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शनिवार, 31 जुलाई 2010

ज़िन्दगी का हिसाब -किताब

ज़िन्दगी के 
हिस्से होते रहे
टुकड़ों में 
बँटती रही 
बच्चे की
किलकारियों सा
कब गुजर 
गया बचपन 
और एक हिस्सा  
ज़िन्दगी का
ना जाने 
किन ख्वाबों में
खो गया
मोहब्बत ,कटुता 
भेदभाव,वैमनस्यता
अपना- पराया 
तेरे- मेरे 
की भेंट 
दूजा हिस्सा 
चढ़ गया
कब आकर 
पुष्प को
चट्टान 
बना गया
पता ही ना चला
आखिरी हिस्सा 
ज़िन्दगी का
ज़िन्दगी भर के 
जमा -घटा 
गुना -भाग 
में निकल गया
यूँ ज़िन्दगी 
टुकड़ों में
गुजर गयीं
कुछ ना हाथ लगा 
और फिर अचानक
मौसम बदल गया
इक अनंत
सफ़र की ओर
मुसाफिर चल दिया 

25 टिप्‍पणियां:

देवेश प्रताप ने कहा…

आपने इस रचना में इंसान के जन्म से लेकर अंतिम सफर तक का चित्रित वर्णन कर दिया ......बहुत खूब .

महफूज़ अली ने कहा…

सच में बचपन कब गुज़र गया पता ही नहीं चला.... पर अन्दर का बच्चा अभी तक ज़िंदा है...

बहुत अच्छी लगी येह्कविता... दिल को छू गई...

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दरता से बखाना जिन्दगीनामा..बढ़िया.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ज़िन्दगी तो यूँ ही रेत की तरह फिसलती है, एक प्यार का पौधा लगाओ- एहसासों के फल वक़्त को रोकेंगे

sanu shukla ने कहा…

bahut hi sundar rachna..!!

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

bahut sundar vichaar vandana ji .. jeevan ke safar ko aapne acchi tarah se darshaya hai .
meri badhayi sweekar kijiye

aapka abhar

राजेश उत्‍साही ने कहा…

अल‍विदा मुसाफिर।

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

सचमुच true emotions hain...
बहुत बढ़िया लिखती हैं आप...बधाई....

अजय कुमार ने कहा…

जीवन का कच्चा चिट्ठा ।

hem pandey ने कहा…

इस टुकड़ों वाली जिन्दगी को समग्रता से जीना ही जीवन है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जीवन यात्रा को बखूबी लिखा है...सुन्दर रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इक अनंत
सफ़र की ओर
मुसाफिर चल दिया
--
सत्य से साक्षात्कार कराती
सारगर्भित रचना के लिए बधाई!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बचपन से कितना बटता जाता है जीवन का ध्यान विभिन्न सम्बन्धों में, कुछ घटना व जुड़ना पता ही नहीं चलता है।

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

हिसाब-किताब की काफी पक्की लगती हैं ।
वैसे, अच्छी कविता है !

मनोज कुमार ने कहा…

इस सहज, सरल मगर जटिल कविता की अंतर्ध्‍वानियां देर तक और दूर तक हमारे मन मस्तिष्‍क में गूंजती रहती है । जीवन के बुनियादी मुद्दों पर केंद्रीत यह कविता हमें विचलित तो करती ही है, यह सोचने के लिए बाध्‍य भी करती है कि अपने आसपास की जिंदगी से सरोकार रखने वाली इन स्थितियों के प्रति हम इतने भयावह रूप में असंवेदनशील और निलिपित क्‍यों हैं ?

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 01.08.10 की चर्चा मंच में शामिल किया गया है।
http://charchamanch.blogspot.com/

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

जीवन के सत्य को उजागर करती हुई रचना!
इस रचना को प्रत्येक व्यक्ति अपने
जीवन का हिस्सा बना ले तो
मानव जीवन सार्थक हो जाये।

kumar zahid ने कहा…

आखिरी हिस्सा
ज़िन्दगी का
ज़िन्दगी भर के
जमा -घटा
गुना -भाग
में निकल गया
यूँ ज़िन्दगी
टुकड़ों में
गुजर गयीं
कुछ ना हाथ लगा


saheeh kahaa --zindagi ki ek sachchi tasveer..
khoobsurat..

upendra ने कहा…

jindgi ki ek sachchi haqikat........
bahoot achchhi lagi

आशीष मिश्रा ने कहा…

bahot hi badhiya

'अदा' ने कहा…

बहुत गहरे विचार...
सुन्दर रचना...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

छोटे छोटे लफ़्ज़ों में ज़िन्दगी का पूरा फलसफा बयां कर दिया आपने...ये हुनर आप ही कर सकती हैं..बेहतरीन...
नीरज

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

मनुष्य जीवन की यही सच्चाई है!...बहुत सुंदर रचना!

Vandana ! ! ! ने कहा…

aap bahut achcha likhti hai vandana ji.....aapke blog me kafi dino bad aayi hun... padhkar bahut achcha laga.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जीवन का लेखा जोखा लिख दिया आपने इस रचना में ... पर फिर भी चलना तो नियति है इंसान की .........