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रविवार, 18 जून 2017

ब्रह्म वाक्य


दुःख दर्द आंसू आहें पुकार
सब गए बेकार
न खुदी बुलंद हुई
न खुदा ही मिला
ज़िन्दगी को न कोई सिला मिला 


यहाँ
रब एक सम्मोहन है
और ज़िन्दगी एक पिंजर
और तू
महज साँस लेती
भावनाओं से जकड़ी एक बदबूदार लाश 


ये जानते हुए
कि यहाँ कोई नहीं तेरा
चल फकीरा उठा अपना डेरा
और गुनगुनाता रह ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
ये ब्रह्म वाक्य 


यहाँ मैं अजनबी हूँ ...मैं जो हूँ बस वही हूँ

3 टिप्‍पणियां:

Jyoti Khare ने कहा…

वाकई अपने ही लोग विष उगलते हैं
बहुत बढ़िया


मेरे भी ब्लॉग में पधारें
सादर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (20-06-2017) को
"पिता जैसा कोई नहीं" (चर्चा अंक-2647)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Satish Saxena ने कहा…

बहुत खूब ,
हिन्दी ब्लॉगिंग में आपका लेखन अपने चिन्ह छोड़ने में कामयाब है , आप लिख रही हैं क्योंकि आपके पास भावनाएं और मजबूत अभिव्यक्ति है , इस आत्म अभिव्यक्ति से जो संतुष्टि मिलेगी वह सैकड़ों तालियों से अधिक होगी !
मानती हैं न ?
मंगलकामनाएं आपको !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग