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रविवार, 9 मई 2010

मातृ ऋण से कुछ तो खुद को उॠण कर लेना

मत करो
मेरा वंदन 
अभिनन्दन
मत करो
याद तुम
सिर्फ एक दिन 
मत दो 
सम्मान अभी
फर्क नहीं पड़ता 
अभी तो मैं
अपना बोझ 
उठा लूँगी
तुम पर 
जान न्यौछावर
कर दूंगी 
अपनी दुआओं में 
सिर्फ तुम्हारा
ही नाम लूँगी
अभी तो शक्ति
है मुझमें 
अभी तो 
सहने की 
क्षमता है मुझमें
पर उस दिन 
जब मैं
असहाय जो जाऊँ
निर्बल , निरीह 
हो जाऊं
सहारे बिन ना
चल पाऊँ
आँखों की ज्योति
कम हो जाये
शरीर  भी
निर्बल हो जाये
यादें भी 
धूमिल पड़ जायें
एक बात को 
बार -बार 
 मैं दोहराऊँ
उस दिन तुम
झुँझला मत जाना
खाना खाते वक्त
मूँह से निकलती
आवाजों से
तुम शरमा
मत जाना
इन बिखरी 
टूटी  हड्डियों को
तुम कोठरी में
सुखा मत देना 
अपनी बेबस 
पुरातन माँ में
नए ज़माने की
हवा भरने की ना
कोशिश करना
जब तुमसे मिलने 
को आतुर माँ
तरसती हो
तुम्हारे सानिध्य 
को तड़पती हो
दो बोल 
मीठे बोल देना
कड़वाहट का 
ज़हर ना
शब्दों में भरना
वक़्त की कमी
की ना 
दुहाई  देना
एक आखिरी
घडी गिनती
बेबस माँ को
तुम ना बेबस
कर देना
वरना
मौत से पहले
मर जाएगी
तुम्हें स्नेह 
करने वाली
दोबारा फिर 
नहीं आएगी
निश्छल ,निर्मल
स्नेहमयी माँ
फिर ना कभी
मिल पायेगी
मरते -मरते भी
दुआएँ तुम्हें
दे जाएगी
ये सौगात 
फिर ना कभी
मिल पाएगी 
इस अमूल्य
धरोहर को
शीश पर धारण
कर लेना
बस उस दिन 
जब उसे तुम्हारी 
जरूरत हो
याद उसे तुम 
कर लेना
मातृ ऋण  से 
कुछ तो खुद 
को उॠण
कर लेना

19 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

mother's day ki shubhkaamnaayein....

aapki rachna ke liye...

KYA BAAT....KYA BAAT....KYA BAAT....

:-) aafareen!!

Mithilesh dubey ने कहा…

क्या कहूँ आपकी रचना एक माँ का दर्द साफ झलक रहा है , बहुत ही भावपूर्ण रचना लगी आपकी । मम्मी आपको मातृ दिवस की बहुत-बहुत बधाई ।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

माँ को कभी भुलाया ही नही जा सकता है हर सुख दुख में आदमी माँ को याद करता ही है चंद ही ऐसे लोग होंगे जो ईश्वर और हर रिश्ते नाते से परे माँ को भूल जाएँ...वंदना जी बहुत गहरी और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...सुंदर भाव रचना बहुत अच्छी लगी मातृ दिवस की आपको हार्दिक बधाई..

दिलीप ने कहा…

dard keh diya saara...aapki kavita se jo sandesh mila uske liye dhanyawad

sangeeta swarup ने कहा…

मातृ दिवस की शुभकामनायें...

मन के मन की दुविधा और चिंता को अभिव्यक्त करती सटीक रचना है...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

वंदना जी ! बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी रचना है ... हालांकि आज की दुनिया में वही सब हो रहा है जो आपने लिखा है ... पर उम्मीद है कि जो लोग ऐसा करते हैं उनको सदबुद्धि आयेगी ...
आपको इस दिन के लिए शुभकामनायें !

अजय कुमार ने कहा…

संसार की समस्त माताओं को नमन

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

aaj ka sach likhh diya aapne
bas yahi ho raha hai aaj ki maa ke sath

bahut khoob likhha aapne
badhai

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

मातृ दिवस की बहुत-बहुत बधाई ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी रचना बहुत बढ़िया है!

मातृ-दिवस पर
ममतामयी माँ को प्रणाम तथा कोटि-कोटि नमन!

M VERMA ने कहा…

दो बोल
मीठे बोल देना
कड़वाहट का
ज़हर ना
शब्दों में भरना
माँ तो दो मीठे बोल की अभिलाषी होती है
सुन्दर रचना

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

बहुत खूब वंदना जी ,, मन की भावनाओं को उद्देलित करती एक भाव पूर्ण रचना ,,,,माँ ही तो वो एक प्राश्रय है जहां जीवन का अम्रत तुल्य सुकून मिलता है ,,और हम कितनी जल्दी उसके प्रति उदासीन हो जाते है हमें अपना जीवन ही सर्वोपरि लगने लगता है ,,,कभी उस माँ के आस पास के दायरे में घिरे रहने वाला हमारा जीवन आज हमें अपने सम्बल से खड़ा प्रतीत होता है ,,, और हम उसके त्याग औत तप को और उसकी हर उस आहुति को जो उसने हमारे निर्माण के लिए बड़े मनोभावों से दी भुला वैठ्ते है ,,,, जीवन के हर मोड़ पर उसे नकारते आगे बढ़ते जाते है ,,, मगर फिर भी वो माँ तमाम झंझावातो से अलग हो हमारे प्रति अपने आसक्ति भाव को कम नहीं करती और अंत तक अपना प्यार लुटाती रहती है ,,,,,,,,
माँ को याद करती हुई एक छोटी कविता
तेरी उपमा किससे कर दू,,,

किससे दूँ तेरा सम्मान ,,,

मेरा जीवन भी तो तेरा है ,,,

फिर दूँ क्या तेरे को तेरे से मान ...

माँ तू अमित संगिनी मेरी ,,,

हर सांसो प्र्स्वासो में,तेरा भान ,,,,

जब कभी विकल व्याधि सी" माँ ,,

मुझको पीडा बहुत सताती है,,,

जब कभी तीव्र उलझनों से,,,

दुनिया मेरी रुक जाती है ,,,

हर घडी पास तुझको मैंने पाया है ,,,,

जब कड़ी धूप में आता बादल ,,,,

लगता तेरे आंचल का साया है ,,,

इन दूर दूर गामी देशो में रह कर ,,

इन विविध विविध वेशो में रह कर ,,,

माँ मैं कभी नहीं तुझको भुला हूँ ,,,,

इस जीवन के नितान्त अकेले पन में माँ ,,

तुने ही तो साथ निभाया है ,,,

सुख में तू किलकारी बन गूंजी ,,,

दुःख में बनी वेदना ,,,, माँ :::::::

मौन रहूँ तो उसमे भी तू ,,,,,

विचारो की अनवरत श्रंखला है,,,,

तेरा साया पल पल मैंने महसूस किया है ...

तेरी स्म्रतियों के झोको ने भी तो ,,,

नवजीवन ही दिया है ,,,

मैं बौना बन यही सोचता,,,

तेरी गरिमा किससे कर दूँ ...

किससे दूँ तुझको मैं मान ,,,

तेरी उपमा किससे कर दूँ ,,,

किससे दूँ तेरा सम्मान ,,,,,
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Main Matr divas ki shubhkamnayen nahi dunga varan ye wada jarur karunga ki main aapki kavita ke anurup apni MAA ka dhyaan hamesha rakhunga.. Khaskar tab jab uski shakti ksheen padne lage..

Yun to har sanvedansheel vyakti ke liye Maa se badhkar koi nahi hota.. Par fir bhi jab Maata-Pita ki avastha jyaada ho jaati hai tab hi use seeva ki avashyakta hoti hai aur tab jo bachcha unki sewa kare wohi sahi maynon main beta ya beti kahlane ke patr hain..

Esi vishay par meri ek kavita "MAA" mere blog par samay ho to avashya padhen..

DEEPAK..
www.deepakjyoti.blogspot.com

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण रचना लगी ,,, अच्छी रचना ...दुनिया की हर माँ के चरणों में मेरा शत-शत नमन

वाणी गीत ने कहा…

थोड़े ग्रामीण लहजे में कहूँ ...
जब तक माँ के हाथ पैर चलते हों ...तब तक उसके सच्ची सेवा करने वाले को ढूँढना मुशिकल है ...जब जर्ज़र शरीर जवाब देने लगे तब ही जाकर रिश्तो की असलियत खुलती है ...ऐसे समय में सारे ऋणों को एक झटके में उतार फेंकने वाले बहुत देखे हैं इस जिन्दगी की पाठशाला में ...
एक गंभीर चिंतन भरी कविता ...आभार ...!!

rashmi ravija ने कहा…

मन के भावों को उद्वेलित करती एक बेहद भावपूर्ण रचना...
बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति

Shekhar Suman ने कहा…

i miss you mom....
aankhein bhar aayi hain jyada kuch na likh sakoonga,.....
yun hi likhte rahein...
-----------------------------------
mere blog mein is baar...
जाने क्यूँ उदास है मन....
jaroora aayein
regards
http://i555.blogspot.com/

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सुन्दर शशक्त रचना...बधाई वंदना जी...बहुत बहुत बधाई...
नीरज

vishal ने कहा…

जरा सी बात है इस हवा को कौन समझाए,
दीए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है- राना

... बस एक माँ है जो मुझसे कभी नाराज नहीं होती। हृदय का एक-एक तार हिल गया वंदना जी। इसकी तारीफ के लिए कोई शब्द ही नहीं हैं मेरे पास। आजकल के कई साहित्यकार, लेखकों की जहाँ तक सोच होती है आप उसके आगे से सोचना शुरू करती हैं। (वंदना जी की तारीफ में लिखा है, कृपया कोई भी लेखक बंधु अन्यथा न लें)