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शनिवार, 14 जून 2008

अहसास

हर गम दुनिया में सभी को नसीब नही होता
कोई चाहने वाला दिल के करीब नही होता
मुस्कुराते हम भी हर महफ़िल में ज़माने की
गर किसी का दिया दर्द दिल के करीब नही होता

यह कहाँ ले आई तकदीर आज मुझे
की अपना साया भी आज नज़र आता नही
किसी और को अब क्या चाहेंगे
जबकि अपने आप को भी चाह जाता नही


हर सुबह मेरी अँधेरी हो गई
हर शाम मेरी कहीं खो गई
कहाँ गए वो मदमस्त दिन
खो गया कहीं अल्हड़पन
ज़िंदगी मेरी गम की शाम हो गई
हर रात मेरी परेशां हो गई
यूं तो होती हूँ हर वक्त ही तनहा
फिर भी तन्हाई मेरी तनहा हो गई


दिल जो एक बार टूटा टूटता ही चला गया
तेरा प्यार जो मुझसे rootha तो toothta ही चला गया


ऐ खुदा मेरे हिस्से की सब खुशी उन्हें दे दे
उनके हिस्से के सभी गम मुझे दे दे
मेरे नसीब की महफिलें हों उन्हें नसीब
उनके नसीब की तन्हैयाँ भी मुझे दे दे

तनहाइयों की महफिलें सज़ा लेंगे हम
वीरानियों में दिल बहला लेंगे हम
मगर तुझसे खुशी न मांगेंगे कभी
अपनी हर खुशी भी तुझपे लुटा देंगे हम
तेरे नाम पे यह ज़िंदगी लुटा देंगे हम
ऐसी मौत को हंसकर गले लगा लेंगे हम

ग़मों का काफिला है पीछे मेर यह पता है उसे
फिर भी जहाँ का हर गम दे गया है मुझे

मुझे ज़िंदगी मिली आंसू बनकर
हर गम मिला ज़ख्म बनकर
बेरुखी मिली दर्द में ढलकर
प्यार भी मिला तो नफरत बनकर

दूरियां इतनी न बढाओ की फिर पास न आ सकें
गर पास आयें तो नज़रें मिला न सकें
नज़रें मिला भी लें तो एक दूसरे को अपना भी न सकें
इसलिए तोड़ दो यह बंधनों की दीवार,जिसके पार हम जा सकें

ज़िंदगी तड़प रही थी किसी की
मौत हंस रही थी उसकी
ज़िंदगी ने चाह मिल जाए मौत ही
मगर उसने भी साथ न दिया ज़िंदगी का
कितनी मजबूर थी ज़िंदगी जीने के लिए
तड़प के आगोश में जलने के लिए

बहुत तरसा था यह दिल तनहाइयों के लिए कभी
अब घेरा है तन्हैयेओं ने इस कदर की फुरसत नही महफिलें सजाने की

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