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बुधवार, 17 सितंबर 2008

हमसफ़र साथ होते हुए भी तनहा हूँ मैं
ज़िन्दगी इससे बड़ी और क्या सज़ा देगी हमें

5 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

bahut khub

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

साथ मिल जाये,
दिल भी मिल जाये,
ऐसे कम खुश-नसीब होते हैं।
चाहे इसको सजा,
कहो या मजा,
रिश्ते बिल्कुल अजीब होते हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

साथ मिल जाये,
दिल भी मिल जाये,
ऐसे कम खुश-नसीब होते हैं।
चाहे इसको सजा,
कहो या मजा,
रिश्ते बिल्कुल अजीब होते हैं।

विनय ने कहा…

बहुत दर्द निहित है इसमें!

---
चाँद, बादल और शाम

मुंहफट ने कहा…

जिंदगी साथ होते हुए भी तन्हा
...आखिर क्यों?
शेर अर्ज किया है-
किस दौर में जिंदगी बशर की है
कि वो इस तरह बीमार की रात हो गई.