मत लगाएं।

4. सदैव शांत और प्रसन्‍न रहें।

5. अंत में, यह भी जान लें कि विध्‍वंस प्रवृत्ति के लोगों की संख्‍या कम होती है, पर अधिक गहरा असर करती है। उससे अवश्‍य बचें।

शुभ वर्तमान :-)

Dr. shyam gupta ने कहा…

"---ब्लॉग्गिंग के पुरेधाओं को समझाना चाहिए कि हिंदी ब्लोगिंग की रचनाएं अभी मूल धारा के साहित्य से काफी कमजोर है..".
--राय साहब की उपरोक्त टिप्पणी एक दम सटीक है....अभी ब्लॉग्गिंग एक नवीन विधा है, बचपन में है.....यहाँ उपस्थित बहुत से ब्लोग्गर जो कुछ कहानियां, पुरस्कार, या पत्रिकाएं संपादित करके.स्वयं को साहित्यकार समझने में लगे हैं .. एक दूसरे को उस्ताद ब्लोग्गर, महान ब्लोगर, आचार्य, शास्त्री आदि नाम से एक दूसरे की पीठ थपथपाने में लगे हैं जबकि बात बिलकुल सही है कि अभी सारे ब्लोग्गर नए हैं और मूल साहित्यधारा के आस-पास भी नहीं हैं ...इसीलिये ऐसे मूर्खतापूर्ण विवाद, किस्से, कहानियां, कटुता ...विरोधी टिप्पणी न छापना, हटा देना आदि घटनाएँ होती रहती हैं....
---वन्दना जी एक सक्षम साहित्यकार हैं ...उन्हें किसी भी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए...साहित्य साधना रत रहना चाहिए.... बस ..

mahendra srivastava ने कहा…

सच में, मैं तो ये सब पढ कर हैरान हूं। मुझे लगता है कि ब्लाग जगत में और कुछ हो या ना हो, आपस में सौहार्द जरूर होगा, लेकिन लगता है कि ये मेरा भ्रम था।
मै तो महीने दो महीने पहले ही ब्लाग से जुड़ा हूं और चर्चा मंच पर अक्सर आता था, यहां अच्छे लिंक्स मिलते हैं। खैर
एक बात मेरी नहीं समझ में आई मंच पर चर्चाकारों में अब कोई भी महिला ब्लागर नहीं है, क्या ये एक महज संयोग है या फिर मंच की नीति।

yogendra ने कहा…

मैं ब्लोगिंग मे पिछले १ साल से सक्रीय हूँ और मेरे हिसाब से यहाँ पर आप सिर्फ अपने ब्लॉग पर लिखें, कोई आवश्यकता नहीं है किसी सामूहिक ब्लॉग "भले ही वो कोई भी क्यूँ न चला रहा हो" पर जाने की| मुझे कुछ लिखना होगा तो मैं अपने ब्लॉग पर ही लिख दूंगा ना व्यर्त मे सामूहिक ब्लॉग पर क्यूँ जाऊँगा? और सेवाभाव यदि आप ब्लोगिंग मे लेकर आये हैं, तब तो आपको भगवान ही बचाए

Anjana (Gudia) ने कहा…

Vandana ji, aapnne meri kavitaaon ko kai baar charchamanch pe jagah di jisse mujhe protsahan mila aur iske liye main aur meri kavitaaen hamesha aapki abhari rahengi.

Dil se yahi dua hai ki aapke dard ko araam aaye aur aap muskurate hue jivan ke is path pe vijayi hoker age badti rahen.

Dosti agar sachchi hogi to galatfehmi ko dheere-dheere hara degi nahi to Ishwar aur waqt ke paas har dard ki dawa hai hi.

sprem, anjana

mahendra srivastava ने कहा…

इस पूरे घटनाक्रम को पढकर हैरानी हुई। मुझे लगता है कि ब्लाग जगत एक ऐसा परिवार है, जहां आज भी लोग एक दूसरे के सम्मान को सबसे ऊपर रखते हैं। लेकिन चर्चा मंच की घटना से आहत हूं। हालाकि आपका ये बडप्पन है कि आपने बडे ही संजीदगी से पूरे घटनाक्रम को रखा है, आपकी बातें किसी के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाती हैं।
वैसे एक बात समझ में नहीं आई, चर्चा मंच के चर्चाकारों में अब एक भी महिला ब्लागर नहीं है, कया ये एक संयोग है या फिर चर्चा मंच की नीति।

सुनीता शानू ने कहा…

अरे वंदना ये कैसा रूठना-मनाना चलो मान भी जाओ तुम्हे पढ़कर तो रोज सुबह और शाम होती थी। क्या हुआ जो मै कमैंट नही देती हूँ। अच्छी चर्चा करती हो भई। और करती रहो यही कामना करते हैं। शास्त्री जी तो हमारे आदरणीय हैं गुरुजनों से कैसी नाराजगी कैसी शिकायत? हर बात में कोई अच्छाई होती है बस इतना ही कहूँगी। तुम्हे अभी बहुत कुछ करना है व्यर्थ की बातों में खुद को मत उलझने दो।

POOJA... ने कहा…

main kya kahu... aap dono k saamne main bahut chhoti hoon...
par aap jo bhi karengi sahi karengi... aur jo hota hai acchhe ke liye hota hai...
so just cheer up... and smile...

अविनाश मिश्र ने कहा…

ये तो जीवन का क्रम है वंदना जी.... चलता ही रहता है..
आप मन न छोटा करे... हमेशा आपके साथ
अविनाश मिश्रा

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

वंदना जी ! आज आपका ईमेल मिला कि ‘मुझे अपने साझा मंच से हटा दीजिए‘। पढ़ते हम खटक गए कि आज ज़रूर वंदना जी किसी वजह से अपसैट हैं और आपसे हमन पूछा भी कि ऐसी हमसे क्या ख़ता हो गई है , बताइये तो सही ?
आपकी पोस्ट पढ़ी तो दिल हमारा भी दुखी हो गया और यह देखकर तो वाक़ई दिल बहुत ही ज़्यादा दुखी हो गया कि विवाद के पीछे कोई बहुत बड़ी बात भी तो नहीं है बल्कि केवल ‘परिस्थिति की विडंबना‘है। इसने यह कह दिया तो उसने यह बता दिया और उन्होंने यह समझ लिया।
साहित्यकार संवेदनशील कुछ ज़्यादा ही होते हैं। इसीलिए यह प्रॉब्लम पैदा हुई है लेकिन शास्त्री जी को आप भी जानती हैं और शास्त्री जी भी आपको जानते हैं कि दोनों ही अपने आप में क्या हैं और एक दूसरे के लिए क्या भावनाएं रखते हैं ?
इस समय मुखर होने के बजाय मौन होना ही नीति और धर्म है। आप धार्मिक प्रवृत्ति की महिला हैं।
आशा है कि ध्यान देंगी। जज़्बात में सदा अति हुआ करती है।
मैं मालिक से आप सभी संबंधित लोगों के लिए शांति और दया की कामना करता हूं। वह आपके संग रहे और आपका शोक हरे।

आमीन !!!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

वंदना जी... बस आपने एक बेहतरीन प्रयास शुरू किया है , उस पर ध्यान दीजिये ... गलतफहमियों को अनदेखा कीजिये , आपका प्रयास इससे बाधित होगा - शुभकामनायें

संजय भास्कर ने कहा…

वंदना जी
नमस्कार !
आप नाराज न हों आप अगर नाराज हो जाएँगी तो कैसे चलेगा आपने हमेशा ही अपना काम इमानदारी से करती है हैं जब हम सही है तो हमे किसी का दर नहीं नहीं ही किसी के कुछ कहने का कोई फर्क पड़ना है
इस दुनिया में न जाने क्या क्या होता है हर रोज ........आप किसी प्रकार कि कोई परवाह न करे हम हर कदम पर आपके साथ हैं।
आप बहुत ही अच्छी और बड़ी रचनाकार हैं.. आपने हमेशा ही पुराने व नए ब्लोगेरस का होसला बढाया है व मार्गदर्शन किया है .......हमारा स्‍नेह और शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

संजय भास्कर ने कहा…

@ जैसा की अरुण जी ने कहा है
आप अपने ब्लॉग पर सक्रिय रहे और साहित्य की साधना करें इस कामना के साथ........शुभकामनाएं !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

बहुत दुखद है यह सब।

इक जरा सी बात और इतना बखेडा, अब क्‍या कहा जाए कि गलती किसकी है। मुझे लगता है कि हम आज लोग इतने आत्‍ममुग्‍ध हो चले हैं कि खिलाफ बहने वाला हवा का एक छोटा सा झोंका भी हमारे सब्र के बांध को तार-तार कर जाता है।

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बेहतर लेखन की ‘अनवरत’ प्रस्‍तुति।
अब आप अल्‍पना वर्मा से विज्ञान समाचार सुनिए..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विवाद के परे संवाद बना रहे।

एस.एम.मासूम ने कहा…

वंदना जी यह जो भी खुले मंच पे हो रहा है सही नहीं. मुझे तो गलती किसी कि नहीं लगती और यदु है भी तो केवल किसी ग़लतफ़हमी के कारण हुई है या फिर जज्बात और जल्दबाजी मैं हुई है. आशा है फिर से साथ साथ काम करेंगे.

शिखा कौशिक ने कहा…

मनोबल मत घटाइए .हम सब आपको जानते हैं .सब कुछ साफ है .न आपकी कोई गलती है और न शास्त्री जी की .सब ग़लतफ़हमी का नतीजा है .

Vivek Jain ने कहा…

वंदना जी, केवल इन पंक्तियों की ओर आपका आपका धयान चाहुंगा,
जीवन में एक सितारा था
माना यह बेहद प्यारा था
यह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गयी सो बात गयी ।

आप पहले भी अच्छी थीं, आज भी हैं,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

कुश्वंश ने कहा…

वंदना जी,
अक्सर अपनों के बीच गलत फहमियां हो जाया करती हैं ,आप दुखी हैं पढ़कर अच्‍छा नहीं लग रहा, अपने ब्लॉग पर सक्रिय रहे और साहित्य की साधना करें ,शुभकामनाओं के साथ

Anand Dwivedi ने कहा…

ये सारा कुछ जानकर पढ़कर मन खिन्न हो गया है... ब्लॉग जगत की असलियत जैसे जैसे परत दर परत खुल रही है इससे मोह भंग सा होने लगा है
वंदनाजी ..इधर कम सक्रिय हूँ मैं ..मगर मित्र हूँ जहाँ भी रहें आप मैं आपके साथ हूँ !

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

संगीता स्वरुप(गीत) जी की टिप्पणी से सहमत।

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

नमस्कार...वंदना जी आप मन भारी ना करे......यह सच है कि हमारी मेहनत की कद्र नहीं हुई है यहाँ..पर ये भी सच है कि हर इंसान एक जैसा नहीं होता..पता नहीं वो क्या सोचता..शायद कृतज्ञता आती ही नहीं कुछ लोगों को.....मैने भी कुछ व्यस्तता के कारण चर्चा छोड़ दिया...पर जब आखिरी बार मुझे भी कुछ ऐसी प्रतिक्रिया मिली जिससे मेरा दिल टुट गया.....किसी के आने या जाने से कोई कार्य रुक नहीं जाता...सही है पर.....जब कोई चला जाता है तो फिर लौट कर नहीं आता...बस अपनी मेहनत के वास्ते हमने थोड़ी सी स्नेह और कृतज्ञता माँगी...जो हमे नहीं मिला....आप उदास ना हो...और प्रश्नचित होकर अपने ब्लाग पर कार्यरत रहे....आभार।

Rakesh Kumar ने कहा…

वंदना जी,
सादर नमस्कार के साथ बस यही कहना चाहूँगा कि आप भक्ति मार्ग पर चल रहीं तो अपने लक्ष्य को अर्जुन की तरह 'चिड़िया की आँख'की तरह ध्यान में रखियेगा,हर वाद और विवाद से परे होकर.
आपकी 'भक्तिपूर्ण' रचनाएँ मुझे बहुत अच्छी लगतीं हैं और उन्हीं का मुझे इंतजार रहता है.
आप मन की सच्ची हैं,सच्चे मन से बढते रहिएगा.
हमे भी आपके साथ उसकी कृपा का प्रसाद मिलता रहेगा.
'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन-२' पर आपको सादर बुलावा है.

दर्शन कौर' दर्शी ' ने कहा…

वन्दना जी ,जब आपने कहा की यह 'शायद' मेरी आखरी चर्चा होगी आप शिवजी पर कुछ लिखीए' तो मन मे काफी विचार तो आए पर पुछ नही सकी! आपने कहा मुझे टाईम नही मिलाता' !यह मेरी भी परेशानी थी इसलिए मैने भी अपना हाथ खिंच लिया चर्चा मंच से ....
लिखना हमारा शोक जरुर है ..मजबूरी नही ?
इंसान का मन और दिमाग यदि किसी काम को मना करता है तो उसे छोड़ देना ही श्रेष्ट है ....

ZEAL ने कहा…

.

Vandana ji ,

Continue writing . Waiting for your new post full of zeal.

Best wishes .

.

Rangnath Singh ने कहा…

ब्लॉग से कुछ दिन दूर रहकर अपने काम पूरे करने का विचार बहुत स्वागतयोग्य है. आप जो लिखना चाहती हैं उसे लिखें,फिर वापस आयें.

ब्लॉग पर अक्सर होते रहने वालो टुच्चे विवादों पर मेरी नजर जाती रही है. लेकिन मुझे उनमें कोई रूचि नहीं रही.आपकी हमारी किसी माध्यम से कभी कोई बातचीत नहीं हुयी. लेकिन इस विवाद के बारे अपनी बात रखना चाहूँगा. सच पूछिए तो चर्चा मंच नामक कोई चीज भी है ये मुझे आपके माध्यम से पता चला. आपने हमारे ब्लॉग कि चर्चा की तो जाना की ऐसी भी चीज है ! .

सच तो ये है कि हमें इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि ब्लॉग के स्वयम्भू-जन हमारे ब्लॉग के बारे में क्या टिप्पणी करते हैं या उसे कैसे लेते हैं. पत्रकारिता और साहित्य ऐसे स्वयम्भू से पटा हुआ है. ऐसे में ब्लॉग पर दो-चार और से मिल कर समय ही खोटा होता है.

लेकिन आपने जिस तरह से बना रहे बनारस की कई पोस्ट को चर्चा मंच में जगह दी उससे ये विश्वास बना था कि ब्लॉग में भी,दुनिया ही कि तरह कुछ लोग निश्वार्थ अपना काम करते हैं. यह आपकी सदाशयता थी की आप हमें सूचित भी करती थीं कि आपकी पोस्ट चर्चा में है.

मुझे विश्वास है कि मुझ जैसे और बहुत से लोग होंगे जिन्होंने आपके इस ईमानदार रवैये पर ध्यान दिया होगा. ऐसे सभी लोग आपको सम्मान के साथ ही याद करेंगे.

शुभकामनाएं......

अतुल प्रकाश त्रिवेदी ने कहा…

हिंदी में गुटबाजी परोक्ष - अपरोक्ष रूप में रही है . तुम मेरी मैं तुम्हारी पीठ . अमेरिकी राष्ट्रपति बुश साहेब के लफ्जों में - या तो आप हमारी तरफ हैं या उनकी .

पर यहाँ ब्लॉग जगत में भी संघ इत्यादि दिखे तो लगता है नये मुहावरे गढने होंगे .

Arunesh c dave ने कहा…

यह तो अच्छी बात नही हुयी और ऐसा होना भी नही चाहिये था और सबसे बड़ी बात शास्त्री जी उम्र मे बड़े हैं उन्हे सहनशीलता से काम लेना था उनका चर्चाकार के बारे किया गया कमेंट एकदम अनुचित था बात कहीं तक भी पहुंचे व्यक्तिगत कड़वाहट नही आनी चाहिये । मेरा आप सभी से अनुरोध है कि इस बात को यहीं खत्म करें और वापस खुश्नुमा माहौल हो जाये शास्त्री जी से भी अनुरोध है कि वह कमेंट चर्चामंच से हटा लें