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मंगलवार, 10 जून 2008

मेरा घर

विरानियाँ हैं घर मेरा
तन्हैयाँ हैं साथी
और गम हैं पड़ोसी
दिल कभी परेशां कैसे हो
जब ऐसा सुखद साथ हो
कोई खुशी दमन को छुए कैसे
जब हर तरफ़ रंजो गम की बरसात हो
मेरे घर में हमेशा दर्द का पहरा रहता है
अश्कों से हमेशा दामन भीगा रहता है

यह तो वो हरियाली है
जो कभी मुरझाती नही
ऐसी ब्हार है जो
आकर कभी जाती नही

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वन्दना जी।
आपका शब्द संयोजन अच्छा है,
बधाई।