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रविवार, 14 दिसंबर 2008

एक कांटा चुभा दिल में
आह भी निकली
दर्द भी हुआ
मगर
हर सिसकी जैसे
रेत में पड़ी बूँद
की मानिन्द
कहीं खो गई

2 टिप्‍पणियां:

"अर्श" ने कहा…

bahot khub likha hai aapne... dhero badhai aapko sahab...

arsh

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

आपकी कविता पढ़कर मुझे याद आया कि;
दर्द की दवा है दर्द का हद से गुज़र जाना