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रविवार, 1 मई 2011

बता दे कोई…………

मोहब्बत कैसे होती है
बता दे कोई
हमे तो मोहब्बत ने
हर कदम रुसवा ही किया

किसी को कैसे
अपना बनाया जाता है
सिखा दे कोई
हमे तो हर किसी ने
हर कदम धोखा ही दिया

कैसे पतझड मे
गुलाब खिलाये जाते हैं
उगा दे कोई
हमे तो हर जगह 
जमीन बंजर ही मिली
 

34 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत सुंदर रचना जीवन की सच्चाई की बात....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

उम्मीद के खर पतवार
हटा दो और
बो दो बीज
मुहब्बत का
पथरीली हो गर धरती
तो चुन लो
सारे पत्थर और
सींच दो नेह के जल से
गुलाब
अपने आप खिलेगा .
:):)

खूबसूरत अभिव्यक्ति

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

मेरे ब्लौग 'बात का बतंगड' पर आइए....यहां भी मैने अपनी वेदना ही व्यक्त की है!

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना..आभार

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना ...

nilesh mathur ने कहा…

यही तो है ज़िन्दगी!

Dr Varsha Singh ने कहा…

VERY NICE.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

समय सबसे न्याय करता है।

akhtar khan akela ने कहा…

bhtrin drd bhri chubhan kaa ehsaas bhtrin prstuti ke liyen bdhaai . akhtar khan akela kota rajasthan

akhtar khan akela ने कहा…

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akhtar khan akela ने कहा…

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डॉ.सुभाष भदौरिया. ने कहा…

नज़र उनकी, ज़ुबां उनकी,
तअज्जुब है कि इस पर भी.
नज़र कुछ और कहती है,
ज़ुबां कुछ और कहती है.

आप मुहब्बत नहीं समझतीं ये ग़लत बयानी है आपकी वंदनाजी.
आपकी नज़र तो कुछ और ही कहती है.
अगर आपको मुहब्बत की समझ नहीं होती तो इतनी गहराई से आप इस जज़्बे बयान नहीं कर सकती थी.
मैने इस से पूर्व की अपनी टिप्पणी में आपकी इस समझ को सराहा था ऐसा कैसे हो सकता है?

बकौले मीरतकी मीर,

सारे आलम पे हूँ मैं छाया हुआ,
मुस्तनद है मेरा फ़र्माया हुआ.

मुस्तनद(प्रमाणित,authenticted)

M VERMA ने कहा…

बंजर में गुलाब खिलाने की यह ख्वाहिश इस प्रक्रिया का पहला पड़ाव ही तो है ...
बहुत सुन्दर

Rakesh Kumar ने कहा…

मोहब्बत में अहं बिलकुल ही गल जाता है
मिश्री का डला जैसे जल में घुल जाता है
अहं गल गया तो रुसवाई कैसी
आपके तजुर्बे पर हंसाई कैसी.

बुरा न मानियेगा वंदना जी,बस यूँ ही तुकबंदी कर डाली है.आपके जख्म भी तो आखिर फूलों ने ही दिए हैं.फिर काँटों से क्या शिकायत.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

maine to nahi diya

Shah Nawaz ने कहा…

बेहतरीन भाव!

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

सुंदर कविता| कोमल भाव| बधाई स्वीकार करें|

सतीश सक्सेना ने कहा…

आपने सोंचने पर मजबूर कर दिया ....शुभकामनायें आपको !

Anand Dwivedi ने कहा…

किसी को कैसे
अपना बनाया जाता है
सिखा दे कोई
हमे तो हर किसी ने
हर कदम धोखा ही दिया
..
झूठी जिंदगियां जीने की दौर में इतने साफगोई वंदना जी ....क़यामत हो जाएगी !

रूप ने कहा…

किसी को कैसे
अपना बनाया जाता है
सिखा दे कोई
हमे तो हर किसी ने
हर कदम धोखा ही दिया

सच है , प्यार की तलाश में कामयाब होना मुश्किल होता है !

कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नही मिलता !

Anand Dwivedi ने कहा…

क्या कल मैं आपसे ही मिला था.... ? या वो वंदना जी कोई और थीं...क्षमा प्रार्थी हूँ अगर आपही हैं तो एक बात बिंदास बोलूँगा ...की कल वाली वंदना जी एकदम अपनी सी लगी ! कहीं से भी भारी भरकम ब्लोगेर नही....जरा भी डर नही लगा बात करते हुए उनसे !......
और अगर आप नही है तो...आपके ब्लाग पर आकर किसी और की तारीफ करने के जुर्मे में आप जो चाहें वो सजा मुझे दे सकती हैं....सर झुककर स्वीकार करलूँगा

मनोज कुमार ने कहा…

आपकी इस कविता पे इतना ही कहना है, ..
जिसको चाहा वही मिला होता
तो मुहब्बत मज़ाक़ हो जाती

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर और भाव प्रणव रचना!
--
30 अप्रैल को हिन्दी भवन, दिल्ली में सभी ब्लॉगर साथियों से मिलना सुखद संयोग रहा।

आशुतोष की कलम ने कहा…

मोहब्बत का मतलब तो समर्पण होता है..जब सब कुछ उसे समर्पित फिर धोखा कैसा??..
प्रेमांकुर तो किसी भी जमीं पर फुट सकता है..
कविता के भाव सुन्दर हैं..

आशुतोष की कलम से....: धर्मनिरपेक्षता, और सेकुलर श्वान : आयतित विचारधारा का भारतीय परिवेश में एक विश्लेषण:

Arshad Ali ने कहा…

बहुत खूब .....सच्ची बात.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

मुहब्बत तो सिर्फ की जाती है उससे क्या मिला इसका हिसाब नहीं रखा जाता क्योंकि उसका काम सिर्फ देना होता है और मिलता तो उसको वही है जो उसकी किस्मत में होता है . वैसे ऐसा नहीं है प्यार गर प्राणी समझकर बांटा है तो बदले में प्रेम ही मिलता है चाहे मानव हो, पशु हो या पक्षी हो. उसको अपेक्षाओं से हम मुक्त रखेंगे तो कष्ट न होगा.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये सब सच है .. पर फिर भी प्यार जिंदा है सदियों से ऐसे ही चलता रहेगा ... लाजवाब ...

सदा ने कहा…

उम्मीद के खर पतवार
हटा दो और
बो दो बीज
मुहब्बत का

बहुत खूब कहा है इन पंक्तियों में ।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'हमें तो हर जगह
ज़मीन बंज़र ही मिली '

ह्रदय की गहराइयों तक पहुँचने में समर्थ ...सुन्दर रचना
................................................................................
आदरणीया वंदना जी ,
कृपया मेरे ब्लाग पर दुबारा आने का कष्ट करें क्योंकि गलती से अधूरी रचना ही पोस्ट हो पायी थी , अब सुधार कर दिया है |

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut hi acchi rachna...

Patali-The-Village ने कहा…

खूबसूरत, ह्रदय की गहराइयों तक पहुँचने में समर्थ|

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

खूबसूरत गीत...सुन्दर प्रस्तुति...बधाई.

विजय रंजन ने कहा…

Patjhar me gulab ka ugna,
mohabbat ka hona aur kisi ke apnatwa mein khud ko khona...achha lagta hai...
par jeevan ka hai yah saar...sab sapne bekaar...
bahut sacchi baat likhi Vandana ji aapne..

अविनाश मिश्र ने कहा…

Wah vandna jee.. Aapne to sachme rula hi diya... Bahut hi umda abhivyakti...
kabhi humare blog bhi aayen.. Avinash001.blogspot.com