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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

लिखना मुझे कब आता है

 लिखना मुझे 
कब आता है
बस आपके दर्द
आपकी नज़र

करती हूँ
दर्द की चादर

ओढकर
जब तुम सोते हो
मै चुपके से

आ जाती हूँ
तुम्हारे दर्द के

कुछ  क्षणों
को तुमसे

चुरा ले जाती हूँ
फिर उन अहसासों
को जीती हूँ
तुम्हारे दर्द 
को पीती हूँ
और फिर इक 
नज़्म लिखती हूँ
 मगर फिर भी 
अधूरा रहता है
शायद तुम्हारे 
दर्द को
पूरी तरह ना
पकड पाती हूँ
उस वेदना 
की अथाह
गहराई मे ना 
उतर पाती हूँ
तभी हर बार
पूरी तरह
ना उतार पाती हूँ
शायद इसिलिये
बार -बार 
मैं लिखती हूँ
तुम्हारे अधूरे - बिखरे
दर्द -भरे पलो को
 तुम्हारी नज़र 
 ही करती हूँ

23 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

उस वेदना की अथाह
गहराई मे ना उतर पाती हूँ
तभी हर बार पूरी तरह
ना उतार पाती हूँ
शायद इसिलिये
बार -बार मैं लिखती हूँ
तुम्हारे अधूरे - बिखरे
दर्द -भरे पलो को तुम्हारी नज़र ही करती हूँ
...अंतर्मन से उपजी वेदना/आह ही तो शब्दों में ढल कर कविता का रूप धारण करती है... ...बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

rashmi ravija ने कहा…

तभी हर बार पूरी तरह
ना उतार पाती हूँ
शायद इसिलिये
बार -बार मैं लिखती हूँ
तुम्हारे अधूरे - बिखरे
दर्द -भरे पलो को तुम्हारी नज़र ही करती हूँ
वेदना को शब्द दे दिए जैसे

Sunil Kumar ने कहा…

उस वेदना की अथाह
गहराई मे ना उतर पाती हूँ
दिल की गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना , बधाई

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

दर्द को आपने बड़ी शिद्दत से महसूस किया हैँ फिर उसको बहुत ही खूबसूरती से एक-एक शब्द चुनकर रचना मेँ ढाला हैँ। वाह क्या शिल्पकार हैँ आप वन्दना जी। बहतरीन एक लाजबाव कविता हैँ। शुभकामनायेँ! -: VISIT MY BLOG :- जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ। ............... गजल को पढ़ने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकती हैँ।

arun c roy ने कहा…

शायद तुम्हारे दर्द को
पूरी तरह ना पकड पाती हूँ
उस वेदना की अथाह
गहराई मे ना उतर पाती हूँ
तभी हर बार पूरी तरह
ना उतार पाती हूँ
शायद इसिलिये
बार -बार मैं लिखती हूँ
.... vandna ji aapki kavitayen eak alag dharatal par le jaati hain aur sochne, rone, chintan ke liye chhod ati hain... sach kaha hai aapne.. jis din dard ko mehsoos karna chhod dega rachnakaar, srijan band ho jaayega.. bahut khoob...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ”) ने कहा…

लिखना मुझे
कब आता है
बस आपके दर्द
आपकी नज़र
करती हूँ
दर्द की चादर
ओढकर
--
माँगते-माँगते सब फकीर हो जाते हैं!
--
लिखना तो मुझे भी नही आता है!

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर रचना !!

रानीविशाल ने कहा…

तुम्हारे अधूरे
बिखरे दर्द भरे पलो को
तुम्हारी नज़र ही करती हूँ
वाह ! क्या कहने ....बहुत उम्दा

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मुख जब बोल नहीं पाता है, हृदय लिख देता है।

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

बहुत खूब
तेरा तुझको सौंप दे क्या लगत है मोर.............|


ब्रह्माण्ड

Arvind Mishra ने कहा…

बार बार लिखते रहने की एक प्यारी सी व्याख्या

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

khoobsurat rachna Vandana ji!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

vedna ke athaah saagar me doobker dard ko sahla diya

राजेश उत्‍साही ने कहा…

कहते हैं कि
करत करत अभ्‍यास के गुणमति होती सुजान
रसरी आवत जात से सिल पर परत निशान

उम्‍मीद पर दुनिया कामय है। मुझे यकीन है आप एक दिन जरुर लिखेंगी।

डॉ. नूतन " अमृता " ने कहा…

bahut hee sundar tareeke se aap ne likh diya likhnaa mujhey kab aata hai... aur itna sundar likh dala..umdaa..Vandna ji..

JAY SHANKER PANDEY ने कहा…

Likhna mujhe kab aata hai... bahut achchhee rachna lagee. shlaaghneeya.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

मै चुपके से
आ जाती हूँ
तुम्हारे दर्द के
कुछ क्षणों
को तुमसे
चुरा ले जाती हूँ

वाह....बेहद कमाल की रचना...भावपूर्ण...
नीरज

राजेश उत्‍साही ने कहा…

कृपया भ्रमित न हों । मैंने अपनी पहली टिप्‍पणी में जड़मति के स्‍थान पर गुणमति जानबूझकर लिखा है।

MUFLIS ने कहा…

शायद इस लिए बार बार मैं लिखती हूँ
तुम्हारे अधूरे बिखरे दर्द भरे पलों को
तुम्हारी नज़र ही करती हूँ ....

काव्य का सिलसिला
सीधे जिंदगी की ठोस गलियारों में
उतरता-सा हुआ महसूस हो रहा है
वेदना को मासूम शब्द दे कर
हर दिल तक पहुंचाने के लिए
आभार .

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

मै चुपके से
आ जाती हूँ
तुम्हारे दर्द के
कुछ क्षणों
को तुमसे
चुरा ले जाती हूँ

अति सुन्दर विचार

बधाई
चन्द्र मोहन गुप्त

kunwarji's ने कहा…

subdar ji,ati sundar....

ab bhi kehte hai ki likhna mikje kab aata ha.....?

ye or bhi khatarnaak baat!

kunwar ji,

अजय कुमार ने कहा…

गहरे दर्द मुखर हुए हैं ।

मनोज कुमार ने कहा…

उत्तम अत्माभिव्यक्ति!

आंच पर संबंध विस्‍तर हो गए हैं, “मनोज” पर, अरुण राय की कविता “गीली चीनी” की समीक्षा,...!