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शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

बदले अर्थ

रोने के भी क्या 
अर्थ होते हैं ?
हाँ , शायद 
एक रोना जब
दर्द हद से गुजरे तब
या कोई बच्चा रोये तब
या जब कोई अपना बिछुड़े तब
कभी विरह के
कभी ख़ुशी के
कभी गम के
अश्क उतरे जब भी
असर कर गए
मगर जब कोई 
स्वार्थ में रोये तब 
जब कोई दिखावटी रोये 
तब शायद 
अर्थ बदल जाते हैं 
न अश्क सच्चे होते हैं 
न रोना अर्थपूर्ण
मगर असर वो भी 
कर ही जाता है 
शायद
हकीकत से भी ज्यादा
आज दुनिया 
दर्द की इन्तिहाँ 
शोर में सुनती है
बिन ढलके जो 
अश्क जज़्ब होते हैं 
उस रोने का भी 
क्या कोई अर्थ होता है?
ये दुनिया अपने 
अर्थ बनाती है
अपनी कसौटी पर
परखती है और 
जहाँ जितना दिखावा हो 
उसे उतना ही 
ग़मज़दा समझती है 

शायद तभी आज 
रोने के भी 
अर्थ बदल गए हैं  

35 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर ने कहा…

बिलकुल आज रोने के अर्थ भी बदल गए हैं.यथार्थ को सामने रखती कविता.

सादर
-----------
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी जी के ब्लॉग पर आज मेरा लेख

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

bilkul sach...rone ke arth kya jindagi ke arth bhi badal gaye hain Vandana jee..:)

रश्मि प्रभा... ने कहा…

aansu ab sirf dikhawti ho gaye hain, sach to andar nam hua jata hai

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

bahuthi bhavapoorn rachana ...

अन्तर सोहिल ने कहा…

सही कहा जी
आज रोना भी स्वार्थ भरा है।
पसन्द आयी यह पोस्ट

प्रणाम स्वीकार करें

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

सही बात है ... आजकल गम से ज्यादा गम का दिखावा होता है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रोने के अर्थ तो होते हैं पर रोने वाला और देखने वाला अपने अनुसार अर्थ निकालता है ...अच्छी प्रस्तुति

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

Sahee kahaa aapne !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना...बधाई स्वीकारें...
नीरज

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आज दुनियाँ दर्द का इन्तहां शोर में सुनती है ,
बिन ढलके जो अश्क ज़ज्ब होते हैं,
उस रोने का भी क्या कोई अर्थ होता है ?
वंदना जी,
आपने यथार्थ का चित्रण बड़ी ही गहराई से किया है !
इस अभिव्यक्ति में हर आँसू का हिसाब है !
आभार !

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत प्रेरणा देती हुई सुन्दर रचना ...

ZEAL ने कहा…

You are right . Even the tears are seen in many perspective today . Some are overwhelmed by someone's tears while others consider it as crocodile tears .

Thanks and regards ,

.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

जब कोई स्वार्थ में रोये तब
जब कोई दिखावटी रोये तब
शायद अर्थ बदल जाते हैं
--
बहुत खूब!
इस अछूते विषय पर आपने बहुत बढ़िया लेखनी चलाई है!

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

sachmuch aaj rone ke arth badal gae he --?

सदा ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर गहन भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

हकीकत से भी ज्यादा
आज दुनिया
दर्द की इन्तिहाँ
शोर में सुनती है
सच में -' रोने के अर्थ बदल गए हैं'
बहुत सुन्दर !

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर रचना, सटीक बात!

Udan Tashtari ने कहा…

कौन कब और कैसे रोया..कितने अर्थ लिए होता है यह..


उम्दा रचना.

Deepak Shukla ने कहा…

Hi di..

Arth lagaye duniya kuchh bhi..
Par gam sada hi bhari rahta..
Nirjhar aansu bhahen aankh se..
Ya man kisi ka rota rahta..
Jis par gam hai, usi ne jaana..
Duniya ko hai kya dikhlana..
Apna gam hai sahna usko..
Gam ka dard hai hota jisko..

Sundar kavita..

Deepak..

saanjh ने कहा…

bohot sacche jazbaat....kya khoob andaaz mein kahe....bohot khoobsurat nazm

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सही कहा आप ने अपनी रचना मे, धन्यवाद

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बदलते जीवन मूल्यों पर एक सशक्त टिप्पणी है यह कविता...

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

रोने के जब मकसद बदलते हैं तो अर्थ भी बदल ही जाते हैं ।

Rakesh Kumar ने कहा…

Ye dunia to dunia hai,jis rang ka chashma pehno vaisa hi dikhlai dene
lagta hai.Per dil ki baat to dil tak hi jaati hai,rone ke kitne bhi
arth badle tab bhi.

रजनीश तिवारी ने कहा…

आज की दुनिया में दर्द, आँसू सभी कुछ तो बिकते हैं! ये विज्ञापनों की दुनिया है ! नाटकीयता और दिखावा बाजारू संस्कृति के मूल स्तम्भ हैं ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बदलती दुनिया है .. सभी कुछ बदल रहा है तो रोने का अर्थ भी तो बदलेगा ....

Kunwar Kusumesh ने कहा…

आपकी कविता अच्छी है .
वैसे अब घड़ियाली आंसूं ज्यादा बहाते हैं लोग.

anu ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति ... आज कल सबकुछ बनावटी है ..

daanish ने कहा…

ये दुनिया अपने अर्थ बनाती है
अपनी कसौटी पर परखती है ....

सच कहा आपने ... आज ऐसा ही तो है
रचना में एक सन्देश भी छिपा है
अभिवादन

rashmi ravija ने कहा…

ये दुनिया अपने अर्थ बनाती है
अपनी कसौटी परपरखती है
और जहाँ जितना दिखावा हो
उसे उतना ही ग़मज़दा समझती है

बिलकुल सटीक बात कही है...

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

जहाँ जितना दिखावा हो
उसे उतना ही ग़मज़दा समझती है ...

आज तो दिखावटी आंसू ही बहते हैं ....
सच्च के तो अन्दर ही सिसकते रहते हैं ....

मेरे भाव ने कहा…

रोने के अर्थ भले ही बदल जाए पर आंसू सच्चाई कह ही देते हैं . अच्छी रचना. शुभकामना.

मेरे भाव ने कहा…

रोने के अर्थ भले ही बदल जाए पर आंसू सच्चाई कह ही देते हैं . अच्छी रचना. शुभकामना.

Mithilesh dubey ने कहा…

गहरे भाव समेटे भावपूर्ण रचना ।


लौहांगना ब्लॉगर का राग-विलाप

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जब स्वयं के होने के ही अर्थ बदलने लगें तो रोने का क्या अर्थ?