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रविवार, 22 दिसंबर 2013

जानते हो मेरे इंतज़ार की इंतेहा

इश्क और इंतज़ार 
इंतज़ार और इश्क 
कौन जाने किसकी इंतेहा हुयी 
बस मेरी मोहब्बत कमली हो गयी 
और मेरे इंतज़ार के पाँव की फटी बिवाइयों में 
अब सिर्फ तेरा नाम ही दिखा करता है 
खुदा का करम इससे ज्यादा और क्या होगा 
देखूँ जब भी अपना चेहरा तेरा दिखा करता है 


जानते हो मेरे इंतज़ार की इंतेहा 
सारा शहर पत्थर हो गया 
हर नदी नाला सूख गया 
हर शाख जो हरी भरी थी 
पाला पड़ी फसल सी 
ज़मींदोज़ हो गयी 
दिल की जमीन ऐसी बंजर हुयी 
बादल कितना ही बरसें 
हरी होती ही नहीं 
शिराओं में जो बहती थी लहू बनकर 
मोहब्बत वहीँ थक्कों सी जम  गयी 
देख तो इंतेहा मोहब्बत की 
अश्क जो बहते थे आँखों से 
वहाँ अब तेरे नाम की इबादतगाह बन गयी 
चप्पे चप्पे पर तेरा नाम लिखा है 
आँख से झरना नहीं तेरा नाम झरा है 
क्या तू भी कभी ताप से नहीं शीत से जला है ……मेरी तरह महबूब मेरे!!! 

5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेम और प्रतीक्षा, एक दूसरे के प्रेरक व पूरक।

ana ने कहा…

kya baat......atiw sundar

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (23-12-13) को "प्राकृतिक उद्देश्य...खामोश गुजारिश" (चर्चा मंच : अंक - 1470) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Pallavi saxena ने कहा…

प्यार का दूसरा नाम ही प्रतीक्षा है।

Anita (अनिता) ने कहा…

इश्क़ और इंतज़ार … और उसकी इन्तेहा .... ~ सुन्दर अभिव्यक्ति !
~
सादर