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गुरुवार, 5 मार्च 2009

Wednesday, September 17, 2008

हमसफ़र साथ होते हुए भी तनहा हूँ मैं
ज़िन्दगी इससे बड़ी और क्या सज़ा देगी हमें

Thursday, September 11, 2008

मेरे आँगन में न उतरी धूप कभी
तब कैसे जानूं उसकी रौशनी है क्या
न बुन सकी कभी तमन्नाओं के धागे
न जोड़ सकी यादों के तार कभी
न जला सकी प्यार के दिए कभी
इस डर से की अंधेरे और न बढ़ जायें
माना नही ठहरती धूप किसी भी आँगन में
मगर मेरे आँगन में तो धूप की एक
छोटी सी किरण भी न उतर सकी
भला कैसे जानूं मैं किस तरह
खिला करती है धूप आँगन में
एक परछाईं हूँ ,न जाने कब गुम हो जाऊँ,
न करो इससे प्यार,एक छलावा हूँ,सिर्फ़ छलना जानती हूँ,
मुझे पकड़ने की दौड़ में कहीं तुम बहुत आगे न निकल आना
ज़माना साथ न दे सकेगा,तुम्हें ही पीछे जाना पड़ेगा,
एक साया सा हूँ मुझे छूने की कोशिश न कर,
कहीं ऐसा न हो ,तुम्हारा अपना साया ही
तुम्हारा साथ न छोड़ दे ।
आसमान पर लगे हैं हम तारों की तरह
न जाने किस दिन टूट कर गिर जायें






हो चुकी है रहगुजर कठिन
मुश्किल से मिलेंगे नक्शे कदम
वक्त की आंधियां चलीं कुच्छ इस कदर
कि हम झड़ गए ड़ाल से सूखे हुए पत्तों की तरह
हर आँचल हो पाक ये जरूरी तो नही
हर आइना हो साफ़ ये जरूरी तो नही
हर फूल में हो खुशबू ये जरूरी तो नही
हर खुशी हो अपनी ये जरूरी तो नही
हर अपना हो अपना ये जरूरी तो नही
इसलिए
हर चेहरा हो खिला ये जरूरी तो नही

Tuesday, September 9, 2008

मेरी मुस्कराहट तो एक ऐसा दर्द है
जो छुपाये बनता न दिखाए बनता





हर तरफ़ ये तूफ़ान सा क्यूँ है
हर इन्सान परेशां सा क्यूँ है
हर जगह ये सन्नाटा सा क्यूँ है
ये शहर भी वीरान सा क्यूँ है
क्या फिर किसी का दिल टूटा है
क्या फिर कोई बाग़ उजड़ा है
क्या फिर किसी का प्यार रूठा है
क्या फिर कोई नया हादसा हुआ है
शायद फिर से खंडहर बन गया है कोई
या ग़मों के हर दौर से गुजर गया है कोई
हर सितम सहूंगी उसके ये इकरार करती हूँ
इसे बेबसी कहूं या क्या कहूं,क्यूंकि
मैं उससे प्यार करती हूँ
जो गम दिए हैं मेरे देवता ने
मैं उनका आदर करती हूँ
उस सौगात का अनादर नही कर सकती,क्यूंकि
मैं उनकी पूजा करती हूँ
पुजारिन हूँ तुम्हारी में
बस इतना चाहती हूँ
मेरे मन मन्दिर में मेरे देवता
हर पल हर दिन बसे रहना
नही मांगती तुमसे कुछ मैं
मुझसे पूजा का अधिकार न लेना
दुनिया के कोलाहल से दूर
चरों तरफ़ फैली है शांती ही शांती
वीरान होकर भी आबाद है जो
अपने कहलाने वालों के अहसास से दूर है जो
नीरसता ही नीरसता है उस ओर
फिर भी मिलता है सुकून उस ओर
ले चल ऐ खुदा मुझे वहां
दुनिया के लिए कहलाता है जो शमशान यहाँ
उदास नज़र आता है हर मंज़र
नज़र आता नही कहीं गुलशन
हर तरफ़ क्यूँ उदासी छाई है
या फिर मेरे दिल में ही तन्हाई है
हर शय ज़माने की नज़र आती है तनहा
समझ आता नही ज़माने की उदासी का सबब
वीरान सा नज़र आता है हर चमन
या फिर मेरी नज़र में ही वीरानी छाई है
उड़न ज़िन्दगी की है कहाँ तक
प्यार ज़िन्दगी में है कहाँ तक
शायद
ज़िन्दगी है जहाँ तक
लेकिन
ज़िन्दगी है कहाँ तक
नफरत की सीमा शुरू हो
शायद वहां तक
प्यार की सीमा ख़त्म हो
शायद वहां तक

Sunday, September 7, 2008

हम तो ता-उम्र तुझ में ख़ुद को ढूंढते रहे
सुना था
प्यार करने वाले तो दो जिस्म एक जान होते हैं
क्या पता था
ये सिर्फ़ कुच्छ लफ्ज़ हैं

Thursday, September 4, 2008

लोग न जाने कैसे किसी के दिल में घर बना लेते हैं
हमें तो आज तलक वो दर -ओ-दीवार न मिली
लोग न जाने कैसे किसी के प्यार में जान गँवा देते हैं
हमें तो आज तलक उस प्यार का दीदार न मिला
लोग न जाने कैसे काँटों से दोस्ती कर लेते हैं
हमें तो आज तलक दर्द के सिवा कुच्छ भी न मिला
लोग न जाने कैसे जानकर भी अनजान बन जाते हैं
हमें तो आज तलक कोई अनजान भी न मिला
ज़ख्म कितने दोगे और यह तो बता दो
अब तो दिल का कोई कोना खाली न बचा
हाल-ऐ-दिल तो क्या तुम समझोगे मेरा
जब तेरे दिल के किसी कोने में जगह ही नही

Wednesday, September 3, 2008

किसी की चाहत में ख़ुद को मिटा देना बड़ी बात नही
गज़ब तो तब है जब उसे पता भी न हो
वो आज तक कुच्छ सुन नही पाया
जो हम उससे कभी कह न पाये
दिल के कुच्छ अरमान
शब्दों के मोहताज़ नही होते
कुच्छ वाकये तो नज़रों से बयां होते हैं
कोसी ने कर दिया
अपनों को अपनों से
कोसो दूर
अब के बिछडे
फिर न मिलेंगे कभी
ज़ख्म रूह के
फिर न भरेंगे कभी
हालत पर दो आंसू गिराकर
सियासत्दार फिर न
मुड़कर देखेंगे कभी
उजडे आशियाँ
फिर भी बन जायेंगे
पर मन के आँगन
फिर न भरेंगे कभी
जिस्मों से बंधे जिस्मों के रिश्ते
रूह का सफर कभी तय कर नही पाते
जो रिश्ते रूह में समां जाते हैं
वो जिस्मों की बंदिशों से आजाद होते हैं

Monday, September 1, 2008

ज्वार भाते ज़िन्दगी को कहाँ ले जायें पता नही
ज़िन्दगी भी कब डूबे या तर जाए पता नही
बस ज्वार भाते आते रहते हैं और आते रहेंगे
न पूनम की रात का इंतज़ार करेंगे
न अमावस्या की रात का
बस ज़िन्दगी इन्ही ज्वार भाटों के बीच
कब डूबती या समभ्लती जायेगी पता नही

Thursday, August 28, 2008

कभी कभी कुछ लफ्ज़ दिल को ज़ख्म दे जाते हैं
कभी कभी मरहम भी दर्द का सबब बन जाती है
कब कौन आ के कौन सा ज़ख्म उधेड़ दे ,क्या ख़बर
कभी कभी दुआएं भी बद्दुआ बन जाती हैं
तस्वीर का रुख बनाने वाले को भी न समझ आया
कभी कभी आईने भी तस्वीर को बदल देते हैं

Wednesday, August 27, 2008

जब ज़िन्दगी में भागते भागते हम थकने लगते हैं तब मन उदास होने लगता है । आत्मा बोझिल होने लगती है । कुच्छ देर कहीं ठहरने को दिल करता है मगर ज़िन्दगी तो ठहरने का नाम नही न . और हम एक ठिकाना ढूँढने लगते हैं जहाँ khud ko mehsoos kar सकें।कुच्छ der khud ko waqt ke aaine mein dekh सकें, kya खोया, क्या पाया, जान सकें

बुधवार, 4 मार्च 2009

घटता बढ़ता आकाश

मेरे घटते बढ़ते आकाश हो तुम
कभी पास होते हो तो
कभी कोसों दूर
तुमसे मिलने की चाह में
प्यासी है रूह मेरी
पर तुम अपने ही आकाश में
खो जाते हो
मेरे दिल के दायरों में
न सिमट पाते हो
कभी महसूस होता है
हाथ बढ़ाने पर छू लूंगी तुम्हें
तुम्हारे दिल के हर
जज़्बात को जी लूंगी मैं
पर तुम फिर भी मुझे
उतनी ही दूर नज़र आते हो
क्यूँ मैं तुम्हें छू नही पाती
तुम्हारे दिल के आँगन में
उतर नही पाती
कौन सा आकाश है तुम्हारा
जिसने तुम्हें बाँधा हुआ है
क्यूँ सदाएं मेरी
तेरे दिल पर
दस्तक नही दे पातीं
क्यूँ पास होकर भी तुम
मेरे पास नही होते
क्यूँ अपने ही आकाश में
सिमटे होते हो
इक बार इक नज़र डाल कर तो देखो
मुझे अपने आकाश में
मिला कर तो देखो
देखना फिर
तुम्हारा आकाश न मिट पायेगा
मेरे आकाश से मिलकर
नया आकार पायेगा
फिर एक बार
तुम्हारा आकाश
और बढ़ जाएगा

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

बचपन के वो कोमल कोमल मासूम हाथ
जिनमें खिलोने और गुडिया होनी चाहिए थी
पढने को किताबें होनी चाहिए थी
दो वक्त की रोटी के लिए
घर में चूल्हा जलाने के लिए
छोटे छोटे हाथों से
लकड़ी का बुरादा
बोरियों में ऐसे भर रहे थे
जैसे कोई सेठ
तिजोरी में
सोना समेट रहा हो
उनके लिए तो शायद
वो बुरादा ही
सोने से बढ़कर था
आंखों में शाम की
रोटी के पलते सपने
ऐसे दिख रहे थे
जैसे किसी प्रेमी को
उसका प्यारा मिल गया हो
बचपन में ही
बड़े होते ये बच्चे
पेट के लिए जुगाड़
करना सीख जाते हैं
और इंसान बड़ा होकर भी
कभी इन्हें न जान पाता है
इन पर अपने सपनो का
महल बना लेता है
अपनी आशाओं को
पंख लगा देता है
अपने दामन को
खुशियों के तोहफों से
तो भर लेता है
मगर इतना नही सोचता कि
जितनी शिद्दत से
हमने ऑस्कर को चाहा है
गर इतनी शिद्दत से
इन मासूमों को चाहा होता
तो ..................................
इनका भविष्य बदल गया होता
मेरे देश को तो तभी
ऑस्कर मिल गया होता

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

कुछ नही बचा अब

अब समटने को कुछ नही है
सब कुछ टूट रहा है
बिखर रहा है
दोनों हाथों से
संभाले रखा था जिसे
वो रिश्ता अब
रेत की मानिन्द बिखर रहा है
कतरा कतरा खुशियों का
समेटा था जिस आँचल में
वो आँचल अब गलने लगा है
कब तक आँचल में पनाह पायेगा
इस आँचल से अब तो खून
रिसने लगा है
कब तक कोई ख़ुद की
आहुति दिए जाए
अपने अरमानों की लकडियों से
हवन किए जाए
अब तो लकडियाँ भी
सीलने लगी हैं
किसी के आंसुओं में
भीगने लगी हैं
फिर कैसे इन लकडियों को जलाएं
अरमानों की अर्थी को
कौन से फूलों से सजाएं
अब समेटने को कुछ नही है
मैं तो हाड़ मांस का वो लोथडा हूँ
जिसके पास दिल ही नही
मगर फिर भी
सबके दर्द में तड़पता हूँ
मुझे तो आह भरने का भी अधिकार नही
मगर फिर भी
सबके लिए मैं रोता हूँ
मुझे तो ख्वाब देखने का भी अधिकार नही
मगर फिर भी
सबके ख्वाब मैं पूरे करता हूँ

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

पिंजरे का पंछी

पिंजरे का पंछी
उडान चाहे जितनी भर ले
मगर लौट कर वापस
जरूर आता है
ये पंछी न जाने
कहाँ कहाँ भटकता है
हर ओर सहारा
ढूंढता है
मगर हर तरफ़
निराशा ही निराशा है
हर ओर
तबाही ही तबाही है
कहीं कोई नीड़ नही ऐसा
जहाँ एक और
घोंसला बनाया जाए
थक कर , हार कर
टूट कर गिरने से पहले
फिर उसी
पिंजरे की ओर भागता है
उसे पिंजरे का मोल
अब समझ आता है
जहाँ उसे वो सब मिला
जिसकी चाह में उसने
उड़ान भरी
पिंजरे को तोड़कर
भागना चाहा
मगर इस पिंजरे में
उसे जो सुकून मिला
वो तो सारी कायनात
में न मिला
जानते हो.................
ये पिंजरा कौन सा है ............
ये है प्रेम का पिंजरा
ये है समर्पण का पिंजरा
भावनाओं का पिंजरा
अपने अस्तित्व का पिंजरा
त्याग का पिंजरा
अहसासों का पिंजरा
जहाँ ये सब मिलकर
इस पिंजरे को
नया रूप देते हैं
इसे रहने के
काबिल बनाते हैं
क्यूंकि
ये पिंजरा अनमोल है

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

जब दोस्त की जरूरत थी ............................

वो जो
दोस्त
हमसाया
बनने आया था
ख्वाबों को
पंख देने आया था
दोस्ती को
नया नाम
देने आया था
अपने अहसासों को
अपने दर्द को
अपने ख्वाबों को
अपनी खुशी औ गम को
अपने आंसुओं को
अपने ख्यालों को
बरसा कर
चला गया
और जो
हम पर बीती
उस जाने बिना
मेरे दर्द को
पहचाने बिना
मुझसे मेरा
हाल जाने बिना
मेरे ग़मों को
सुने बिना
मेरी खामोशी को
जिए बिना
मुझसे मेरे
आंसुओं का
सबब पूछे बिना
मेरे जज्बातों
से खेलकर
अपनी आपबीती
सुनाकर
हमको दर्द के
दरिया में
डुबाकर
न भूलने वाला
ज़ख्म देकर
एक आजाद
पंछी की मानिन्द
आकाश में
ऊँचाइयों को
नापने के लिए
अपने पंखों को
नई परवाज़
देने के लिए
उड़ गया
और हम यहाँ
खामोशी से
दोस्ती का
फ़र्ज़ निभाते रहे
उसके लिए
खुदा से
दुआ मांगते रहे

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

आह

आज आँख से आंसू नही खून निकला है
शायद दर्द अब कुछ और बढ़ गया है ।


अब मोहब्बत की किताब को बंद कर दिया है
शायद मोहब्बत शब्द का अब अर्थ बदल गया है ।


कौन सूखे हुए फूलों से दोस्ती करता है
शायद दोस्ती का अब रंग बदल गया है ।


अब तो आह भी आह नही करती
शायद आह का भी अब ढंग बदल गया है ।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

वो पहली छुअन

वो पहली छुअन
चाहे तन की हो
या मन की
ज़िन्दगी भर
यादों के झरोखों में ,
अहसासों के दामन में
जिंदा रहती है
हर याद
हर अहसास
इंसान भूल जाता है
वक्त के साथ
मगर
पहली छुअन
दिल के किसी
खास कोने में
सिमटी होती है
ज़रा सा
दिल को टटोलो
ओर वो अहसास
जो ताजगी से
सराबोर होते हैं
फिर उसी खास पल में
ले जाते हैं
जब दिल में
उस छुअन ने
दस्तक दी थी
तन की छुअन से ज्यादा
मन की छुअन
यादों में
बहुत गहरे
कहीं महफूज़ होती है
उसका अहसास
कुछ खास होता है
कोई हर पल
अपने आस पास
होता है
बस यही तो प्रेम का पहला आभास होता है 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

क्या तुम्हें आज भी याद है

क्या तुम आज भी
मुझे याद करते हो
क्या तुम्हें मेरा वो अल्हड़पन
आज भी याद है
क्या तुम्हें मेरे उस
इंतज़ार का अहसास है
जो मैं किया करती थी
तुम्हारे लिए
पल पल ख्वाब बुनती थी
तुम्हारे लिए
क्या तुम्हें आज भी याद है
वो छत पर
मदमस्त होकर
बारिश में भीगना मेरा
क्या तुम्हें आज भी याद है
मेरा रूठ जाना
बिना बात पर
और फिर तुम
मुझे मनाते थे
कभी हंसकर तो
कभी ख़ुद रोकर
क्या तुम्हें आज भी याद है
घंटों छत पर
पड़े पड़े तारों को निहारना
उनमें अपने ख्वाबों को देखना
कुछ नए ख्वाब सजाना मेरा
और उन ख्वाबों को
पूरा करने का
वादा करना तेरा
क्या तुम्हें आज भी याद है
मेरे अन्दर की उस
बच्ची के अहसास
जो अल्हड सी
सारे जहाँ को
अपने में समेटे
ख्वाबों में जीती थी
और आज भी उन्ही
लम्हों को जीना चाहती है
क्यूंकि आज भी वो अल्हड बच्ची
मुझमें कहीं जिंदा है
वो अब भी बड़ी नही हुयी है
क्या तुम्हें आज भी याद है
उस बच्ची को फिर से
कैसे उसी अल्हड़ता में
जीना सिखाना है
उसे फिर से उसी
दुनिया से मिलाना है
जहाँ वो तुम्हारे साथ
उन लम्हों को
फिर से जी सके
ज़िन्दगी के उस रस
को पी सके
क्या तुम्हें आज भी याद है ??????

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

वैलेंटाइन डे --------------प्यार का दिन

रातों को नींद नही आती
होठों पर उसका नाम होता है
आंखों में उसके ख्वाब होते हैं
दिल में उसका ख्याल होता है
प्यार करने वालों का
शायद यही हाल होता है
इसीलिए ----------
प्यार के लिए कोई मौसम नही होता
क्यूंकि
प्यार सिर्फ़ एक दिन में सिमटा नही होता
प्यार प्यार होता है
किसी खास दिन के लिए बंधा नही होता
प्यार करने वालों के लिए
दिन खास नही होता
प्यार करने वालों के लिए
हर दिन प्यार का दिन होता है
प्यार करने वाले दिनों के
बंधनों में नही जकडे जाते
वो तो सिर्फ़ प्यार करते हैं
प्यार में जीते और प्यार में मरते हैं
प्यार करने वाले कब
दिनों के फेर में पड़ते हैं
उनके दिन रात तो सिर्फ़
प्यार में कटते हैं
ऐसे में कौन दिनों को गिनता है
प्यार करने वाला तो सिर्फ़
प्यार के लम्हों में जीता है

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

मोहब्बत ऐसे भी होती है शायद

न तुमने मुझे देखा
न कभी हम मिले
फिर भी न जाने कैसे
दिल मिल गए
सिर्फ़ जज़्बात हमने
गढे थे पन्नो पर
और वो ही हमारी
दिल की आवाज़ बन गए
बिना देखे भी
बिना इज़हार किए भी
शायद प्यार होता है
प्यार का शायद
ये भी इक मुकाम होता है
मोहब्बत ऐसे भी की जाती है
या शायद ये ही
मोहब्बत होती है
कभी मीरा सी
कभी राधा सी
मोहब्बत हर
तरह से होती है

सुलगते पत्थर

मैंने पत्थरों को सुलगते देखा है
उनके दर्द को महसूस किया है
पत्थरों के गम में शरीक
पत्थरों के सिवा नही कोई
उनके अहसासों को
समझने का अहसास कौन करे
पत्थर किसे सुनाते हाल-ऐ-दिल
दिलों के दरवाज़े तो
पहले ही बंद थे
पत्थरों की खामोशी
में छुपा दर्द
पल पल उन्हें सुलगाता है
इन पल पल सुलगते
पत्थरों के लिए
कौन रोता है
आंसू गिरता है
मैंने पत्थरों को सुलगते देखा है

क़र्ज़ अहसासों का

हर क़र्ज़ अहसासों का भी चुकाना होगा
अहसास क्यूंकि अभी जिंदा हैं
अहसासों से परे जाने से पहले
अहसासों को भी सुलाना होगा
किसी मिटटी में दबाना होगा
जहाँ से फिर कोई अहसास जन्म न ले
हर अहसास इक ज़ख्म बन जाता है
अब इन अहसासों की दवा न करनी होगी
अहसासों को अब दवा बिन सूखना होगा
दवा के पानी से न इन्हें सींचना होगा
सूखे हुए अहसासों को फिर
भुरभुराकर रेत में दबाना होगा
हर अहसास का अहसास मिटाना होगा
कुछ इस तरह इन जिंदा अहसासों का
क़र्ज़ चुकाना होगा

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

सुकून

ज़िन्दगी दो पल चैन से
हमें जीने नही देती
और तेरा ख्याल
हमें मरने नही देता
मुश्किल से मिले पलों को
संजोने नही देती
मेरी बातें अधूरी रह जाती हैं
ख्वाब अधूरे रह जाते हैं
अरमान अधूरे रह जाते हैं
हमारा साथ अधूरा रह जाता है
पल पल मिलने को
तरसते बेचैन दिलों को
क्यूँ करार आने नही देती
क्यूँ ज़िन्दगी दो पल चैन से
हमें जीने नही देती
कुछ तेरी आंखों की नमी को
होठों की कशिश को
चेहरे के तबस्सुम को
गालों की लाली को
तेरे बहकते हुए जज्बातों को
बरसने नही देती
क्यूँ ज़िन्दगी दो पल हमें
चैन से जीने नही देती
कभी तू करे इंतज़ार
कभी मैं करूँ इंतज़ार
इस इंतज़ार करने में
ज़िन्दगी हुयी तमाम
अब रूहों को
खामोशी से
जन्नत में मिलने
का है इंतज़ार
तब तो शायद ज़िन्दगी
खामोश हो जायेगी
रूहों के मिलन मैं
न आडे आएगी
कुछ पलों के लिए ही सही
रूहों को सुकून तो मिलेगा
जो ज़िन्दगी ने न दिया
वो मौत दे जायेगी

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

अपने अपने किनारे

नदी के दो किनारों को देखा है कभी
साथ साथ चलते हुए भी
कभी मिलते हैं क्या
ज़िन्दगी भर का साथ होता है
मगर फिर भी मिलने को तरसते हैं
फिर क्यूँ तुम नही समझते हो
हमारा साथ नदी के किनारों सा है
जो साथ रहकर भी कभी नही मिलते
भावनाओं की लहरों के सेतु पर
सिर्फ़ भावनाएं ही हमें मिलाती हैं
न मिलने की पीड़ा से क्यूँ तड़पते हो
शुक्र है साथ साथ तो चलते हो
अपने अपने तटबंधों से बंधे हम
तुम क्यूँ उन्हें तोड़ने की नाकाम कोशिश करते हो
क्या तब तुम मुझे पा सकोगे
नहीं, कभी नही
तब तो तुम्हारा आकाश
और बिखर जाएगा
जिन भावों को,दर्द को
पीड़ा को , आंसुओं को
तुमने अपने किनारों में
समेटा हुआ था
वो चारों तरफ़ फ़ैल जायेंगे
और तुम एक बार फिर उन्हें समेटना चाहोगे
फिर एक बार किसी
तटबंध में बंधना चाहोगे
मगर हर बार
तटबंध उतने मजबूत नही बनते
गर बनते भी हैं तो
अहसास मर चुके होते हैं
जज़्बात ख़त्म हो जाते हैं
वहां सिर्फ़ और सिर्फ़
कंक्रीट की दीवार होती है
जहाँ सब खामोश हो जाते हैं
मीलों तक फैली खामोशी
सिर्फ़ चुपचाप चलते जाना
बिना रुके, बिना सोचे
बिना किसी अहसास के
सिर्फ़ चलते जाना है
तुम क्यूँ ऐसा चाहते हो
क्यूँ नही अपने आकाश में
खुश रह पाते हो
हर बार मिलन हो
ये जरूरी तो नही
बिना मिले भी हम
एक दूसरे को देख पाते हैं
भावनाओं को एक दूसरे
तक पहुँचा पाते हैं
इतना क्या कम है
कम से कम साथ
होने का अहसास तो है
ज़िन्दगी भर की खामोशी
से तो अच्छा है
दूर से ही सही
दीदार तो मिला
कुछ पल का ही सही
तेरा साथ तो मिला
आओ एक बार फिर हम
अपने अपने किनारों में सिमटे
दूर रहकर भी
साथ होने के
अहसास में भीग जाएँ