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मंगलवार, 18 मई 2010

खुद से निगाह मिला ना पाया

सुनो
उदासी का
लहराता साया
क्या तूने नहीं देखा?
जिसे कभी तू
कँवल कहा करता था
उस रुखसार पर
डला ख़ामोशी का
नकाब
हटाया तो होता
हर तरफ टूटी -बिखरी
निराशा में डूबी
आहें और ख्वाबों
को ही पाया होता
हर पग पर सिर्फ
ज़ख्मो के ही निशाँ
टिमटिमाये होते
हर तरफ तबाही का
मंजर ही पाया होता
और हर तबाही के लिए
खुद को ही कसूरवार
ठहराया होता
शायद इसीलिए
नकाब हटा ना पाया
सत्य के आईने में
खुद से निगाह
मिला ना पाया

23 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

शायद इसीलिए
नकाब हटा ना पाया
सत्य के आईने में
खुद से निगाह
मिला ना पाया
नकाब के पीछे से सच जो धुन्धला नज़र आता है
सुन्दर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

स्वर्णकार ने स्वर्ण को दियो अग्नि में डाल!
काँप उठो पानी भयो देख परीक्षा काल!!

बहुत सुन्दर रचना!
सत्य से निगाह तो कोई सच्चा ही मिला सकता है!
झूठा तो सत्य की अग्नि में भस्म हो जाता है!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

बहुत अच्छी कविता.. कुछ कन्फेश कर रहा है जैसे कोई... बेहतरीन.. कँवल को कमल कर लीजिये बस..

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

सच बात , बढ़िया रचना !

sangeeta swarup ने कहा…

सत्य कड़वा होता है ना....इसीलिए नकाब नहीं उठा पाया...बहुत खूबसूरती से लिखी रचना...

Sanjiv Kavi ने कहा…

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

kunwarji's ने कहा…

"शायद इसीलिए
नकाब हटा ना पाया
सत्य के आईने में
खुद से निगाह
मिला ना पाया"

जी बहुत सुन्दर,हर बार की तरह...

जी आप ये बताये,आप सभी के मन का विश्लेषण कैसे कर लेती हैं!

मै आपकी इसी प्रतिभा से अधिक आश्चर्यचकित हूँ!
आप सत्य को शब्दों में जब ढालती हो तो वो शब्दों का कैदी ही नजर आता है जबकि बताया ये जाता है कि सत्य शब्दों से सोच से परे है...

कुंवर जी,

shikha varshney ने कहा…

नकाब हटाया तो खुद से नजरे ही न मिला पायेगा..सुन्दर रचना.

Mithilesh dubey ने कहा…

वाह क्या बात है , हमेशा की तरह इस बार भी दिल से निकली आवाज ।

Priyankaabhilaashi ने कहा…

सटीक..!!!

महफूज़ अली ने कहा…

Very good...

दिलीप ने कहा…

bahut sundar kavita...

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

nilesh mathur ने कहा…

वाह! बेहतरीन पंक्तियाँ !

देवेश प्रताप ने कहा…

लाजवाब रचना .....

Deepak Shukla ने कहा…

नमस्कार...

शायद इसीलिए नकाब न हटा पाया....

सत्य से निगाह न मिला पाया...

सच कहती हैं आप सत्य से निगाह मिलाना मुश्किल होता है...और वो जो सारे जख्मों, दर्दों की वजह रहा हो वो भला कैसे निगाह मिला पायेगा...

****************
जिसने दर्द दिए होंगे वो, कैसे सामने आएगा...
कैसे और किस मुहं से तुझसे, अपनी नज़र मिलाएगा...

दीपक...

Deepak Shukla ने कहा…

krupya mere blog par bhi aakar mera maan badha den...

Deepak
www.deepakjyoti.blogspot.com

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Khud se nigahen milaana aasaan nahi .. bahut bada jigra chaahiye ... lajawaab likhti hain aap ...

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

bhut khub vandna ji behtreen rachna
saadar
praveen pathik
9971969084

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

Sanjiv Kavi ने कहा

सिर्फ विज्ञापन!
इसे हटा दीजिए!

Shekhar Suman ने कहा…

bahut khub
waaah
-----------------------------------
mere blog par meri nayi kavita,
हाँ मुसलमान हूँ मैं.....
jaroor aayein...
aapki pratikriya ka intzaar rahega...
regards..
http://i555.blogspot.com/

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

deri se aane ke liye maafi chaahunga..

bahut hee umdaa rachna hai ye aapki....

cheers!
surender!

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।