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गुरुवार, 22 जुलाई 2010

मानव! व्यर्थ भूभार ही बना

ज़िन्दगी व्यर्थ 
वक्त की बर्बादी 
नतीजा---शून्य 
अगर किसी एक 
को भी अपना 
ना बना पाया 
या किसी का
बन ना पाया
मानव!
व्यर्थ भूभार 
ही बना
अगर कोई एक
कर्म ना 
किया ऐसा 
जिसे याद 
रखा जा सके 
पूजा का ढोंग
तेरा 
व्यर्थ गया
ढकोसलों में 
ढकी शख्सियत
तेरी 
व्यर्थ गयी
अगर किसी 
एक आँख का
आँसू ना 
पोंछ सका
मानव !
तू तो 
खुद से ही 
हार गया
अगर
"मैं " को ही
ना जीत पाया
जीवन तेरा
व्यर्थ ही गया
खाली हाथ आया
और खाली ही
चल दिया

22 टिप्‍पणियां:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वंदना जी आजकल तो आप सीधे सीधे मारक सवाल करती हैं
।पाठक को लगता है बस ये उससे ही पूछा जा रहा है। आपकी इस मारक कविता से मेरे अंदर यह कविता उभरी-
सच है
आएं हैं खाली हाथ
जाएंगे भी खाली हाथ ही
हो सकता है किसी के न बन सकें हों,
पर इतना यकीं है कईयों को अपना बनाया है
न पोंछ सकें हो आंसू शायद
पर अपनी वजह से किसी की आंख में न आसूं आया है
भार तो फिर भी रहा है अपना
हां भू को हर वक्‍त आभार जताया है।

rashmi ravija ने कहा…

अगर किसी
एक आँख का
आँसू ना
पोंछ सका
मानव !
तू तो
खुद से ही
हार गया
बिलकुल सच कहा है....व्यर्थ है फिर जीवन..

Sunil Kumar ने कहा…

सारगर्भित रचना बधाई

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

bhaut hee achhee rachna vandana ji...intersting

arun c roy ने कहा…

bahut hi saarthak rachna! kai prashn uthati hai ye rachna jiske uttar hume dhoondhne honge.. eak aur achhi rachna ke liye badhai !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर ....शिक्षा देती रचना....मैं ही जीतना मुश्किल है..

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

वन्दना जी, बहुत सुन्दर उद्‍गार!
जीवन व्यर्थ चला जाता है,
समय बर्बाद हो जाता है,
यदि अपना उसको ही न सके
जो जीवन में ही क्या?
मरने के बाद भी
अपना ही रहता है!
जय श्री कृष्णा!!!

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत सुन्दर ....

*************
'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

सचमुच, मानव के कुकृत्यों पर गम्भीर व्यंग्य किया है आपने।
………….
अथातो सर्प जिज्ञासा।
संसार की सबसे सुंदर आँखें।

Vinay Prajapati 'Nazar' ने कहा…

क्या कहूँ आपकी सभी रचनाएँ सुन्दर होती हैं


----
तख़लीक़-ए-नज़र
तकनीक-दृष्टा
चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें
The Vinay Prajapati

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

यही तो जीवन का सार है!
--
बहुत सुन्दर रचना है!

मनोज कुमार ने कहा…

खाली हाथ आया और खाली ही चल दिया!

मनोज कुमार ने कहा…

खाली हाथ आया और खाली ही चल दिया!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अतः सयत्न अस्तित्व को हल्का बनाये रखना चाहिये।

एक विचार ने कहा…

बहुत सुन्दर

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

sahi hai ji , ek dum sahi hai .. kya khoob likha hai aur aaj ke insaan ke man ko jhakjhorte hue likha hai .. badhayi

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

अगर किसी
एक आँख का
आँसू ना
पोंछ सका
मानव !
तू तो
खुद से ही
हार गया
अगर
"मैं " को ही
ना जीत पाया
जीवन तेरा
व्यर्थ ही गया

jeewan ko sarthkta aur uddeshy park sandesh deti jhkjhor dene wali ek atyant bhawprn rachna. Badhai.

सतीश सक्सेना ने कहा…

दूसरों के कष्ट के प्रति संवेदनशील लोग ही सम्मान के अधिकारी होते हैं ! शुभकामनायें वंदना जी !

sanu shukla ने कहा…

umda rachna,..!!

सलीम ख़ान ने कहा…

waise sahi hi kaha aapne !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा ... अगर इंसान इस नैन को जीत ले तो पूरी दुनिया जीती जा सकती है ... बहुत अनुपम अभिव्यक्ति है ...

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

बहुत ही खरी खरी बातें सुना दी वंदना जी .....!!

कविता जीवन की सच्चाई पेश करती है ....सही कहा आपने.....

रात गंवाई सोये के दिवस गवायो खाय
हिरा जन्म अमोल का कौड़ी बदले जाय