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मंगलवार, 13 जून 2017

ये जानते हुए कि ...

ये जानते हुए
कि
नहीं मिला करतीं खुशियाँ यहाँ
चाँदी के कटोरदान में सहेज कर
जाने क्यों
दौड़ता है मनवा उसी मोड़ पर

ये जानते हुए
कि
सब झूठ है, भरम है
ज़िन्दगी इक हसीं सितम है
जाने क्यों
भरम के पर्दों से ही होती है मोहब्बत

ये जानते हुए
कि
वक्त की करवट से बदलता है मौसम
और ज़िन्दगी क्षणभंगुर ही सही
जाने क्यों
ज़िन्दगी से ही इश्क होता है यहाँ

सिफ़र से शुरू सफ़र सिफ़र पर ही ख़त्म होता है जहाँ
फिर किस पाहुन की पहुनाई करूँ यहाँ ??


2 टिप्‍पणियां:

sweta sinha ने कहा…

बहुत सुंदर रचना आपकी👌👌

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (15-06-2017) को
"असुरक्षा और आतंक की ज़मीन" (चर्चा अंक-2645)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक