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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

कुछ करूँ तेरे लिए

आ आंखों ही आंखों में
तेरी आत्मा को चूम लूँ
बिना तेरा स्पर्श किए
तेरे हर अहसास को छू लूँ
बिना तेरा नाम लिए
तेरी ज़िन्दगी को रोशन कर दूँ
तेरे हर ख्वाब को
बिना तेरे देखे पूरा कर दूँ
तेरे हर ज़ख्म को
बिना तुझ तक पहुंचे
अपने सीने में छुपा लूँ
तेरी हर साँस पर
अपनी सांसों का पहरा लगा दूँ
तेरे हर मचलते अरमान को
बिना तेरे जाने
अपने आगोश में ले लूँ
तेरी हर उदासी को
बिना तुझ तक पहुंचे
ख़ुद में समेट लूँ
तेरी आत्मा के हर बोझ को
बिना तेरे झेले
मैं ख़ुद उठा लूँ
आ तेरी रूह की थकन को
कुछ सुकून पहुँचा दूँ

3 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

सच्ची आपके लिखे भाव जी को छूते है।

तेरी आत्मा के हर बोझ को
बिना तेरे झेले
मैं ख़ुद उठा लूँ
आ तेरी रूह की थकन को
कुछ सुकून पहुँचा दूँ

वाह क्या कहने।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

वाह..वा....बहुत संवेदनशील रचना है ये आप की.... शब्दों का चयन अद्भुत है...वाह...
नीरज

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

आ तेरी रूह की थकन को
कुछ सुकून पहुँचा दूँ
the ultimate punch lines ..

waah ji waah , kya baat kahi hai ..

badhai ..