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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

काव्य के नए मानक गढ़ने दो

क्यूँ बंदिशों में बांधते हो
क्यूँ बन्धनों में जकड़ते हो
भरने दो इन्हें भी उड़ान
नापने दो इन्हें भी दूरियां
छूने दो इन्हें भी आसमान
कर सकते हो तो इतना करो
हौसले इनके बढ़ाते चलो
मार्ग प्रशस्त करते चलो
 

क्यूँ लिंगभेद के उहापोह में
दिग्भ्रमित करते हो
रचना तो सबकी होती है
जनक चाहे कोई भी हो
क्यूँ स्त्री पुरुष के भेद को
ना पाट पाते हो
क्यूँ सृजनात्मकता पर
अंकुश लगाते हो
 

काव्य ---स्त्री या पुरुष
की थाती नहीं
सिर्फ कोमल भावों का
ही तो सृजन होता है
फिर पुरुष हो या स्त्री
भावों पर तो किसी का
जोर नहीं
तब तुम क्यूँ 

बाँध बनाते हो
उड़ने दो 

उन्मुक्त हवाओं को
बहने दो समय की
धारा के साथ
एक दिन ये भी
नया आकाश 

बना देंगी
इन्हें भी रूढ़ियों
को बदलने दो
काव्य के नए 
मानक गढ़ने दो


दोस्तों
ये रचना कल की पोस्ट की ही उपज है क्यूँकि कुछ लोग सोचते हैं कि स्त्री को स्त्री के भावों पर ही लिखना चाहिये और पुरुष को पुरुष् के भावों पर मगर मेरे ख्याल से तो भावों को बांधा नही जा सकता इसलिए फिर चाहे स्त्री हो या पुरुष वो जो भी मह्सूस करे उसे लिखने देना चाहिये …………हो सकता है काव्य की दृष्टि से ये बात सही हो मगर मुझे इसका ज्ञान नही है और जरूरत भी नही है क्यूँकि भाव तो किसी भी बंधन को स्वीकार नही करते………बस कल यूँ ही ये भाव बन गये तो आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिये।

25 टिप्‍पणियां:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

एक सार्थक और सृजनात्‍मक विचार के लिए अर्थवान कविता। आपकी कविता से शैलेन्‍द्र के गीत की एक पंक्ति याद आई-तो अपने आंचल को परचम बना लेती तो अच्‍छा था।
वंदना जी सलाम आपको। आप अपने आंचल को परचम बना रही हैं। हम आपके साथ हैं।

Sunil Kumar ने कहा…

अच्छे विषय पर आपने ध्यान दिलाया है एक अच्छी कविता ,बधाई

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

वन्दना जी, बहुत ही सुन्दर और बहुत ही प्यारा जबाब......मन प्रफुल्लित हुआ।
होंसले सभी के बढाते चलो,
मार्ग सभी का प्रशस्त करते चलो,
भावों पर किसी का जोर नहीं,
स्त्री-पुरूष का भेद मिटाते चलो,
फिर से नया गीत गाते चलो............

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सही बात है ...

Vinay Prajapati 'Nazar' ने कहा…

वाह सुन्दर रचना है

shikha varshney ने कहा…

वाह वंदना जी ! आज तो दिल की बात कह दी आपने ..एक एक शब्द सच्चाई से भरा है.सच सृजन्त्मकता को लिंग भेद में क्यों बांधना..
बहुत बहुत सार्थक रचना.

अजय कुमार ने कहा…

सहमत हूं ,पहले से ।अच्छी अभिव्यक्ति ।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

वन्दना जी . रचना मे व्यक्त भावनाएँ सार्वजनीन हैं । किसी भी प्रकार का वर्गीकरण सृजन को पक्षपात पूर्ण बनाता है ।
प्रशंसनीय कविता । बुद्धि का प्रभाव ।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

पुरुष हो या स्त्री
भावों पर तो किसी का
जोर नहीं.... bilkul sahi likha

M VERMA ने कहा…

उन्मुक्त हवाओं को
बहने दो समय की
धारा के साथ
एक दिन ये भी
नया आकाश
बना देंगी
बहुत खूबसूरत और औचित्यपरक चाहत है
नया आकाश तो चाहिये ही ....

महफूज़ अली ने कहा…

मैं अब फ्री हो गया हूँ.... थोडा सा... अब से रेगुलरली आऊंगा... थोड़ी सी माफ़ी... आज की पोस्ट बहुत सार्थक और अच्छी लगी....

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

काव्य ---स्त्री या पुरुष
की थाती नहीं
सिर्फ कोमल भावों का
ही तो सृजन होता है
फिर पुरुष हो या स्त्री
भावों पर तो किसी का
जोर नहीं
तब तुम क्यूँ
बाँध बनाते हो
उड़ने दो
उन्मुक्त हवाओं को


yatarth aur aadarsh ka yathochit sampreshan. ek nai parikalpna ke sath jiski aaj samaj ko mahti aawashyakka hai. Sarthak aur uddeshya parak sandeshprad rachna ka bhapoor swagat aur shaktibhr samarthan.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी रचना आज के चर्चा मंच पर है

http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/217_17.html

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर और सराहनीय रचना....सन्देश देती हुई....

sanu shukla ने कहा…

sundar rachna....

दीपक 'मशाल' ने कहा…

लोगों की ऐसी सोच से मैं भी सहमत नहीं... बढ़िया लिखा..

rashmi ravija ने कहा…

क्यूँ लिंगभेद के उहापोह में
दिग्भ्रमित करते हो
रचना तो सबकी होती है
जनक चाहे कोई भी हो
क्यूँ स्त्री पुरुष के भेद को
ना पाट पाते हो
क्यूँ सृजनात्मकता पर
अंकुश लगाते हो
बहुत सही कहा वंदना...एक जगह मैने भी एक बार निवेदन किया था कि कृपया, लकीर ना खींचें इनके मध्य
बेहद सार्थक रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत ही सुन्दर मनोविश्लेषण है!
--
शुभकामनाएँ!

Rajey Sha ने कहा…

इस बात को समझना चाहि‍ये कवि‍ता में ही नहीं जीवन में भी। चीजों को समग्रता में देखा जाना चाहि‍ये ना कि‍ टुकड़ों में।

arun c roy ने कहा…

बहुत सही बात कह रही हैं आप ! लेकिन ऐसी कोई पाबंदी तो साहित्य में है नहीं ! सुमित्रानंदन पन्त जी की कई कवितायें ऐसी लगती हैं मानो किसी स्त्री ने लिखे हो... मोहन राकेश के नाटकों में स्त्रियों के भाव भी खुल कर सामने आये हैं! फिर भी साहसी रचना

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Ling-bhed ki uha-poh main..
Duniya uljhi yaha vahan..
Blog jagat bhi es charcha se..
Bhala achhuta kahan raha..

'Kavita' ko gar mahila samjhen..
'bhav' purush-lingi rahte..
Enke yog se jo upje to..
Unko 'geet' hain sab kahte..

Rachnatmakta ek antarman ka bhav hai, jise ling-bhed ki drushti se dekhna sarvth anuchit hai..

Deepak..

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

आप ने जिस बात का रेफरेंस दिया हें उसे भी पढ़ा था और राजेश उत्साही जी की बात भी सही लगी थी की कवी मन तो कविता करता है उसके लिए स्त्री पुरुष का भेद नहीं होता.

और आपने इस विचार को अपनी कविता में ढाल का सगठित कर दिया. बहुत अच्छी कविता लिखी..सबके से मन की बात.

बधाई.

Science Bloggers Association ने कहा…

सचमुच आपकी हर रचना में नए मानक गढ जाते हैं।
................
नाग बाबा का कारनामा।
महिला खिलाड़ियों का ही क्यों होता है लिंग परीक्षण?

शरद कोकास ने कहा…

और क्या ।

ज्योति सिंह ने कहा…

aapki baaton se sahmat hoon ,aur shikha ji ki baaton se bhi ,sundar kaha .