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शनिवार, 29 मई 2010

धागा हूँ मैं

धागा हूँ मैं
मुझे माला बना
प्रीत के मनके पिरो
नेह की गाँठें लगा
खुद को सुमरनी
का मोती बना
मेरे किनारों को
स्वयं से मिला
कुछ इस तरह
धागे को माला बना
अस्तित्व धागे का
माला बने
माला की सम्पूर्णता
में सजे
जहाँ धागा माला में
विलीन हो जाये
अस्तित्व दोनों के
एकाकार हो जायें

मंगलवार, 18 मई 2010

खुद से निगाह मिला ना पाया

सुनो
उदासी का
लहराता साया
क्या तूने नहीं देखा?
जिसे कभी तू
कँवल कहा करता था
उस रुखसार पर
डला ख़ामोशी का
नकाब
हटाया तो होता
हर तरफ टूटी -बिखरी
निराशा में डूबी
आहें और ख्वाबों
को ही पाया होता
हर पग पर सिर्फ
ज़ख्मो के ही निशाँ
टिमटिमाये होते
हर तरफ तबाही का
मंजर ही पाया होता
और हर तबाही के लिए
खुद को ही कसूरवार
ठहराया होता
शायद इसीलिए
नकाब हटा ना पाया
सत्य के आईने में
खुद से निगाह
मिला ना पाया

सोमवार, 17 मई 2010

महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

कोई मिस्टर जलजला एकाध दिन से स्वयम्भू चुनावाधिकारी बनकर.श्रेष्ठ महिला ब्लोगर के लिए, कुछ महिलाओं के नाम प्रस्तावित कर रहें हैं. (उनके द्वारा दिया गया शब्द, उच्चारित करना भी हमें स्वीकार्य नहीं है) पर ये मिस्टर जलजला एक बरसाती बुलबुला से ज्यादा कुछ नहीं हैं, पर हैं तो  कोई छद्मनाम धारी ब्लोगर ही ,जिन्हें हम बताना चाहते हैं कि हम  इस तरह के किसी चुनाव की सम्भावना से ही इनकार करते हैं.

ब्लॉग जगत में सबने इसलिए कदम रखा था कि न यहाँ किसी की स्वीकृति की जरूरत है और न प्रशंसा की.  सब कुछ बड़े चैन से चल रहा था कि अचानक खतरे की घंटी बजी कि अब इसमें भी दीवारें खड़ी होने वाली हैं. जैसे प्रदेशों को बांटकर दो खण्ड किए जा रहें हैं, हम सबको श्रेष्ट और कमतर की श्रेणी में रखा जाने वाला है. यहाँ तो अनुभूति, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति से अपना घर सजाये हुए हैं . किसी का बहुत अच्छा लेकिन किसी का कम, फिर भी हमारा घर हैं न. अब तीसरा आकर कहे कि नहीं तुम नहीं वो श्रेष्ठ है तो यहाँ पूछा किसने है और निर्णय कौन मांग रहा है? 
हम सब कल भी एक दूसरे  के लिए सम्मान रखते थे और आज भी रखते हैं ..
                            
 अब ये गन्दी चुनाव की राजनीति ने भावों और विचारों पर भी डाका डालने की सोची है. हमसे पूछा भी नहीं और नामांकन भी हो गया. अरे प्रत्याशी के लिए हम तैयार हैं या नहीं, इस चुनाव में हमें भाग लेना भी या नहीं , इससे हम सहमत भी हैं या नहीं बस फरमान जारी हो गया. ब्लॉग अपने सम्प्रेषण का माध्यम है,इसमें कोई प्रतिस्पर्धा कैसी? अरे कहीं तो ऐसा होना चाहिए जहाँ कोई प्रतियोगिता  न हो, जहाँ स्तरीय और सामान्य, बड़े और छोटों  के बीच दीवार खड़ी न करें.  इस लेखन और ब्लॉग को इस चुनावी राजनीति से दूर ही रहने दें तो बेहतर होगा. हम खुश हैं और हमारे जैसे बहुत से लोग अपने लेखन से खुश हैं, सभी तो महादेवी, महाश्वेता देवी, शिवानी और अमृता प्रीतम तो नहीं हो सकतीं . इसलिए सब अपने अपने जगह सम्मान के योग्य हैं. हमें किसी नेता या नेतृत्व की जरूरत नहीं है.
 
इस विषय पर किसी  तरह की चर्चा ही निरर्थक है.फिर भी हम इन मिस्टर जलजला कुमार से जिनका असली नाम पता नहीं क्या है, निवेदन करते हैं  कि हमारा अमूल्य समय नष्ट करने की कोशिश ना करें.आपकी तरह ना हमारा दिमाग खाली है जो,शैतान का घर बने,ना अथाह समय, जिसे हम इन फ़िज़ूल बातों में नष्ट करें...हमलोग रचनात्मक लेखन में संलग्न रहने  के आदी हैं. अब आपकी इस तरह की टिप्पणी जहाँ भी देखी जाएगी..डिलीट कर दी जाएगी.

बुधवार, 12 मई 2010

प्रश्नचिन्ह?

हर शख्स
एक प्रश्नचिन्ह सा 
नज़र आता है
ना जाने 
कितने सवालों
से जूझता 
हल की तलाश
में निकला 
प्रश्नों के 
व्यूह्जाल में
उलझता जाता है
और प्रश्नों के 
जवाब में
प्रश्नों से ही
टकराता है 
और फिर
प्रश्नों के 
मकडजाल में
फँसा खुद
एक दिन 
प्रश्नचिन्ह
बन जाता है

रविवार, 9 मई 2010

मातृ ऋण से कुछ तो खुद को उॠण कर लेना

मत करो
मेरा वंदन 
अभिनन्दन
मत करो
याद तुम
सिर्फ एक दिन 
मत दो 
सम्मान अभी
फर्क नहीं पड़ता 
अभी तो मैं
अपना बोझ 
उठा लूँगी
तुम पर 
जान न्यौछावर
कर दूंगी 
अपनी दुआओं में 
सिर्फ तुम्हारा
ही नाम लूँगी
अभी तो शक्ति
है मुझमें 
अभी तो 
सहने की 
क्षमता है मुझमें
पर उस दिन 
जब मैं
असहाय जो जाऊँ
निर्बल , निरीह 
हो जाऊं
सहारे बिन ना
चल पाऊँ
आँखों की ज्योति
कम हो जाये
शरीर  भी
निर्बल हो जाये
यादें भी 
धूमिल पड़ जायें
एक बात को 
बार -बार 
 मैं दोहराऊँ
उस दिन तुम
झुँझला मत जाना
खाना खाते वक्त
मूँह से निकलती
आवाजों से
तुम शरमा
मत जाना
इन बिखरी 
टूटी  हड्डियों को
तुम कोठरी में
सुखा मत देना 
अपनी बेबस 
पुरातन माँ में
नए ज़माने की
हवा भरने की ना
कोशिश करना
जब तुमसे मिलने 
को आतुर माँ
तरसती हो
तुम्हारे सानिध्य 
को तड़पती हो
दो बोल 
मीठे बोल देना
कड़वाहट का 
ज़हर ना
शब्दों में भरना
वक़्त की कमी
की ना 
दुहाई  देना
एक आखिरी
घडी गिनती
बेबस माँ को
तुम ना बेबस
कर देना
वरना
मौत से पहले
मर जाएगी
तुम्हें स्नेह 
करने वाली
दोबारा फिर 
नहीं आएगी
निश्छल ,निर्मल
स्नेहमयी माँ
फिर ना कभी
मिल पायेगी
मरते -मरते भी
दुआएँ तुम्हें
दे जाएगी
ये सौगात 
फिर ना कभी
मिल पाएगी 
इस अमूल्य
धरोहर को
शीश पर धारण
कर लेना
बस उस दिन 
जब उसे तुम्हारी 
जरूरत हो
याद उसे तुम 
कर लेना
मातृ ऋण  से 
कुछ तो खुद 
को उॠण
कर लेना

बुधवार, 5 मई 2010

नारी या भोग्या ?

नारी 
तुम्हारा 
अस्तित्व 
क्या है?
हर युग में
जन -जन के 
अंतस में व्याप्त 
तुम्हारी भोग्या
की छवि  से 
कब मुक्त
हो पाई हो
हर युग में ही
कुचली गयीं
मसली गयीं
तोड़ी गयीं
फेंकी गयीं
कब तुम्हारे 
अस्तित्व को 
स्वीकारा गया 
कब देह से पार 
तुम्हारे अस्तित्व
को जाना गया
तप भंग करना हो
या अग्निपरीक्षा देनी हो
तुम्हें ही बलि वेदी पर
चढ़ाया गया
देवी हो या माँ
हर रूप में 
तुम्हारी अस्मिता का
ही होम किया गया
तुम्हें ही छला गया 
हर युग में
तुम्हारे ' भोग्या ' शब्द 
को ही सार्थक किया गया
प्रदर्शन की विषय- वस्तु
बनाया गया आज भी 
आज भी तुम
पुरुष की सोच की
मात्र कठपुतली हो
कब तुममें माँ ,बेटी 
बहन , पत्नी की
छवि को निहारा गया
सिर्फ स्वार्थों की 
पूर्ति के लिए ही
इन उपनामों से
नवाज़ा गया 
नारी देह से तो 
मुक्त हो भी जाओगी
पर पुरुष की सोच से
भोग्या की तस्वीर 
ना हटा पाओगी
नारी तुम किसी 
भी युग में
'भोग्या' के दंश से 
ना बच पाओगी
अपने अस्तित्व को
काम-पिपासुओं के
चंगुल से ना 
बचा पाओगी
इनकी विकृत
मानसिकता से 
ना मुक्त हो पाओगी
फिर कैसे अपने 
अस्तित्व को
जान पाओगी?
नारी तुम 
कब नारी 
बन पाओगी?

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

क्षणिकाएं

तेरा चहकना
महकना ,मचलना
खिलखिलाना 
कुछ यूँ लुभाता है
जैसे कोई नदिया तूफानी 
सागर के सीने पर
अठखेलियाँ कर रही हो 

तेरे पहलू में 
सिर रखकर
सुकून पाना
अब किस्मत नहीं
तुझे याद रखना
या भूल जाना
अब बस में नहीं


दीदार तेरा हो 
अक्स मेरा हो
रूह तेरी हो
जिस्म मेरा हो
नींद तेरी हो
ख्वाब मेरा हो
मौत मेरी हो जिसमें
वो गोद तेरी हो 


नज़्म बना मुझे
कागज़ पर उतार मुझे
ख्वाहिश बना मुझे
नज़रों में बसा मुझे
तेरी चाहत का सिला बन जाऊँ
बस एक बार पुकार मुझे 


ख्वाबों के सूखे दरख्तों पर 
आशियाँ बनाया नहीं जाता
हर चाहने वाली सूरत को
दिल का दरवाज़ा दिखाया नहीं जाता 


तेरे ग़मों की दुनिया में
अश्क मेरे बहते हैं
दर्द के ये कुछ फूल हैं
जो काँटों पर ही सोते हैं

 

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

अधूरे ख्याल

यूँ ही
भटकते- भटकते
कभी- कभी
अधकचरे , अधपके
अधूरे ख्यालात
दस्तक देते हैं
और फिर ख्यालों
की भीड़ में
खो जाते हैं
और हम फिर
उन्हें ख्यालों में
ढूंढते हैं
मगर कभी
खोया हुआ
मिला है क्या
जो मिल पाता
ये अधूरे ख्याल
क्यूँ अंधेरों में
खो जाते हैं
क्यूँ इतना तडपाते हैं
क्यूँ अधूरे ख्याल
अधूरे ही रह जाते हैं
भावनाओं में
क्यूँ नही
पलते हैं
शब्दों में
क्यूँ नही बंधते हैं
क्यूँ अधूरेपन की
पीर सहते हैं
शायद कुछ ख्यालों की
किस्मत अधूरी होती है
या अधूरापन ही
उनकी फितरत होती है

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

कहा था ना .............२०० वीं पोस्ट

देखा 
कहा था ना
कभी मैंने 
एक वक़्त 
आएगा
जब तेरे 
अरमाँ जवाँ होंगे
 और मेरे
वक़्त की 
कब्र में 
तेरे ही हाथों 
दफ़न हो
चुके होंगे
उस वक़्त
कैसे , फिर से
जिंदा करेगा 
मृत जज्बातों को
 कहा था ना 
एक दिन 
आवाज़ देगा मुझे
जब तेरे अहसास 
जागेंगे तुझमें
जब अरमानो की
झिलमिलाती चादर
बह्काएगी तुझे 
जब ख्वाबों के 
अंकुर झूला 
झुलायेंगे तुझे 
तब आवाज़ 
देगा मुझे
मगर जिंदा लाशें भी
कहीं सुना करती हैं 
जिसके हर अहसास 
को तूने ही कभी
अरमानो की 
चिता पर राख़ 
किया था
और राख़ को भी
तूने ना सहेजने 
दिया था
फिर कैसे आज 
रिश्ते की राख़
ढूंढता है
अब किस नेह 
के बीज का 
अंकुरण करता है
मुरझा चुके हैं 
जो फूल
कितना ही नेह के 
जल से सींचो
फिर नहीं 
खिलने वाले
कहा था ना
मौसम बेशक 
बदलते हैं
मगर जिस 
गुलशन को 
अपने हाथों 
उजाडा हो
वहाँ बसंत 
नहीं आता
पतझड़ हमेशा 
के लिए 
ठहर जाता है
कहा था ना
वक़्त किसी का 
नहीं होता
अब लाख 
सदाएँ भेज
गया वक़्त
लौट कर 
नहीं आता
 

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

मन का पंछी

ना जाने 
वो कौन सी 
बंदिश है
जिसे तोड़ 
नहीं पाता
ये मन 
पंछी- सा
क़ैद में 
फ़डफ़डाता
उड़ना चाहकर 
भी उड़ नहीं पाता
सिसकता 
तड़पता 
मचलता
पल- पल
मगर फिर भी
उड़ने की चाहत
ना जाने 
कौन से गर्त
में दब गयी
किस खोह में
छुप गयी
और अपने 
पिंजरे के 
मोह में 
क़ैद पंछी 
मोह की बंदिशें
ना तोड़ पाता है
और यूँ ही
सिसक- सिसक कर
दम तोड़ जाता है

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

यादों का विकल्प

यादों की कहानी 
यादों के फ़साने 
हर दिल ने गाये
हर दिलजले ने
जीने का सबब बनाया
यादों का ही 
कफ़न सजाया
किसी ने खुद को 
नशे में डुबाया
तो किसी ने 
ज़िन्दगी को 
कर्मभूमि बनाया
मगर यादों से 
कभी बच ना पाया 
दिल-ओ-दिमाग को
यादों की गिरफ्त से
ना कोई छुड़ा पाया
 और कभी कोई ना
ढूंढ पाया
यादों का विकल्प
चाहे कितना ही 
अंधेरों में छुपाया
दिल की तहों में
लाख दबाया
मगर फिर भी
कोई ना कोई याद
किसी ना किसी 
कोने से कब , कैसे
दस्तक दे ही जाती है
फिर यादों को 
कहाँ दफ़न करे कोई
और कैसे 
यादों के विकल्प 
ढूंढें कोई

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

क्षणिकाएं

आज तो 
चाँदनी भी 
जल रही है
चाँद के 
आगोश को 
तड़प रही है
मोहब्बत के
दंश झेल रही है
फिर भी
उफ़ ना कर रही है 

हर कश पर 
ख़त्म होती 
धुंआ बन 
उडती ज़िन्दगी 
गली के 
एक छोर पर
खडी
खामोश ज़िन्दगी
फिर भी
दूसरे छोर तक 
ना पहुँच 
पाती ज़िन्दगी 

ख्वाब सा 
आया और 
चला गया
ना जाने 
कितने 
मोहब्बत के 
ज़ख्म दे गया
तेरा आना 
और चला जाना
जैसे ज़िन्दगी
मौत से लड़
रही हो 
और फिर 
मौत जीत 
गयी हो

देखा
मिलन हुआ ना
मैंने कहा था 
हम मिलेंगे
एक दिन 
और आज 
वो दिन था
जब तुम और मैं
रु-ब-रु हुए 
तुम मेरे 
साथ थे 
हाथों में 
हाथ थे
देखा 
मिलन ऐसे
भी होता है
ख्वाब में 

प्यार को ताकत बना
कमजोरी  नहीं 
प्यार को खुदा बना
मजबूरी नहीं

अस्पष्ट तस्वीरें
गडमड होते शब्द 
बिखरते ख्वाब
अव्यवस्थित जीवन 
इंसानी वजूद का 
मानचित्र

मंगलवार, 23 मार्च 2010

मैं हिन्दुस्तानी हूँ

मै हिन्दुस्तानी हूँ 
 मजहब की दीवार 
कभी गिरा नहीं पाया 
किसी गिरते को 
कभी उठा नहीं पाया
नफरतों के बीज 
पीढ़ियों में डालकर 
इंसानियत का दावा 
करने वाला 
मैं हिन्दुस्तानी हूँ

भाषा को अपना 
मजहब बनाया
देश को फिर भाषा की 
सूली पर टँगाया
अपने स्वार्थ की खातिर
भाषा का राग गाया
कुर्सी की भेंट मैंने
लोगों का जीवन चढ़ाया
क्षेत्रवाद  की फसल उगाकर
इंसानियत का दावा 
करने वाला 
मैं हिन्दुस्तानी हूँ

जातिवाद की भेंट चढ़ाया
लहू को लहू से लडवाया
गाजर -मूली सा कटवाया
फिर भी कभी सुकून ना पाया
नफरत की आग सुलगाकर
अमन का दावा करने वाला
मैं हिन्दुस्तानी हूँ


शहीदों के बलिदान को 
हमने भुलाया
कुछ ऐसे फ़र्ज़ अपना
हमने निभाया
फ़र्ज़ का, बलिदान का,
देशभक्ति का पाठ
सिर्फ दूसरों को समझाया
आतंक को पनाह देने वाला 
शहीदों के बलिदान को
अँगूठा दिखाने वाला 
मैं हिन्दुस्तानी हूँ
हाँ, मैं सच्चा हिन्दुस्तानी हूँ
 

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

ॐ जय ब्लोग्वानी

ॐ जय ब्लोग्वानी 
प्रभु जय ब्लोग्वानी
जो कोई तुमको ध्याता
हॉट में स्थान पाता 
ॐ जय ब्लोग्वानी .........

घर , परिवार , नौकरी 
सब दॉव पर लगा देता 
 खाना, पीना ,सोना 
ब्लॉगर सब भूल जाता 
उलटी सीढ़ी टिप्पणियाँ करके 
बस टी आर पी में सबसे 
ऊपर आना चाहता 
ॐ जय ब्लोग्वानी ..........

ब्लॉगिंग के सारे गुण अपनाता
किसी को रिश्तेदार बनाता 
किसी से दुश्मनी मोल लेता
उलटे सीधे करम ये करता 
विवादास्पद लेख लिखकर
पोस्ट को ऊपर रखना चाहता
ब्लोग्वानी प्रभु के चरण कमलों 
में  स्थान पाने को
अकृत्य कृत्य भी कर जाता
ॐ जय ब्लोग्वानी ..................

टिप्पणियों के अभाव में तो
अच्छी पोस्टों का 
दीवाला ही निकल जाता
बेकार पोस्टों का ही 
यहाँ तो दबदबा बन जाता
हॉट के चक्रव्यूह में फंसकर 
नॉट में अटक जाता 
बेचारा ब्लॉगर हॉट में 
स्थान पाने को तरस जाता
जुगाडू ब्लॉगर ही यहाँ
हॉट में कई कई दिन 
स्थान पाता 
ॐ जय ब्लोग्वानी ..........

ब्लोग्वानी प्रभु चमत्कार कर दो 
दीन दुखी ब्लोगरों की 
झोली भी भर दो 
हॉट के दर्शन करा दो
मनोकामना पूर्ण कर दो
जो कोई तुमको ध्याता 
मन वांछित फल पाता
ॐ जय ब्लोग्वानी ...............

इक तेरे बिना इनका कोऊ नाहीं.................

दोस्तों,

ये सिर्फ एक  स्वस्थ हास्य है .......काफी दिनों से काफी लोगों को इसी वजह से रोते बिलखते देख रही थी तो सोचा उन सबकी तरफ से थोड़ी सी प्रार्थना ब्लोग्वानी से कर दी जाए.

  

रविवार, 14 मार्च 2010

कोई तो जगे

अँधा हूँ मगर
आँख वालों को
आईना बेचता हूँ
शायद अपना अक्स
नज़र आ जाये
किसी को

गूंगा हूँ मगर
जुबान वालों को
शब्द बेचता हूँ
शायद कोई जुबाँ
के ताले खोले
कोई तो सत्य
की चादर ओढ़े

बहरा हूँ मगर
कान वालों को
गीत सुनाता हूँ
शायद सुनकर
किसी का तो
खुदा जगे
कोई तो वक़्त की
आवाज़ सुने

मंगलवार, 9 मार्च 2010

कचोट

बरसों साथ रहकर भी
तेरा मेरा अनजाना रिश्ता
देह की दहलीज पर ही
क्यूँ सिमट गया
मन के आँगन तक की राह
कोई मुश्किल तो ना थी
मौन का शून्य ही
अस्तित्व को बाँटता रहा
प्रगाढ़ स्नेह के बंधन को
कम आँकता रहा
अर्धांगिनी शब्द को
खूँटी पर टाँकता रहा
अर्ध अंग के महत्त्व
को नकारता रहा
शब्द को सिर्फ
शब्द ही रहने दिया
कभी शब्द को
अंतस में ना
उतार पाया
शायद इसीलिए
साथ रहकर भी
अनजान रहे
मन के बंधन
में ना बँधे
देह के रिश्ते
देह पर ही
बिखर गए

शनिवार, 6 मार्च 2010

नारी को नारी रहने दो

वो तो सीता ही थी
वो तो लक्ष्मी ही थी
त्याग , तपस्या
प्रेम समर्पण की
बेड़ियों में जकड़ी ही थी
अपने अरमानो की राख
ओढ़ पड़ी ही थी
फिर क्यूँ तुमने मजबूर किया
सीता से मेडोना बनने को
क्यूँ तुमको बाहर ही
उर्वशी रम्भा दिखाई देती थीं
जब तुमने मजबूर किया
उसने आगे कदम बढाया था
तुम्हारे दिखाए रास्ते
को ही अपनाया था
फिर क्यूँ आज हर गली
हर चौराहे, हर मोड़ पर
बातों के दंश लगाते हो
अपने झूठे दंभ की खातिर
क्यूँ नारी को प्रताड़ित करते हो
रूप सौंदर्य के पिपासुक तुम
क्यूँ मानसिक बलात्कार करते हो
सिर्फ अपना वर्चस्व कायम रहे
इसलिए मानसिक प्रताड़ना देते हो
सिर्फ एक दिन नारी का
सम्मान सह नहीं पाते हो
फिर कैसे तुम नारी को दुर्गा कहते हो
नारी पूजा का राग अलापते हो
खुद ही नारी को शोषित करते हो
दोहरे मानदंडों में जीने वाले
पुरुष तुम
क्यूँ अपनी हार से डरते हो
अपने अहम् की खातिर तुम
नारी की अवहेलना करते हो
तेरी जननी है वो
कैसे खुद से तुलना करते हो
वो तो आज भी सावित्री ही है
क्यूँ अपना नज़रिया नही बदलते हो
नारी की आवृत्ति को
नारित्त्व में ही रहने दो
अपने पुरुषत्व की छाँव
में ना जकड़ने दो
उसे जीने दो और आगे बढ़ने दो
बस नारी को नारी रहने दो

मंगलवार, 2 मार्च 2010

मुर्गा कटता रहता है

चल पागल
मोहब्बत करनी
भी नहीं आती
झूठे वादे करके
कोई वादा पूरा
न करना
जन्मों के इंतज़ार
की बातें करके
इस जन्म में भी
इंतज़ार न करना
मुरझाये गुल को भी
गुलाब बता देना
खाली पास- बुक को
अम्बानी की बता देना
उधार की गाड़ी को
अपना बना लेना
ये है आज का चलन
और तू है पागल
मोहब्बत के नाम पर
कुर्बान हुआ जाता है
जान हलाल किये जाता है
आँसू बहाए जाता है
वफ़ाओं की दुहाई
दिए जाता है
यहाँ किसी को
दर्द नही होता
यहाँ कोई
किसी के लिए
नहीं मरता है
आज तू , कल
कोई और सही
बस इसी तर्ज़ पर
मुर्गा कटता रहता है

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

नखरे वारे सजन

ओ रे सजन, प्यारे सजन
नखरे वारे सजन
फाग का महिना आ गया है
होरी का रंग भा गया है
तन मन ऐसे भीग रहे हैं
प्रेम रस में सींच रहे हैं
यूँ ना करो बरजोरी
गोरी से न करो ठिठोली
बैयाँ ऐसे ना पकड़ो सजना
रंग अबीर मलो मुख पे ना
ऐसे करो ना बरजोरी
नाजुक कलइयां है मोरी
सजना ऐसे मचल रहे हैं
भाँग सुरूर में अटे हुए हैं
लाज शरम सब ताक पर रखकर
गोरी की चुनरिया भिगो रहे हैं
नयनन की मादक चंचलता
फाग को मधुमास किये है
ओ रे सजन , प्यारे सजन
आज तो रंग में आ गए हैंहोरी की मस्ती में झूम रहे हैं
नखरे सारे भूल गए हैं
ओ रे सजन , प्यारे सजन
अब ना रहे ,नखरे वारे सजन

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

आईने कैसे- कैसे

आईना ना देखो यारों
अक्स से बू आती है
आईने में क़ैद अक्स से
खुद को मिलाओ तो ज़रा
गर खुद को पहचान लो तो
आईना खामोश हो जाये


हर आईना अपना सा
नज़र आता है
क्या करूँ महबूब मेरे
हर आईने में
तेरा ही चेहरा
नज़र आता है



मुझे आईना दिखाने वाले
कभी उस आईने में
झाँका होता
तो तेरा अक्स भी
धुंधला गया होता



नकाब चाहे जितना
ड़ाल लो रुखसार पर
आईना सब सच
दिखा देता है

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

एक बेचारा -------शायरी का मारा

दोस्तों ,

अभी -अभी एक मेल मुझे श्री प्रवीण पथिक जी से प्राप्त हुई और ये मेल उनके दोस्त श्री आनंद पाठक जी द्वारा रचित है और उनकी आज्ञा से मैं इसे अपने ब्लॉग पर लगा रही हूँ । एक हास्य व्यंग्य है जो मुझे इतना अच्छा लगा कि सोचा सभी दोस्तों से इसे साझा किया जाये और अगर उनमें से यदि कोई इस समस्या से ग्रसित हों तो ...............अंजाम के लिए हेलमेट लगाकर तैयार रहें। जिस रूप में आई है उसी में प्रस्तुत कर रही हूँ । शीर्षक मैं खुद दे रही हूँ ।

एक बेचारा ..........शायरी का मारा



विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को नहीं - वह है एक अदद श्रोता और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट कवि की धर्मपत्नी होती है अगर वह किसी हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता इसीलिए वह आजीवन अपने भाग्य को कोसती रहती हैं एक वह दिन कि आज का दिन वह तो विधि का विधान था कि इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की आदि श्रोता वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए उस समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -'अरे ! भाग्यवान ! इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ -

'रोटी कपडा और मकान
कवियों का इस से क्या काम
रोटी कपडा और मकान "

'बोलो कैसी लगी ?'- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी . देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला? रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता सुनते-सुनते काश ! कि हम बहरे होते
ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए कहते हैं कि वह एक विदुषी महिला थीं
परन्तु अविवाहित कवियों को एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं और वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ से चाहें उतर सकता है वह स्वतंत्र है स्वतंत्र लेखन करता है यह स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है यही कारण है की विवाहित कवि या तो 'वाम-पंथी' विचारधारा के होते हैं या फिर 'दक्षिण-पंथी' विचारधारा के होते है जो खाट से उतरते ही नहीं वह 'निठ्ठल्ले" कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था . शे'र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था' 'मतला' हो गया (मिचली नहीं) .सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को सुनाते है -
तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
रहता है दिल में कोई तुझ-सा मकीन है
'यह यकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम. वज़नदार शे'र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे"र अच्छा बना है मैंने बड़े प्यार से समझाया- 'मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला -उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
यकायक चिल्ला उठी - मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा है आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं .इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है ज़रा इन पर कड़ी नज़र रखना लगता है आपा ने ठीक ही कहा था
' बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है अरे! इस शे'र का मतलब समझो ,शे'र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे ,आप को यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद एक साया इधर भी रहता है
अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -" चुप रहिए! हमें चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब मालूम्हें .अरे! यह शायर लिखते तो है अपने उस 'छमक-छल्लो' के लिए और नाम लेते है 'खुदा' का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच में लाने पर.
" कौन है वह?'-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
'कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
' अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें दिल-ओ-जान से रहती है ?'
'लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर '
'हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं भेजी थी '
'बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं '
'हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे'र समझने की तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की असल ....
फिर क्या होना था .वही हुआ जो ऐसे मौके पर हर पत्नी करती है -रोना-धोना सर पीटना (अपना) अचूक अस्त्र अचूक निशाना
अब ग़ज़ल का अगला शे'र क्या सुनाना
०० ०० ००००००
शायरों की यही तो कमज़ोरी है .इस तरह की दाद पर मायूस हो जाएं तो हो चुकी शायरी अरे! शायरी तो दीवानापन है ,बेखुदी है.सड़े अंडे-टमाटर की परवाह कौन करे मजनू ने की थी क्या? महीने गुज़र गए अब तक तो बेगम का गुस्सा भी ठंडा हो गया होगा चलते हैं दूसरा शे'र सुनाते हैं -
ताउम्र इसी बात की जद्द-ओ-ज़हद रही
अपनी ज़मीन है या उनकी ज़मीन है
अभी शे'र का काफिया ख़त्म भी न हुआ था की बेगम साहिबा एक बार फिर भड़क उठी -"हाय अलाह !अब ज़मीन जायदाद भी उसके नाम कर दिया क्या! "
"अरे! चुप ,किस की बात कर रही हो तुम?"
"अरे! तुम्हारे कमीन - मकीन की "
"या अल्लाह इस नाशुक्री बीवी को थोडा-सा अक्ल अता कर वरना तुम्हारा यह शायर इस कमज़र्फ़ बीवी के हाथों ख्वामख्वाह मारा जाएगा मैंने तो यह शे"र तुम्हारी शान में पढा था यह जिस्म यह जान किस की है ..अपनी या तुम्हारी ...."
"पहले ज़मीन-जायदाद का कागज़ दिखाओ ..ज़रूर उस सौतन को लिखने का इरादा होगा ...." बेगम साहिबा ने मेरा हाथ ही पकड़ लिया
अब इस शे'र के मानी क्या समझाते अगला शे'र क्या सुनाते चुप ही रहना बेहतर समझा
०० ०००००००००
अब मैंने यह तय कर लिया की अब इस औरत को न कोई शे'र सुनाना, न कोई ग़ज़ल इस से अच्छा तो किसी चाय की दुकान पे सुनाते तो कम से कम चाय तो मिलती.घर की मुर्गी साग बराबर .इस औरत के लिए तो घर का जोगी जोगडा ...इसे मेरी औकात का क्या पता आज शाम नखास पर मुशायरा है बड़े अदब से बुलाया है उन लोगो ने अपनी शेरवानी निकाली.चूडीदार पायजामा पहना,फर की टोपी पहनी ,आँखों में सुरमा लगाया ,कानो के पास इतर लगाया ,करीने से रुमाल रखा.फिल्मवालों ने यही ड्रेस कोड तय कर रखा है हम जैसे शायरों के लिए .शायरी में दम हो न हो मगर ड्रेस में तो दम हो .
कवि की बात अलग है ,शायरी की बात अलग वीर रस के कवि हैं तो मंच पर आये ,हाथ-पैर पटक गए,श्रृंगार रस के कवि हैं तो आए और लिपट गए, रस के कवि हैं तो रो-धो कर निपट गए मगर शायरी ! शायर को एक एक शे'र तीन-तीन बार पढ़ना पड़ता है फिर देखना पड़ता है किधर से गालियाँ आ रही है ,किधर से तालियाँ .हम गुमनाम शायरों के लिए सड़े अंडे-टमाटर तो छोड़ दीजिए यहाँ भी 'ब्रांड-वैल्यू' बिकता है नामचीन शायर है तो मंच पर आने से पहले 'तालियाँ बजती हैं ,हम जैसों के लिए जाने के बाद 'तालियाँ' बजती है -गया मुआ ! पता नहीं कहाँ -कहाँ से पकड़ लाते हैं यह प्रोग्राम वाले.
अब तो ड्रेस पर ही भरोसा था .शीशे के सामने खड़े हो कर शे'र अदायगी का रिहर्सल कर रहा था -
दीदार तो नहीं है चर्चे मगर सुने -
वह भी किसी हसीं से ज्यादा हसीन हैं

पीछे से किसी ने ताली बजाई ,सामने से मैंने शुक्रिया अदा किया .मुड़ कर देखा बेगम साहिबा हैं.-'वाह ! वाह ! सुभान अल्लाह !सुभान अल्लाह !क्या शे'र मारा है .अब जाओ दीदार भी कर लो ,बेकरार होगी .कब्र में पाँव लटकाए बैठे है ज़नाब की न जाने कब फाख्ता उड़ जाय ...वह भी हसरत पूरी कर लो ....'-बेगम साहिबा ने भडास निकाली .
'बेगम ! किसकी बात कर रही हो?'
'अरे! उसी कलमुंही कमीन मकीन की.हसीन हैं न ! हम से भी ज्यादा हसीन है न '
'लाहौल विला कूवत ! कमज़र्फ़ औरत! शे'र समझने की तमीज नहीं तमीज होगी भी कैसे -सास बहू सीरियल देखने से.टेसूए बहाने से .किट्टी पार्टी करने से फुरसत होगी तब न ,शायरी समझने की तमीज आयेगी '
'हाँ हाँ ,हमें क्यों तमीज आयेगी ! सारी तमीज या तो उस छमकछल्लो के पास है या आप के पास है '
'बेगम ! इस शे'र का मतलब तुम नहीं समझती हो ,इस का मतलब है या मेरे मौला ,परवरदिगार जिन्दगी गुजर गयी मगर आज तक दीदार नहीं हो सका ,मगर खुदा के बन्दे बताते है की आप इस ज़हान के सब से खूबसूरत हसीन .....'
देखिए जी .कहे देती हूँ !हमें इतनी भोली मत समझिए ,हमारे अब्बा ने मुझे भी तालीम दी है ,हमें भी अदीब की जानकारी है हम उड़ती चिडिया के पर गिन सकते हैं ,खुली आँखों से सुरमा चुरा सकते हैं आप हम से नज़रें नहीं चुरा सकते हैं .....वो तो मेरे करम ही फूटे थे की......'-कहते -कहते रो पडी

फिर उसके बाद क्या हुआ ,विवाहित पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता हूँ वहां से जो भागा तो मुशायरे में जा कर ही दम लिया .पूरी ग़ज़ल वहीँ पढ़ी -गालियाँ मिली या तालियाँ आप स्वयं ही समझ लें



शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

फूलझड़ी

वैलेंटाइन के बहाने से चैट पर
आशिकी झाड़ने वालों
बच के रहना
जिस दिन कोई
सिरफिरी टकरा जाएगी
आशिकी की सारी
भूतनियाँ उतार जाएगी
जेब के पैसे जब
डकार जाएगी
तब घरवाली भी
हाथ से निकल जाएगी
वैलेन्टाइन की माला
जपने वाले एक बार में ही

तेरा वैलेन्टाइन मना जाएगी
फिर हर औरत में तुम्हें
माँ , बहन ही नज़र आएगी
तेरी आशिकी की फूलझड़ी में
कंगाली का बम लगा जाएगी
इस बार की होली में
अपनी दिवाली और
तेरा दिवाला निकाल जाएगी

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

बस इतना सा ............

मैं नही कहता
आसमाँ से चाँद
तोड़कर लाऊँगा
नहीं
कहता
तारों से
माँग सजाऊँगा
मैं नही कहता
तेरे लिए
आग का दरिया
पार कर जाऊंगा
नहीं कहता
तूफानों का
रुख मोड़ दूँगा
कोई वादा
नही करता
कोई कसम
नही उठाता
बस
धड़कन की
हर ताल
के साथ
पलकों की
गिरती -उठती
चिलमन के साथ
साँसों की
निर्बाध गति
के साथ
क्षण- प्रतिक्षण
अपनी ज़िन्दगी के
अंतिम पल
अंतिम श्वास
अंतिम धड़कन तक
सिर्फ और सिर्फ
तुझे ही चाहूँगा

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

क्षणिकाएं

तुम मानो या ना मानो
मुझे पता है
प्यार करती हो मुझे
तुम स्वीकारो या ना स्वीकारो
मुझे पता है
तुम्हारा हूँ मैं


अश्क भी आते नही
दर्द भी होता नही
तू पास होकर भी
अब पास होता नही


इक आती सांस के साथ
तेरे आने की आस बँधी
और जाती सांस के साथ
हर आस टूट गयी


तेरी पुकार में ही
दम ना था
मैं तो किनारे
ही खड़ी थी


किनारे की मिटटी को
छूकर तो देख
मेरे अश्क से
भीगी मिलेगी
दिल के तारों को
छेडकर तो देख
मेरे ही गीत
गाते मिलेंगे
लम्हों के पास
आकर तो देख
तेरे मेरे प्यार के
फ़साने ही मिलेंगे


या तो
याद बना ले मुझको
या याद बन जा
यादों के आने जाने से
पास होने का
अहसास होता है

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

मत हवा दो

भड़कती चिंगारी
धधकता ज्वालामुखी
हर सीने में है
मत हवा दो

चिंगारी गर शोला
बन जाएगी
कहर बन बरस जाएगी
ज्वालामुखी गर
जो फट जायेगा
सैलाब इक ले आएगा
मत हवा दो

हवा का रुख
ज़रा तो देखा करो
कुछ तो सोचा
समझा करो
मत आदमी के
सब्र का इम्तिहान लो
गर एक बार
आदमी , आदमी बन गया
शोलो को उठाकर
हाथ में
धधकते ज्वालामुखी
की आग में
करके भस्म
भ्रष्टाचार, हिंसा,
स्वार्थपरता,
आतंकवाद की
हर शय को
खुद को वो
साबित कर देगा
हवाओं का रुख
भी बदल देगा
अब तो संभल जाओ
मत रेत के
महल बनाओ
मत आज़ादी का
गलत फायदा उठाओ
मत हवा दो
आदमी की
उस आग को
मत हवा दो .........

बुधवार, 20 जनवरी 2010

मन की गलियाँ

मन की
विहंगम गलियाँ
और उसके
हर मोड़ पर
हर कोने में
इक अहसास
तेरे होने का
बस और क्या चाहिए
जीने के लिए
वहाँ हम
तुझसे बतियाते हैं
और चले जाते हैं
फिर उन्ही गलियों के
किसी मोड़ पर
और खोजते हैं
उसमें खुद को
ना तुझसे बिछड़ते हैं
ना खुद से मिल पाते हैं
और मन की गलियों की
इन भूलभुलैयों में
खोये चले जाते हैं

रविवार, 17 जनवरी 2010

मत करो ऐसा ...........

मैं कोई वस्तु नही
क्यूँ मेरी बोली लगाते हो
दुनिया की इस मंडी में
क्यूँ खरीदी बेचीं जाती हूँ
कभी धर्म के ठेकेदारों ने
मेरी बलि चढ़ाई है
कभी समाज के ठेकेदारों ने
मेरी बोली लगायी है
मैं भी इक इंसान हूँ
मुझमें भी खुदा बसता है
उसी खुदा की नेमत हूँ
जिसकी करते तुम आशनाई हो
फिर क्यूँ मुझे ही पीसा जाता है
क्यूँ मेरा ही गला दबाया जाता है
जननी भी हूँ , भगिनी भी हूँ
फिर भी भटकती फिरती हूँ
अपना अस्तित्व बचाने की चाह में
मर -मरकर भी जीती हूँ
मुझमें भी हैं अरमान पलते
मेरी भी हैं चाहतें मासूम
क्यूँ नही उन्हें मिली आज तक
दिल की जो गहराई है
क्यूँ अबला का तमगा चिपकाते हो
रिश्तों को क्यूँ बेडी बनाते हो
औरत हूँ मैं
सिर्फ भोग्या नही
मान क्यूँ नही लेते हो
कदम दर कदम चली मैं तुम्हारे
फिर क्यूँ नही मेरे साथ तुम चलते हो
अधिकरों की बात पर क्यूँ तुम
इतना शोर मचाते हो
कर्तव्यों की आंच पर क्यूँ
मेरी भावनाएं जलाते हो
क्या फर्क है मुझमें और तुममें
कौन सी कड़ी कमजोर है
फिर क्यूँ मुझे ही ये
ज़हर का घूँट पिलाते हो
मैं भी इक इंसान हूँ
मेरा भी लहू लाल है
मुझमें भी वो ही दिल है
बताओ फिर क्या फर्क है
मुझमें और तुममें
क्यूँ मुझे ही दोजख की
आग में जलाये जाते हो

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

कुछ ख्याल

पति होने का धर्म
उसने कुछ ऐसे निभाया
इक हँसते , मुस्कुराते
ज़िन्दगी की उमंगों से
भरपूर गुल को
निर्जीव, बेजान बनाया


तू
तेरा ख्याल
और
तेरी ज़िन्दगी
सब तेरा
इसमें
'मैं ' कहाँ हूँ ?


जो दिखाई ना दे
वो अश्क
जो सुनाई ना दे
वो शब्द
और दोनों का दर्द
कभी झांकना
उनके आईने में
वहां जलते हुए
रेगिस्तान मिलेंगे


रोज चूर -चूर होना
और फिर जुड़ जाना
ए दिल-ए-नादाँ
ये फितरत कहाँ से पाई ?


कोई भाग सकता है सबसे
मगर नही भाग सकता खुदी से


ख्वाहिशों के बिस्तर पर
करवट बदलती रात
भोर की पहली किरण के साथ
दम तोड़ जाती है

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

गिले -शिकवे

इक प्यासी रूह को
सुकून कब मिला है

घुटन की दलदल में फंसी
ज़िन्दगी का यही सिला है

चेहरे पर उभरती लकीरों में
दर्द का ही सिलसिला है

कुछ पल ठहर जाऊं कहीं
ज़िन्दगी का बस यही गिला है

रविवार, 6 दिसंबर 2009

दबी चिंगारी को हवा मत दो............६ दिसम्बर

मरा इक शख्स था
हुए बरबाद
न जाने कितने थे


उस एक चेहरे को ढूंढती
निगाहें आज
न जाने कितनी हैं
गम का वो सूखा
ठहरा आज भी
हर इक निगाह में है
सियासत की ज़मीन
पर बिखरी
लाशें हजारों हैं


राम के नाम पर
राम की ज़मीन
हुई लाल है
धर्म के नाम पर
ठगी ज़िन्दगी
आज नाराज है


कैसे ये क़र्ज़ चुकाओगे
कैसे फिर फ़र्ज़ निभाओगे
लहू के दरिया में बही
मानवता फिर आज है


कैसे एक दिन के लिए
सियासत यूँ चमकती है
बरसों से जमी
यादों की परतें
कैसे मिटाओगे
सीने में दबी
चिंगारी को हवा
दिया नही करते
जो भड़के
अबकी शोले
फिर कैसे बुझाओगे ?

बुधवार, 25 नवंबर 2009

कैसे करूँ नमन ?

शहीदों को नमन किया
श्रद्धांजलि अर्पित की
और हो गया कर्तव्य पूरा


ए मेरे देशवासियों
किस हाल में है
मेरे घर के वासी
कभी जाकर पूछना हाल उनका


बेटे की आंखों में
ठहरे इंतज़ार को
एक बार कुरेदना तो सही
सावन की बरसात
तो ठहर भी जाती है
मगर इस बरसात का
बाँध कहाँ बाँधोगे
कभी बिटिया के सपनो में
झांकना तो सही
उसके ख्वाबों के
बिखरने का दर्द
एक बार उठाना तो सही
कुचले हुए
अरमानों की क्षत-विक्षत
लाश के बोझ को कैसे संभालोगे?


कभी माँ के आँचल
को हिलाना तो सही
दर्द के टुकड़ों को न समेट पाओगे
पिता के सीने में
जलते अरमानो की चिता में
तुम भी झुलस जाओगे

कभी मेरी बेवा के
चेहरे को ताकना तो सही
बर्फ से ज़र्द चेहरे को
एक बार पढ़ना तो सही
सूनी मांग में ठहरे पतझड़ को
एक बार देखना तो सही
होठों पर ठहरी ख़ामोशी को
एक बार तोड़ने की
कोशिश करना तो सही
भावनाओं का सैलाब जो आएगा
सारे तटबंधों को तोड़ता
तुम्हें भी बहा ले जाएगा
तब जानोगे
एक ज़िन्दगी खोने का दर्द

चलो ये भी मत करना 
बस तुम कुछ तो जिंदा खुद को कर लेना 
मेरी बीवी मेरे बच्चे 
मेरी माँ मेरे पिता 
सबके चेहरे पर मुस्कान खिल जायेगी 
जिस दिन शहादत के सही मायने तुम्हें समझ आयेंगे 
और तुम 
अपने घर में छुपे गद्दारों से दो - दो हाथ कर पाओगे 

पडोसी मुल्क जिंदाबाद के नारों 
और आतंकवादी की मृत्यु के विरोध में 
उठती आवाजों से
जिस दिन तुम्हारे कान फट जायेंगे 
विद्रोह के बीज के साथ 
देशभक्ति के बीज तुम्हारी नस्लों में बुब जायेंगे 
मेरी शहादत आकार पा जायेगी 
देश की मिटटी देश के काम आयी 
सोच , मेरी रूह सही मायनों में 
उस दिन सुकून पाएगी 

क्योंकि तुम
तब शायद समझ पाओगे
कर्तव्य सिर्फ़ नमन तक नही होता
सिर्फ़ नमन तक नही होता....

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

मत ढूँढ बाहर

उस एक स्वरुप में
क्यूँ न खोजा तूने
जो दूसरे में पाना
चाहता है
मानव तू क्यूँ
भटकना चाहता है
भावों के दलदल में
क्यूँ धँसता जाता है
तेरे हर ख्वाब की
ताबीर वहीँ है
हर चाहत का
हासिल वही है
हर राह की
मंजिल वही है
फिर क्यूँ तू
मरुभूमि में
जल के कण
ढूंढ़ना चाहता है
क्यूँ सागर से
प्यास बुझाना
चाहता है
तेरा चाँद तेरे साथ है
फिर क्या भटकने की बात है
खोज , जो खोजना है
पा , जो पाना चाहता है
दे , जो देना चाहता है
मगर सिर्फ़
उसी स्वरुप में
उसी दिव्य रूप में
जो तेरे साथ है
तेरे पास है
फिर क्यूँ तुझे
झूठे प्यार की तलाश है
मृगतृष्णा को छोड़
उस कच्चे धागे की
डोर से बंधकर
तो देख एक बार
हर ओर
रौशनी होगी
सितारों सी चमक होगी
बहारों की महक होगी
मत ढूंढ बाहर कहीं
तेरा महबूब
उसी स्वरुप में
तुझे मिल जाएगा
जिसे तूने कभी
चाहने की कोशिश न की
जिसके अंतस में
दिया कभी जलाया ही नही
एक बार
तू कोशिश तो कर
फिर दूसरा न कोई रूप
दूसरा न कोई स्वरुप
तुझे दिख पायेगा
तेरा अपना महबूब ही
उसमें मिल जाएगा
तू एक बार
उसके अंतस में
उतर कर तो देख

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

ज़ख्मों का बाज़ार

ज़ख्मों को प्यार हमने दिया
तेरे दिए हर ज़ख्म को
दुलार हमने दिया
ज़ख्मों का बाज़ार
हमने भी लगा रखा है
एक बार हाथ लगाओ तो सही
ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही
हर ज़ख्म से आवाज़ ये आएगी
यार मेरे , तुम एक नया ज़ख्म
और दे जाओ तो सही
आओ प्यार मेरे , ज़ख्मो को
नासूर बनाओ तो सही
प्यार का ये रंग भी
दिखाओ तो सही
बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

कोई तो कारण रहा होगा

क्यूँ तेरी याद फिर आई है
लगता है
तुमने मुझे पुकारा है
किस दर्द ने फिर दस्तक दी है
तभी तो
हूक मेरे दिल में भी उठी है
तेरे गम से जुदा
मेरा दर्द कब था
तेरी इक आह पर
दर्द मेरा सिसकता है
लगता है
फिर कोई ज़ख्म उधड गया है
तभी तो
तेरी इक सिसकी पर
रूह मेरी कसमसाई है
कोई तो कारण रहा होगा
यूँ ही तो तेरी याद नही आई है

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

ये कैसा है पोरुष तेरा

ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

अबला की लुटती लाज देख
जो बहरा बन , मूक हो
नज़र चुरा चला जाए
करुण पुकार भी न
जिसका ह्रदय विदीर्ण
कर पाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

अत्याचारों की बानगी देख
असहाय , निर्दोष की
हृदयविदारक चीख सुन भी
जो सिर्फ़ तमाशाई बन जाए
दयनीय हालत देखकर भी
जिसका सीना पत्थर बन जाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

राजनीति की बिसात पर जो
चापलूसी की नीति अपनाए
अन्याय के खिलाफ जो
कभी आवाज़ न उठा पाए
नेताओं के हाथों की जो
ख़ुद कठपुतली बन जाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

पत्नी की चाहत को जो
अपना न बना पाए
उसके रूह के द्वार की कभी
किवडिया ना खडका पाए
अपने ही अभिमान में चूर
अर्धांगिनी की जगह न दे पाए
पत्नी पर ही अपने पोरुष का
जो हर पल झंडा फहराए
अपने अधिकारों का
अनुचित प्रयोग कर जाए
अपने मान की खातिर
भार्या का अपमान कर जाए
अपने झूठे दंभ की खातिर
ह्रदय विहीन बन जाए
कैसा वो पुरूष होगा
और कैसा उसका पोरुष
किस पोरुष की बात हो करते
किस दंभ में हो फंसे
जागो , उठो
एक बार इन्सान तो बन जाओ
नपुंसक जीवन को छोड़
एक बार पुरूष ही बन जाओ
एक बार पुरूष ही बन जाओ

रविवार, 27 सितंबर 2009

तेरे आने से

कभी मिलोगी?
साँस छूटने से पहले मुझसे
पकडोगी हाथ मेरा
मौत का हाथ पकड़ने से पहले
बस इतनी सी इल्तिजा है
इक नज़र देख लूँ तुमको
और सुकून की नींद सो जाऊँ
फिर न जगाने आए कोई
कब्र पर मेरी
कोई फूल भी न चढाये
तमाम हसरतें, आरजुएं
इक दीदार के साथ
तमाम हो जाएँगी
मेरा उम्र भर का इंतज़ार
करार पा जायेगा
सिर्फ़ एक बार
तेरे आने से ...................

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

हश्र यही होना है

ज़रा पूछ तो हाल
शाख पर लटके
उस सूखे हुए पत्ते का
ज़रा देख तो उस ओर
ज़िन्दगी के बसंत तो
उसने भी देखे थे
सावन की रिमझिम फुहारों में
वो भी तो भीगा था
मौसम का हर रंग
उस पर भी तो चढा था
ज़िन्दगी की रंगीनियों का आनंद
उसने भी तो लिया था
पर अब देख उसका हाल
कैसा अलग -थलग सा
पड़ गया है
ज़िन्दगी का हर गम
वो झेल चुका है
हर तूफ़ान से
वो लड़ चुका है
ज़रा देख
उसकी खामोशी
सब बयां कर देगी
नज़रे उसकी तुझे भी
घायल कर देंगी
सिर्फ़ एक झोंका उसे
शाख से तोड़ देगा
और ज़िन्दगी से
नाता तोड़ देगा
ज़रा देख उस ओर
हश्र तेरा भी इक दिन
यही होना है ..............

बुधवार, 2 सितंबर 2009

आँख तो फिर भी भर आई होगी

कुछ अश्क तो झड़ते होंगे
आँख से तेरी भी
कुछ कहानी
मेरी भी तो
कहते होंगे
दर्द जो दिया तूने
उसे इक नया
नाम तो देते होंगे
यादों को मेरी
तेरी यादों में
संजोते तो होंगे
जो पल
साथ बिताये थे
याद दिलाते होंगे
कभी रुलाते होंगे
कभी हँसाते होंगे
कभी यादों के नश्तर
चुभाते तो होंगे
कभी ज़ख्म हरे
होते तो होंगे
कहीं कोई नासूर
भी तो होगा
उसे कुरेदते तो होंगे
अश्क मरहम बन वहां
टपक तो जाते होंगे
मुझे तडपाने की चाह में
क्या तू न तड़पता होगा
मुझे रुलाने की चाह में
क्या तू न रोता होगा
कुछ यादों के कफ़न
उम्र भर ओढ़ने पड़ते हैं
कहीं तू भी तो भटका होगा
मेरी चाह में
कभी तो सिसका होगा
एक टीस बन
दर्द कभी तो
छलछलाता होगा
कुछ न कुछ तो
दिल तेरा भी
बुदबुदाता होगा
मेरे दर्द की याद में
कुछ चाहतें तेरी भी तो
कसमसाई होंगी
कभी याद न आई हो मगर
आँख तो फिर भी
भर आई होगी
आँख तो फिर भी
भर आई होगी ............

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

इक अनाथ का दर्द

मैं अनाथ हूँ तो क्या
मुझे न मिलेगा प्यार कभी
किसी की आँख का तारा
क्या कभी बन पाऊंगा
किसी के घर आँगन में
फूल बन मह्कूंगा कभी


ओ दुनिया वालों
मैं भी तो इक बच्चा हूँ
माना तुम्हारा खून नही हूँ
न ही संस्कार तुम्हारे हैं
फिर भी हर बाल सुलभ
चेष्टाएं तो हैं मेरी भी वही
क्या संस्कार ही बच्चे को
माँ की गोद दिलाते हैं
क्या खून ही बच्चे को
पिता का नाम दिलाता है
क्या हर रिश्ता केवल
खून और संस्कार बनाता है

तुम तो सभ्य समाज के
सभ्य इंसान हो
फिर क्यूँ नही
मेरी पीड़ा समझ पाते हो
मैं भी तरसता हूँ
माँ की लोरी सुनने को
मैं भी मचलना चाहता हूँपिता की ऊँगली पकड़
मैं भी चलना चाहता हूँ
क्या दूसरे का बच्चा हूँ
इसीलिए मैं बच्चा नही
यदि खून की ही बात है तो
खुदा ने तो न फर्क किया
फिर क्यूँ तुम फर्क दिखाते हो
लाल रंग है लहू का मेरे भी
फिर भी मुझे न अपनाते हो
अगर खून और संस्कार तुम्हारे हैं
फिर क्यूँ आतंकियों का बोलबाला है
हर ओर देश में देखोआतंक का ही साम्राज्य है
अब कहो दुनिया के कर्णधारों
क्या वो खून तुम्हारा अपना नही

एक बार मेरी ओर निहारो तो सही
मुझे भी अपना बनाओ तो सही
फिर देखना तुम्हारी परवरिश से
ये फूल भी खिल जाएगा
तुम्हारे ही संस्कारों से
दुनिया को जन्नत बनाएगा
बस इक बार
हाथ बढाओ तो सही
हाथ बढाओ तो सही

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

भावसागर

मैं तो इक तन हूँ
बस मन ही बुला रहा है
भावों में बसे हो तुम
बस दिल ही लुभा रहा है
मैं तो सिर्फ़ चंदा हूँ
बस चकोर ही बुला रहा है
शमा के हुस्न में जलने को
परवाना ही चला आ रहा है
मैं तो इक मूरत हूँ
तुम्हें ही खुदा नज़र आ रहा है
पत्थरों में दीदार करने को
बस ख्याल ही बुला रहा है
मैं तो सिर्फ़ पुष्प हूँ
बस भ्रमर ही ललचा रहा है
कलियों के सौंदर्य में डूबने को
खिंचा चला आ रहा है
मैं तो इक नदिया हूँ
बस सागर ही बुला रहा है
भावों के गहन सैलाब में
बस ह्रदय ही गोते खा रहा है
मैं तो इक तन हूँ
बस मन ही बुला रहा है

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

प्रेम की सर्पीली डगर

प्रेम के बंधन में बंधे
कभी मोहन है , कभी श्यामा है
प्रेम की सर्पीली डगर
कौन समझा है , कौन जाना है
प्रेम में प्रेमी का रुख
कभी तोला है , कभी माशा है
प्रेम के पलडों में तुले
कभी मीरा है , कभी राधा है

रविवार, 9 अगस्त 2009

एक बेटी की पीड़ा ----------कब आओगी तुम

माँ
कहाँ हो तुम ?
जाने से पहले
यूँ भी न सोचा
तुम्हारे बाद
मेरा क्या होगा?
कौन मुझे चाहेगा?
कौन मुझे दुलारेगा ?
मेरे होठों की हँसी के लिए
कौन तड़प -तड़प जाएगा
मेरी इक आह पर
कौन सिसक- सिसक जाएगा

पिता ने तो अपनी
नई दुनिया बसा ली है
अब तो नई माँ की हर बात
उन्होंने मान ली है
तुम ही बताओ
अब कहाँ जाऊँ मैं
किसे माँ कहकर पुकारूँ मैं
यहाँ पग-पग पर
ठोकर और गाली है
तुम्हारी लाडली के लिए अब
कोई जगह न खाली है

माँ , कहाँ हो तुम ?
क्या मेरे दर्द को नही जानती
क्या अब तुम्हें दर्द नही होता
अपनी बेटी की पीड़ा से
क्या अब तुम्हारा
दिल नही रोता
क्यूँ चली गई जहान छोड़कर
मुझे भरी दुनिया में
अकेला छोड़कर
किस्से अपने सुख दुःख बाटूँ
कैसे मन के गुबार निकालूं
कौन है जो मेरा है ?
ये कैसा रैन-बसेरा है ?
जहाँ कोई नही मेरा है

अब तो घुट-घुट कर जीती हूँ
और खून के आंसू पीती हूँ
जिस लाडली के कदम
जमीं पर न पड़े कभी
वो उसी जमीं पर सोती है
और तुम्हारी बाट जोहती है
इक बार तो आओगी तुम
मुझे अपने गले लगाओगी तुम
मुझे हर दुःख की छाया से
कभी तो मुक्त कराओगी तुम
बोलो न माँ
कब आओगी तुम ?
कब आओगी तुम?

बुधवार, 5 अगस्त 2009

अजीब नाता

देखा कैसा अजीब सा नाता है
दूर होकर भी पास होते हैं
एक दूसरे को न देखकर भी देखते हैं
बिना बात किए भी बतियाते हैं
कसक सी दिल में लिए
होठों को सिए रखते हैं
मुलाक़ात की चाह में
रोज दीदार को आते हैं
पर तेरे दर-ओ-दीवार
रोज ही बंद नज़र आते हैं
चाह उतनी ही उत्कट उधर भी है
ये मालूम है मगर
तेरे अहम् के नश्तर ही
तुझे भी रुलाते हैं
ये घुटती हुई खामोशी
इसकी सर्द आवाज़
दिल के तारों पर
दर्द बन ढल जाती है
बिना आवाज़ दिए भी
दोनों के दिल गुनगुनाते हैं
देखा कैसा अजीब सा नाता है

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

ख्वाबों के घरोंदे

आज कुछ
ख्वाबों को

दिल की
धरती पर
बोया है
आशाओं के
बीजों को
दिल की मिटटी में
कुछ ऐसे
बो दिया
कि जैसे कोई
आशिक
अपनी महबूबा
की हसरत में
ख़ुद को
मिटा देता हो
अब इसमें
हर सपने की
एक-एक
कणिका को
खाद बनाया है
जैसे कोई
स्वर्णकार
किरच-किरच
सोने की
संभाले जाता हो
और उसमें
दिल के हर
अरमान की
बूँद - बूँद का
पानी दिया है
जैसे कोई
मूर्तिकार
अपनी शिल्प में
आखिरी हीरा
जड़ रहा हो
अब तो बस
इंतज़ार है
उस पल का
जब आशाओं की
फसल लहलहाएगी
दिल की धरती भी
महक-महक जायेगी
हर ख्वाब को
उसकी ताबीर मिल जायेगी

सोमवार, 27 जुलाई 2009

यादें

कभी कभी जरूरतें याद ले आती हैं
वरना याद किसी को किसी की कब आती है

यादों में बसर किसी की तभी किया करते हैं
जब कोई किसी के दिल में घर किया करते हैं

यादों के सहारे ज़िन्दगी गुजारने वाले
ऐसे चेहरे कम ही हुआ करते हैं

किसी की याद में जीने मरने वाले
न जाने किस मिटटी के बना करते हैं

यादों की दहलीज पर पाँव रखते ही
न जाने कितने नश्तर सीने में चुभा करते हैं

शाम होते ही यादों की अर्थी सजा लेते हैं
रात भर यादों की चिता में जला करते हैं

रविवार, 19 जुलाई 2009

बिना कारण ही

बिना कारण भी
दिल उदास होता है
बिना कारण भी
कोई आस - पास होता है
कभी ख्यालों में
दस्तक देता है
कभी ख्वाबों में
दिखाई देता है
बिना कारण भी
नज़रों को धोखा होता है
पलकों की चिलमन में
बिना कारण भी
कोई क़ैद रहता है
पलकों के गिरने उठने की गति
सांसों की डोर ठहरा जाती है
बिना कारण ही
कई बार ऐसा भी होता है
साँसे थम सी जाती हैं
नब्ज़ भी रुकने लगती है
मगर बिना कारण
तब भी दिल धड़कता रहता है
किसी की आहट पर
बिना कारण ही
भटकता रहता है
कभी जज़्बात लरजने लगते हैं
कभी अरमान बहकने लगते हैं
बिना कारण ही
कभी जीवन महकने लगता है
कई बार ऐसा भी होता है
बिना कारण ही
कई बार ऐसा भी होता है

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ज़िन्दगी तू एक अबूझ पहेली है

ज़िन्दगी
तू एक अबूझ पहेली है
जितना सुलझाओ
उतनी उलझती है
कभी पास लगती है
तो कभी दूर
इतनी दूर
कि जिसका
पार नही मिलता

ज़िन्दगी
तू एक ख्वाब है
कभी सब सच लगता है
तो कभी ख्वाब सी
टूटती बिखरती है

ज़िन्दगी
तू एक मौसम है
कभी बसंत सी महकती है
तो कभी शिशिर सी
जकड़ती है
कभी सावन सी
रिमझिम बरसती है
तो कभी ग्रीष्म सी
दहकती है

ज़िन्दगी
तू एक भंवर है
जिसके अथाह जल में
हर घुमाव पर
सिर्फ़ और सिर्फ़
डूबना ही है
अनन्त में
खोने के लिए

ज़िन्दगी
तू सिर्फ़ ज़िन्दगी है
न ख़ुद जीती है कभी
न रूकती है कभी
बस सिर्फ़ और सिर्फ़
चलती ही रहती है
एक अनदेखी
अनजानी
दिशा की ओर
मंजिल की तलाश में
और मंजिल
रेगिस्तान में पानी के
चश्मे की तरह
बस कुछ दूर और
कुछ दूर और
दिखाई देती है
मगर
न रेगिस्तान में
कभी पानी मिलता है
और न ही कभी
ज़िन्दगी को मंजिल

सच ज़िन्दगी
तू एक अबूझ पहेली है

रविवार, 12 जुलाई 2009

दिल की खोज

उदास है दिल
न जाने क्यूँ
किसे खोजता है
किसकी तलाश है
शायद ये भी अब
किसी गहरे
सागर में डूब
जाना चाहता है
शायद ये भी
सागर की तलहटी में
छुपे किसी अनमोल
मोती की तलाश में है
या फिर शायद
ये भी सागर के अंतस की
अनन्त गहराई में
खो जाना चाहता है
जहाँ खुद को पा सके
कुछ पल अपने लिए
सुकून के खोज सके
आख़िर दिल दिल ही है
कब तक सब कुछ झेलेगा
कभी तो खुद को भी टटोलेगा
कभी तो अपने को भी खोजेगा
इस दिल की पीड़ा को
कोई क्या समझेगा
दिल भी आख़िर दिल ही है
कभी तो जीना सीखेगा
कब तक खिलौना बन भटकेगा
अब तो खुद के लिए भी
एक किनारा ढूंढेगा
कहीं तो ठोर पायेगा
और तब शायद
उसका वजूद भी
उसमें ही सिमट जाएगा


गुरुवार, 9 जुलाई 2009

शब्दों का आमंत्रण

शब्दों के आमंत्रण पर
मैं बिन डोर
खिंची चली आती हूँ
शब्दों के सागर में फिर
बिन पतवार
नाव चलाती हूँ
कभी डूबती हूँ
कभी उतराती हूँ
तो कभी शब्दजाल के
भंवर में फंस जाती हूँ
शब्दों की आँख मिचोनी में
कभी शब्द विलीन हो जाते हैं
तो कभी मैं कहीं खो जाती हूँ
फिर शब्द खोजते हैं मुझको
और मैं शब्दों की चादर
ओढ़ सो जाती हूँ
शब्दों के संसार में
बिन पहचाने
शब्दों को खोजने जाती हूँ
शब्दों की गहन भाषा को
मैं बिन जाने भी
जान जाती हूँ
कभी शब्द मेरे हो जाते हैं
कभी मैं शब्दों की हो जाती हूँ
कभी शब्द मुझको छूते हैं
कभी मैं शब्दों में खो जाती हूँ
इस शब्दों के अनोखे खेल में
मैं शब्दों से लाड लड़ती हूँ
शब्दों के मीठे आमंत्रण पर मैं
बिन डोर खिंची चली आती हूँ

बुधवार, 1 जुलाई 2009

उन्हें शिकायत है हमसे

उन्हें शिकायत है हमसे
ख़ुद ही ज़ख्म देते हैं
ज़ख्मों पर मरहम नही
नमक छिड़कते हैं
टीस उठने पर
आह भी करने नही देते
आँख में आंसू आने पर
टपकने भी नही देते
फिर भी
उन्हें शिकायत है हमसे

कभी बेवफाई का
इल्जाम लगाते हैं
मगर ख़ुद ही
वफ़ा की गली से
कभी गुजरे नही
रंग वफ़ा के
होते हैं क्या
उनमें भी जो न डूबे कभी
और फिर भी
उन्हें शिकायत है हमसे

अपना हाल-ए-दिल
बयां कर जाते हैं
किसी के दिल पर
क्या गुजरी
ये भी न जाना कभी
उसके दिल का हाल
जाने बिना
उसके दर्द को
और बढ़ा जाते हैं
फिर भी
उन्हें शिकायत है हमसे

सिर्फ़ अपने लिए
जीते हैं जो
अपनी ही चाहत को
जानते हैं जो
किसी की भावनाओं को
न समझें जो
चाहत जिसके लिए
खुदगर्जी का
इक व्यापार हो
पग-पग पर
आहत कर दे जो
होठों की हंसीं
को भी सीं दे जो
और उस पर
उफ़ भी न करने दे जो
अंतःकरण में भी
न सिसकने दे जो
मर - मरकर भी
जो न जीने दे
उस पर भी
इल्जाम हो ये
कि
उन्हें शिकायत है हमसे