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सोमवार, 16 मार्च 2015

तो फिर दो हाथ में हाथ (इक प्रेम कहानी )

सुनो 
तुमने मुझे सही समझा 
तुम्हारी कविता में जैसे मै खुद से मिला

क्या सच में या मन रखने को कह रहे हो ? 

सच में मगर हैरत में हूँ 
इतनी दूर से भी कोई किसी को 
इतनी गहराई से कैसे समझ सकता है ?

दूर से ही तो इंसान ज्यादा समझ सकता है
पास रहकर तो दूरियाँ ज्यादा बढती हैं .......जानते हो न 

हाँ जानता हूँ फिर भी जाने क्यों लगा 
कोई मुझे कैसे इतनी अच्छे से समझ सकता है 
क्या ऐसा भी हो सकता है 

हाँ हो सकता है 
बशर्ते कोई आपकी शख्सियत से प्रभावित न हुआ हो
दूर खडा सिर्फ़ आपके क्रिया कलाप को गुन रहा हो 
कितनी सघन संवेदना है  
कितनी प्यास की तीव्रता है  
कितनी बची जिजीविषा है 
आसान होता है उसके बाद समझना 
जानते हो क्यों
क्योंकि 
जब आप दूर खडे किसी को देखा करते हो
उससे न कोई लगाव रखते हो 
बस एक द्रष्टा की भांति 
उसके ह्रदय में झाँका करते हो 
कहीं न कहीं 
अपनी ही कोई अस्फ़ुट प्रतिक्रिया वहाँ देखा करते हो ,
अपना ही कोई प्रतिबिम्ब वहाँ छलका करता है 
अपना ही अकथ्य वहाँ मुखर हुआ करता है
तब आसान हो जाता है आईने में अक्स को उभारना 

शायद सच कह रही हो तुम 
तुमसे एक अपनत्व सा होने लगा है 
सुनो 
मुझे कभी भूलोगी तो नहीं ?

ये प्रश्न आखिर क्यों ? 
मै तो जिसे अपना मान लेती हूँ 
दिल में जगह दे देती हूँ 

इसका मतलब नही भूलोगी ? 
ये तुम सोचो इसका क्या मतलब निकलता है 

तुम ही बता दो न 


मतलब हाँ और न का खेल है 



समझा नही 



मतलब हाँ कहूँ तो ही मानोगे कि नही भूलूँगी 

क्या इतना भी विश्वास नहीं 


है न ...

है तो फिर पूछना क्या 
अपना विश्वास पक्का होना चाहिए 
फिर तो आस्माँ भी धरती पर उतर आता है 


सही कहती हो शायद 
बहुत छला गया हूँ इसलिए संभल कर घूँट भरा करता हूँ
हर रिश्ते को शक की निगाह से देखा करता हूँ 


ओ अजनबी !यूँ न परेशान हो 
वक्त की करवटों से न हैरान हो 
बेशक सफ़र के राही हैं हम
फिर भी यूँ ही न मिले हैं हम 
शायद कहीं किसी खुदा की कोई मर्ज़ी हो 
शायद किसी खुदा की तूने की इबादत हो 
जो आज यूँ मुलाकात की शम्मा जलायी हो 


सुनो 
तुम्हारी बातें सुकून दे रही हैं 
सुकून से ज्यादा तो मेरे दिल में घर कर रही हैं 
लगता है आज पिघल जायेगा आस्माँ और झुक जाएगा धरा के कदमों पर


अरे अरे क्या सोचने लगे 
कहाँ खोने लगे 
किस आस्माँ पर ख्वाबों का महल बनाने लगे 


नहीं अब कुछ मत कहना 
बस चुप रहना 
जो कह रहा हूँ बस सुनती रहो 
और आँख बन्द कर संग मेरे चलती रहो 
सुनो 
दोगी न साथ ?


उफ़! तुमने ये क्या प्रश्न किया 
मुझसे मेरा वजूद ही छीन लिया 
अब क्या कहूँ किसे कहूँ याद नहीं
ये तो मेरी तपस्या की सम्पूर्णता हुई 
जो तुम्हारे ख्वाबों की शहज़ादी हुई 
कहो कहाँ चलना होगा , 
किस लोक में भ्रमण करना होगा 


तो फिर दो हाथ में हाथ और मूँद लो अपनी आँख 
मेरे काल्पनिक संसार से मेरी हकीकत के सफ़र तक 
आओ चलो चलें थामे इक दूजे का हाथ

4 टिप्‍पणियां:

Rangraj Iyengar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Rangraj Iyengar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Rangraj Iyengar ने कहा…

अनुभूतियों के संसार का खूबसूरत चित्रण...

वाह !
बधाई स्वीकारें.

अयंगर.

janta ki khoj ने कहा…

la jwab