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रविवार, 22 मार्च 2015

मन की बात

मन की बात कहने का चलन नया शुरू हुआ 
सोचा कर लूँ दो बात मैं भी मन की 
मगर उसके साथ ही ये विचार 
अंगडाइयां भरने लगा 
क्या इतना आसान है मन की बात करना ?

हाँ मेरा मन हो या तेरा मन या उसका मन 
सबके मन में पैठे हैं कुछ गहरे राज 
कुछ अपनों के नाम पर दिए ज़ख्मों के अमलतास 
तो कुछ बेगानों के उछाले सुर्ख गुलाब 
काँटों की चुभन संग लगाते हैं रोज चीरा 
और तुम होते हो उनके साथ मुस्कुराने को मजबूर 

सिर्फ इतना होता तो काफी था 
यहाँ तो वक्त से पहले 
जिंदा चिनवा दी जाती हैं 
तुम्हारे स्वाभिमान की अनारकलियाँ
बेवजह चढवा दिए जाते हो सूली पर 
सच कहने के इल्ज़ाम में 
होता है रोज जहाँ 
तुम्हारी भावनाओं का बलात्कार 
तोहमतों की फसल बखूबी लहलहाती है जहाँ 
वहां कैसे संभव है मन की बात कहना 

शीत युद्ध की भांति 
मन की बात 
बन जाती है किसी के लिए आरामगाह 
तो किसी के लिए मैदाने जंग 
फर्क समझना जरूरी है यहाँ 
कि तुम किस तरफ खड़े हो 
पक्ष और प्रतिपक्ष चिन्हित होते ही हैं 
राजनैतिक मोहरों की तरह 
और तुम नहीं हो राजनीतिक सिपहसलार 


मन की बात कहने का हक़ यहाँ 
सिर्फ सुपर शक्तियों तक ही सीमित हुआ करता है 
आम इंसान हो तुम 
और आम इंसान के मन नहीं हुआ करते 
फिर कैसे कर सकते हो तुम मन की बात 
जानते हुए ये सत्य 
मन की बात कहते ही हो जाओगे  जिलावतन 
फिर वो शहर हो घर हो राजनीति हो या साहित्य ...........

2 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

आसान नहीं है मन की बात सहज ही कह देना ...
कई प्रश्न खड़े कर देता है ....

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

भारतीय नववर्ष एवं नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (23-03-2015) को "नवजीवन का सन्देश नवसंवत्सर" (चर्चा - 1926) पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'