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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

सुना था होता है इक बचपन




सुना था होता है इक बचपन
जिसमे होते कुछ मस्ती के पल
पर हमने ना जाना ऐसा बचपन
कहीं ना पाया वैसा बचपन
जिसमे खेल खिलौने होते
जिसमे ख्वाब सलोने होते
यहाँ तो रात की रोटी के जुगाड़ में
दिन भर कूड़ा बीना करते हैं
तब जाकर कहीं एक वक्त की
रोटी नसीब हुआ करती है
जब किसी बच्चे को
पिता की ऊंगली पकड़
स्कूल जाते देखा करते हैं
हम भी ऐसे दृश्यों को
तरसा करते हैं
जब पार्कों में बच्चों को
कभी कबड्डी तो कभी क्रिकेट
तो कभी छिड़ी छिक्का 
खेलते देखा करते हैं
हमारे  अरमान भी उस 
पल को जीने के 
ख्वाब रचाया करते हैं

मगर जब अपनी तरफ देखा करते हैं
असलियत से वाकिफ हो जाते हैं
सब सपने सिर्फ सपने ही रह जाते हैं
कभी भिखारियों के 
हत्थे चढ़ जाते हैं
वो जबरन भीख मंगाते हैं
हमें अपंग बनाते हैं 
तो कभी धनाभाव में 
स्कूल से नाम कटाते हैं
और बचपन में ही 
ढाबों पर बर्तन धोते हैं
तो कभी गाड़ियों के शीशे 
साफ़ करते हैं
तो कभी लालबत्ती पर
सामान बेचा करते हैं

यूँ हम बचपन बचाओ 
मुहीम की धज्जियाँ उडाया करते हैं 
बाल श्रम के नारों को 
किनारा दिखाया करते हैं
पेट की आग के आगे
कुछ ना दिखाई देता है
बस उस पल तो सिर्फ
हकीकत से आँख लड़ाते हैं 
और किस्मत से लड़- लड़ जाते हैं
बचपन क्या होता है
कभी ये ना जान पाते हैं
जिम्मेदारियों के बोझ तले
बचपन को लाँघ 
कब प्रौढ़ बन जाते हैं
ये तो उम्र ढलने पर ही 
हम जान पाते हैं
सुलगती लकड़ियों की आँच पर
बचपन को भून कर खा जाते हैं
पर बचपन क्या होता है
ये ना कभी जान पाते हैं 

37 टिप्‍पणियां:

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी बेहतरीन और कमाल की पोस्ट..........आपकी पोस्ट में तस्वीरे कम ही होती हैं पर इस बार जो आपने लगाई हैं वो बहुत कुछ खुद कह रही हैं.......सिसकता बचपन........सुभानाल्लाह.......मुझे बहुत पसंद आई ये पोस्ट..........हैट्स ऑफ इसके लिए|

Anita ने कहा…

बहुत मार्मिक कविता, एक कटु सत्य जिसे हम देख कर भी कुछ विशेष नहीं कर पाते, सरकार ने बच्चों के लिये कितने कानून बनाये हैं पर बाल मजदूरी आज भी जारी है, जारी है उनका शोषण भी, कई प्रश्न उठाती एक दिल को छूने वाली कविता...

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" ने कहा…

bachpan ko bahut khoobsoortee se bayaan kiyaa
uske dard ko bhee samjhaa aur samjhaayaa

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

कल 16/11/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है।

धन्यवाद!

Human ने कहा…

एक उत्कृष्ट रचना बाल श्रम पर लिखी है आपने ।
बहुत अच्छे से सामाजिक चिंतन का सन्देश ।
काश ! हम इसे समझे व गरीबों तथा बच्चों के प्रति संवेदनशील हों ।
बेहतरीन प्रस्तुति ।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

marmik bhawnaaon ko ukerti rachna

shikha varshney ने कहा…

आखिरी पंक्तियाँ बहुत प्रभावशाली हैं.एक मार्मिक और कडुवा सच.

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना

Kailash C Sharma ने कहा…

सुलगती लकड़ियों की आँच पर
बचपन को भून कर खा जाते हैं
पर बचपन क्या होता है
ये ना कभी जान पाते हैं

....सच में समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा बचपन से अनजान रह जाता है..बहुत मार्मिक और सटीक अभिव्यक्ति...

vidha ने कहा…

ऐसी संवेदनशील कविता जो दिलो-दिमाग विलोड़ित कर दे.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

काश सबको ही संभावनाओं का बचपन मिले।

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत ही सटीक और मार्मिक रचना..

Rajesh Kumari ने कहा…

samaaj ko aaina dikhai rachna man ko udvelit karte chitra.bhookh ke saamne baal shraman ka naraa pani bharta hai.bahut sarahniye prastuti.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बेहद खूबसूरत कविता... अलग फलक की कविता ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत मार्मिक प्रस्तुति ..सच्चाई को कहती हुई

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

यथार्थ को चित्रित करती शानदार रचना

Gyan Darpan
Matrimonial Site

Sunil Kumar ने कहा…

आपकी यह रचना सच्चाई से रुबुरु करवाती हैं और अनेकों प्रश्नों के उत्तर मांगती हैं ...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

प्रभावशाली कविता ... बचपन के यह हाल सच में दुखद ही हैं.....

अनुपमा पाठक ने कहा…

सत्य का मार्मिक व्याख्यान सी कविता!

राजेश उत्‍साही ने कहा…

सबको नसीब नहीं होता बचपन।

कुश्वंश ने कहा…

बेहतरीन काव्य , यात्रा अनवरत चलती रहे

Atul Shrivastava ने कहा…

बहुत सुंदर।
गजब का दर्द.....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

विचारोद्वेलक रचना... सार्थक...
सादर...

Bhushan ने कहा…

हम मानव संसाधनों का सही और पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. सुंदर रचना.

अतुल प्रकाश त्रिवेदी ने कहा…

बाल श्रमिकों की समस्या पर ध्यान खींचा है आपने , परन्तु जब तक कानून बनाने वाले स्वयं अपने घरों पर बाल श्रमिक रखेंगे बहुत फर्क नही पडने वाला है . किन्त चेतना जगाने का प्रयास सतत जारी रहना चाहिए

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

यथार्थ को प्रस्तुत करती कविता।

सादर

PRO. PAWAN K MISHRA ने कहा…

सुलगती ..........बचपन भून कर खा जाते है
मार्मिक एवम यथार्थ्

mridula pradhan ने कहा…

marmik hai bachpan ka ye anubhaw.....

Kalpana ने कहा…

बहुत ही मार्मिक और अपील करती हुई सार्थक रचना!!!

Human ने कहा…

लोकतंत्र के चौथे खम्बे पर अपने विचारों से अवगत कराएँ ।

औचित्यहीन होती मीडिया और दिशाहीन होती पत्रकारिता

Rakesh Kumar ने कहा…

कई बार आपके ब्लॉग पर आने की कोशिश की.
न जाने क्या गडबड है कि 'टिपण्णी बॉक्स'खुल के ही नही दे रहा था.

आपने बहुत ही मार्मिक हृदयस्पर्शी लिखा है.
आपका सुन्दर लेखन नित प्रति नए नए
रंग प्रस्तुत कर रहा है.

इस बार सदा जी की हलचल से चल कर
यहाँ आ पाया हूँ.आपका और सदा जी का बहुत बहुत आभार.

Deepak Shukla ने कहा…

Bahan ji..

Bal divas par aapki rachna padh kar bhav vihal ho gay hun.. Man khinn ho utha hai.. Man main jaane kitna kuchh aata hai par kuchh bhi kar na paya hun..kamobesh hum sabki yahi haalat hai.barhaal sabka dhyaan es taraf akarshit karne ka shukria..

Shubhkamnaon sahit..

Deepak Shukla

कुमार राधारमण ने कहा…

जहां बच्चों को बचपन नसीब न हो,वह देश और समाज चूक जाता है आनंद और सहृदयता के उन क्षणों से जिनके अभाव के कारण ही हमारी मौलिकता नष्ट हुई जा रही है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

असलियत का पूरा चित्र खींच दिया है आपने इस रचना में ... कटु सत्य को उजागर किया है शब्दों में .. बहुत ही प्रभावी ...

NISHA MAHARANA ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति धन्यवाद वंदना जी।वास्तव में दिल दुःखी हो जाता है बच्चों का बचपना छिनते देख।

GAURAV BANSAL ने कहा…

सबसे खतरनाक होता है,
मुर्दा शांति से भर जाना,
न होना तड़प का,
सब सहन कर जाना,
सबसे खतरनाक होता है,
हमारे सपनो का मर जाना,
घर से जाना काम पर,
काम से लौट कर घर आना,
सबसे खतरनाक होता है,
हमारे सपनो का मर जाना,,,,,

GAURAV BANSAL ने कहा…

सबसे खतरनाक होता है,
मुर्दा शांति से भर जाना,
न होना तड़प का,
सब सहन कर जाना,
सबसे खतरनाक होता है,
हमारे सपनो का मर जाना,
घर से जाना काम पर,
काम से लौट कर घर आना,
सबसे खतरनाक होता है,
हमारे सपनो का मर जाना,,,,,