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सोमवार, 25 जून 2012

जलती चिताओं का मौन भी कभी टूटा है?

जलती चिताओं का मौन भी कभी टूटा है?
शायद आज फिर से कोई तारा टूटा है


 आज फिर किसी रात का बलात्कार हुआ है
शायद आज फिर किसी का नसीबा रूठा है

दिन के उजाले भी कभी रुसवा हुए हैं

शायद आज फिर अंधेरों का भरम टूटा है

मिटटी के खिलौनों को कब धडकनें मिली हैं

शायद आज फिर खुद से साक्षात्कार हुआ है

बेशर्मी बेईमानी की चिताएं भी कभी सजती हैं

शायद आज फिर से कहीं ईमान होम हुआ है

21 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

बहुत खूबसूरती से आज के हालात का बयाँ

S.N SHUKLA ने कहा…

bahut khoobasoorat aur saarthak prastuti.

रजनीश तिवारी ने कहा…

bahut sundar prastuti...

Pallavi saxena ने कहा…

सुंदर एवं सार्थक रचना...

सदा ने कहा…

मिट्टी के खिलौनों को कब धड़कनें मिली हैं ...वाह बहुत खूब

रवि शंकर प्रसाद Ravi Shankar Prasad ने कहा…

यह धुआं छटे, यही कामना है...

सुनीता शानू ने कहा…

मिटटी के खिलौनों को कब धडकनें मिली हैं
शायद आज फिर खुद से साक्षात्कार हुआ है
बातों-बातों में बहुत बड़ी बात कह दी आपने।
बहुत खूब!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ये रुदन जो सुनाई दे रहा है , वह तूफ़ान का इशारा है

इमरान अंसारी ने कहा…

सुन्दर और शानदार ग़ज़ल।

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २६/६ १२ को राजेश कुमारी द्वारा
चर्चामंच पर की जायेगी

अजय कुमार झा ने कहा…

आपकी पोस्ट को हमने आज की पोस्ट चर्चा का एक हिस्सा बनाया है , कुछ आपकी पढी , कुछ अपनी कही , पाठकों तक इसे पहुंचाने का ये एक प्रयास भर है , आइए आप भी देखिए और पहुंचिए कुछ और खूबसूरत पोस्टों तक , टिप्पणी पर क्लिक करें और देखें

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

मिटटी के खिलौनों को कब धडकनें मिली हैं
शायद आज फिर खुद से साक्षात्कार हुआ है

बहुत ही सुंदर...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज के समय को कहती सुंदर अभिव्यक्ति

Rachana ने कहा…

sunder bhavon se bhari kavita
rachana

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

vartmaan paridrishy ko behtarin tareeke se darshaati shasakt ghazal...bahut dino baad aapki ghazal padhne ko mili..sadar badhayee ke sath

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

bemisaal!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बहुत सुन्दर सार्थक रचना...
सादर.

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

दिन के उजाले भी कभी रुसवा हुए हैं
शायद आज फिर अंधेरों का भरम टूटा है

बेशर्मी बेईमानी की चिताएं भी कभी सजती हैं
शायद आज फिर से कहीं ईमान होम हुआ है

वंदना जी बहुत सुन्दर ...आज के हालात को दर्शाती रचना ..बहुत कुछ कह दिया इस रचना ने काश लोग खुद को देखें

भ्रमर ५ ...

lokendra singh rajput ने कहा…

सभी शेर एक से बढ़कर एक...
अंतर्मन को झकझोर रहे हैं...

सतीश सक्सेना ने कहा…

दर्दनाक अभिव्यक्ति ....

सुखदरशन सेखों (दरशन दरवेश) ने कहा…

हालात ऐ बिआं अति खूबसूरत