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बुधवार, 11 अगस्त 2021

हरियाली तीज का कोरस

     1

शनिवार, 12 जून 2021

ठनी है रार

 

बचा लो जो बचा सकते हो
ज़िन्दगी और मौत में ठनी है रार

अभी सदी ने सफहा पलटा नहीं है
अभी तो लिखी भर है इबारत
और तुम इतने भर से घबरा गए

जब तिलक लहू से माथे पर किया जाता है
उसे खुरचने को कोई औजार नहीं बना होता
प्रयास के अंतिम प्रहर में ही
कामयाबी दस्तखत किया करती है

तुम तय करो
लड़ना किससे है तुम्हें
जीतना किससे है तुम्हें
ज़िन्दगी से या मौत से
या फिर अपनी हताशा से, अपने विश्वास से

इस बार मौत ने चुपके से कान में सरगोशी नहीं की है
इस बार डंके की चोट पर कर रही है मुनादी
फिर ज़िन्दगी कैसे दहशत के लिफाफे में खुद को कैद रख सकती है
ज़िन्दगी वो योद्धा है
जो हर हाल में जीतना जानती है
बशर्ते
अपनी कमजोरियों से जीत सके







बुधवार, 26 मई 2021

ए उदासियों

 ए उदासियों आओ

इस मोहल्ले में जश्न मनाओ
कि यहाँ ऐतराज़ की दुकानों पर ताला पड़ा है
सोहर गाने का मौसम बहुत उम्दा है
रुके ठहरे सिमटे लम्हों से गले मिलो
हो सके तो मुस्कुराओ
एक दूजे को देखकर
यहाँ अदब का नया शहर बसा है
सिर्फ तुम्हारे लिये
रूमानी होने का मतलब
सिर्फ वही नहीं होता
तुम भी हो सकती हो रूमानी
अपने दायरों में
इक दूजे की आँख में झाँककर
सिर्फ इश्क की रुमानियत ही रुमानियत नहीं हुआ करती
उदासियों की रुमानियतों का इश्क सरेआम नहीं हुआ करता
चढ़ाये होंगे इश्क की दरगाह पर
सबने ख्वाबों के गुलाब
जिनकी कोई उम्र ही नहीं होती
मगर
उदासियों की सेज पर चढ़े गुलाब
किसी उम्र में नहीं मुरझाते
ये किश्तों में कटने के शऊर हैं
हो इरादा तो एक बार आजमा लेना खुद को
उदासियाँ पनाह दे भी देंगी और ले भी लेंगी
कि उदासियों से इश्क करने की कसम खाई है इस बार...

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

हाँ, नपुंसक ही है वो


तुम नहीं सुधरोगी
कोई सुधारना चाहे तब भी नहीं
कब खुद को पहचानोगी?
कब खुद के लिए जीना सीखोगी?
क्या सारा स्वाभिमान बेच दिया
एक नपुंसक के हाथों ?
हाँ, नपुंसक ही है वो
जो आधी रात वस्त्रहीन कर
घर से निकाल देता है
फिर भी नहीं जागता तुम में तुम्हारा स्वाभिमान ?
क्यों कठपुतली बन खुद को नचा रही हो ?
कोई तेज़ाब से झुलसा रहा है
कोई आग लगा रहा है
मगर तुम
तुमने ठानी हुई है गुलामी
आखिर कब तक नहीं तोडोगी गुलामी की जंजीरें?
गया वक्त गिडगिडाने का
नहीं पसीजा करते उनके दिल
सच मानो
दिल नहीं होते उनके अन्दर
और पत्थर कभी पिघला नहीं करते
मानो इस सत्य को
जागो, उठो और करो प्रयाण
कि दुर्गा को पूजने भर से नहीं बन जाओगी तुम दुर्गा
काली बनने के लिए जरूरी है
तुम्हारा आत्मोत्सर्ग
जरूरी है गलत के खिलाफ बिगुल
सुनो
हमारे कह देने भर से
तुम्हारे साथ खड़े हो जाने भर से
तुम्हारे लिए आवाज़ उठा देने भर से
नहीं मिलेगा तुम्हें न्याय
उसके लिए पहल का परचम तो तुम्हें ही लहराना पड़ेगा
एक कदम आगे तुम्हें ही बढ़ाना होगा
काटो उन जड़ों को
जिन्हें पीढ़ियों ने सींच
तुम्हारी शिराओं में बोया है
बनाओ खुद को एक जलता तेज़ाब
कि देख लो जो नज़र उठा तो हो जाए वो भस्म
यहाँ नहीं सुनी जातीं खामोश चीखें
जब तक न फुफकारो
और बहते आँसुओं से
नहीं बुझा करती उनके अहम की अग्नि
इसलिए
तीव्र विरोध के स्वर ही बनते हैं किसी भी युद्ध में जीत का प्रतीक
जान लो
मान लो इस बात को ...ओ बदहवास कठपुतलियों !!!
हम व्यथित हैं तुम्हारे लिए
बचा लो स्त्री जाति को इस विनाश से
जागो, जागो, जागो ओ बसंती हवाओं
मत मिटाओ खुद को उन नामर्दों के लिए
तुम्हारे दर्द से बेहाल है आज सम्पूर्ण स्त्री जाति
तुम्हारे आँसुओं से सुलग रही है हमारी छाती
खुद पर रहम करना आखिर कब सीखोगी तुम ?

सोमवार, 22 मार्च 2021

पानी आँख का सूख जाए

 पानी आँख का सूख जाए 

पानी जिस्म का सूख जाए 
पानी संबंधों के मध्य भी सूख जाए 
नहीं फर्क पड़ेगा सृष्टि को 

जहाँ जल ही जीवन हो 
वहाँ पानी के सूखने से 
समाप्त हो जाती हैं प्रजातियाँ 
समाप्त हो जाती हैं सभ्यताएं 

जैसे जीवन के लिए साँसों का होना जरूरी है 
जैसे जीवन के लिए भोजन जरूरी है 
वैसे ही जीवन के लिए पानी जरूरी है 

अगला विश्व युद्ध पानी के लिए हो 
उससे पहले आवश्यक है 
जागृत होकर एक एक बूँद संजोना 

पानी केवल जीवन ही नहीं
वरदान है 
अमृत है 
धरोहर है 
संजो सको तो संजो लो 
वो वक्त आने से पहले 
जहाँ अवशेषों से होगी निशानदेही अस्तित्व की 
और कहेगा कोई पुरातत्वविद फिर किसी युग में 
हाँ, जिंदा थी कभी यहाँ भी एक सभ्यता 
जो जान न सकी विकास के मायने 
अपना ही दोहन स्वयं करती रही 
आँख पर पट्टी बाँध चलती रही 

क्या आवश्यक है हर युग में गांधारी का जन्म?

गुरुवार, 11 मार्च 2021

जरूरी तो नहीं मुकम्मल होना हर ज़िन्दगी का…………

पास रहने पर
साथ रहने पर
फिर भी इक
उम्र बीतने पर
एक दूजे के
मन को ना जान पाना
आह ! कितना सालता होगा ना वो दर्द
जो ना कह पाये ना सह पाये


ज़िन्दगी के तमाशे में तमाशबीन बनकर रह जाना
जैसे नींद से उम्र भर ना जागना और ज़िन्दगी का मुकम्मल हो जाना
जैसे जागने वाली रातों के ख्वाब संजोना मगर दिन का ना ढलना
जैसे चाशनी को जुबां पर रखना मगर स्वाद का ना पता चलना


अधूरी हसरतें अधूरे ख्वाब अधूरी ज़िन्दगी और स्वप्न टूट जाये
खुली किताब हो और अक्षर धुंधला जायें ज़िन्दगी के मोतियाबिंद से
जीने के बहानों में इज़ाफ़ा हो और ज़िन्दगी ही हाथ से छूट जाये
बस कुछ यूँ तय कर लिया एक अनचाहा, अनमाँगा सफ़र हमने
जरूरी तो नहीं मुकम्मल होना हर ज़िन्दगी का…………

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

यत्र तत्र सर्वत्र ...

हम सभी शेर हैं बधाई देने में फिर वो जन्मदिन हो शादी की सालगिरह या कोई उपलब्धि ...

इसी तरह निभाते हैं हम
श्रद्धांजलियों का सिलसिला
करके नमन या कहकर बेहद दुखद
कर ही देते हैं प्रगट अपनी संवेदनाएं ....
बस नहीं हो पाते इतने उदारवादी
किसी भी अच्छी
कविता, कहानी या पोस्ट पर ...
हाँ होते हैं उदारवादी
किसी भी कंट्रोवर्शल पोस्ट
या महिला के फोटो पर
शायद यही है वास्तविक चरित्र
जहाँ हम उगल देते हैं
अपनी कुंठित सोच
और हो जाते हैं निश्चिन्त
करके दुसरे की नींद हराम
बस इतना सा है हमारे होने का अभिप्राय
कि पहचान के लिजलिजे कीड़े कुलबुलायें उससे पहले जरूरी हैं ऐसे घात प्रतिघात ...
ये शोर का समय है
और प्रतिरोध जरूरी है
चुप्पी साध के
जबकि जरूरी चीजों को
एक तरफ करने का इससे बेहतर विकल्प
भला और क्या होगा
जरूरी है हमारी तुच्छ मानसिकता का प्रसार
छोटी सोच सहायक है
हमारे मानसिक सुकून के लिए
बस इसलिए ही फैले हैं हम
यत्र तत्र सर्वत्र ...

सोमवार, 1 मार्च 2021

दस्तकों से ऐतराज नहीं

 मुझे दस्तकों से ऐतराज नहीं

यहाँ अपनी कोई आवाज़ नहीं
ये किस दौर में जीते हैं
जहाँ आज़ादी का कोई हिसाब नहीं
चलो ओढ़ लें नकाब
चलो बाँध लें जुबान
कि
ये दौर-ए बेहिसाब है
यहाँ किसी का कोई खैरख्वाह नहीं
दाँत अमृतांजन से मांजो या कॉलगेट से
साँसों पे लगे पहरों पर
तुम्हारा कोई अख्तियार नहीं
आज के दौर का यही है बस एकमात्र गणित
मूक होना ही है निर्विकल्प समाधि का प्रतीक
तो
शोर देशद्रोह है , राष्ट्रद्रोह है
हाथ ताली के लिए
मुँह खाने के लिए
सिर झुकाने के लिए
इससे आगे कोई रेखा लांघना नहीं
कि
सीमा रेखा के पार सीता का निष्कासन ही है अंतिम विकल्प...

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

स्त्रियों का नया स्वांग

 खुद को समेटकर रखती है अपने अन्दर ही बाहर नहीं मिलता कोई कोना या ठिकाना सुस्ताने को बिछे नहीं मिलते हरसिंगार खोखले सन्दर्भों से परिभाषित नहीं किए जा सकते सम्बन्ध

आग्नेय नेत्रों और बोलियों से
हिल जाती हैं पुख्ता नींवें भी एक दिन
रबड़ को एक हद तक खींचना ही शोभा देता है
तात्पर्य यह
कि स्त्रियों ने सीख लिया है
तुम्हारी परिक्रमा से बाहर एक वृत्त बनाना
जो उनसे शुरू होकर उन पर ही ख़त्म होता है
यह स्त्रियों का नया स्वांग
तुम्हारे अहम पर आखिरी चोट है
गुठने चलने के नियमों को ताक पर रख
कर ली है उसने अपनी रीढ़ सीधी
आओ, कर सको तो करो
स्त्रियों की नयी दुनिया को सलाम
'आमीन' कहने भर से हो जायेगी हर मुश्किल आसान

मंगलवार, 2 जून 2020

मृत्यु का लॉकडाउन

दो जून की रोटी के लिए
एक जून को खुला देश
और सब आत्मनिर्भर हो गए

इसके बाद न प्रश्न हैं न उत्तर

ये है महिमा तंत्र की
जान सको तो जान लो ...अपनी परतंत्रता
नहीं माने तो क्या होगा ?
छोडो, क्या अब तक कुछ कर पाए ...जाने दो
तुम पेट भरो और मरो
बस यहीं तक है तुम्हारी उपादेयता


तुम्हें जो चाहिए तुम्हें मिला
उन्हें जो चाहिए उन्हें मिला
फिर कैसा गिला?
आप दोनों मिल मनाएं होली और दिवाली
बस संकट मुक्ति के यही हैं अंतिम उपाय


वक्त के हिसाब अब शापमुक्त हैं
दिन और रात अब कोरोनाग्रस्त हैं
और जीवन ...आडम्बरयुक्त
ऐसे देश में और ऐसे परिवेश में
वक्त की नागिनें नहीं डंसा करतीं


राजनीति की चौसर पर
धर्मपरायण शांतिपूर्ण देश में
महामारियां अवसर होती हैं अवसाद नहीं ...


फिर क्यों गाते हो शोकगीत
सब अच्छा है ...डम डम डिगा डिगा
आओ गायें ताल से ताल मिला
करें नृत्य
कि मृत्यु का उत्सव भी ज़िन्दगी की तरह होना चाहिए


तुम कल भी नगण्य थे, आज भी हो और कल भी रहोगे
फिर करो स्वागत निर्णय का
दो जून की रोटी के लिए एक जून को खुले देश का


ये मृत्यु का लॉक डाउन है
चढ़ा लो प्रत्यंचा गांडीव पर
क्योंकि
शिकार भी तुम हो और शिकारी भी
इति महाभारत कथा ...

गुरुवार, 21 मई 2020

कतार का अंतिम आदमी

बेशक
मैं कतार का अंतिम आदमी हूँ
लेकिन सबसे अहम हूँ

मेरे बिना तुम्हारे महल चौबारे नहीं
पूँजी के नंगे नज़ारे नहीं
फिर भी दृष्टि में तुम्हारी नगण्य हूँ

मत भूलो
स्वप्न तुम देखते हो
पूरा मैं करता हूँ
फिर भी मारा मारा
मैं ही यहाँ वहां फिरता हूँ

तुम तभी चैन से सोते हो
जब मैं धूप में तपता हूँ
तुम्हारी ख्वाहिशों का इकबाल बुलंद हो
इस खातिर
अपनी नींदों को रेहन रखता हूँ

भूख, बीमारी, लाचारी मेरे हिस्से आती है
फिर भी न शिकायत करता हूँ
सर्दी गर्मी वर्षा की हर मार मैं ही सहता हूँ
अर्थव्यवस्था के उत्थान में अपना योगदान देता हूँ
फिर न किसी कतार का हिस्सा हूँ
नगण्य ही सही,
फिर भी तुम्हारा हिस्सा हूँ

बुधवार, 20 मई 2020

ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ



ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ

इंसान होकर इंसान से ही लड़ रहा हूँ


ये किस तूफां से गुजर रहा हूँ

जब नब्ज़ छूटती जा रही है

ज़िन्दगी फिसलती जा रही है

अब भूख से भी इश्क कर रहा हूँ


ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...


काली रातों की भस्म मल रहा हूँ

उम्मीद के सर्द मौसम से डर रहा हूँ

चिलचिलाती धूप में भी नंगे पाँव चल रहा हूँ

हर गली कूचे शहर में सिर्फ मैं ही मर रहा हूँ

ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...



वो देखो भूख से लड़ रहा है

ज़िन्दगी से बहस कर रहा है

ज़िन्दगी और भूख आमने सामने हैं

मगर न कोई जीत हार रहा है


ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...


वक्त के अजीब पेचोखम हैं

किश्त-दर-किश्त ले रहा है

कल आज और कल के मनुज से

एक नया प्रश्न कर रहा है


ज़िन्दगी से एक युद्ध कर रहा हूँ ...

रविवार, 10 मई 2020

विकल्पहीन होती है माँ

विकल्पहीन होती है माँ 
बच्चों की हसरतों के आगे 
भूल जाती है दर्दोगम अपना 
कर देती है खुद को किनारे 
अपनी चाहतों को मारे 
कि 
खुद को मारकर जीना जो सीख चुकी होती है 

तो क्या हुआ 
जो उम्र एक अवसाद बन गयी हो 
और जीवन असरहीन दवा 

ममता का मोल चुकाना ही होता है 
अपनी चाहतों को दबाना ही होता है 
कि
घुट घुटकर जीना ही बचता है जिसके सामने अंतिम विकल्प 
किसे कहे और क्या ? 
कौन समझता है यदि कह भी दे तो ?

ये तकाजों का दौर है 
जिसका जितना बड़ा तकाज़ा 
उसका उतनी जल्दी भुगतान 
मगर माँ 
वो क्या करे ?
कैसे और किससे करे तकाज़ा 
सूखी रेत सा झरना ही जिसकी नियति हो 

तो क्या हुआ 
जो रोती हो सिसकती हो अकेले में 
कि 
जड़त्व के सिद्धांत से वाकिफ है 
इसलिए नहीं चाहती 
विकल्पहीनता उतरे उनके हिस्से में 

जी जाना चाहती है 
अपने बच्चों के हिस्से की भी विकल्पहीनता 
कि 
विकल्प ही होते हैं उम्मीद का नया कोण 

इससे ज्यादा और क्या दे सकती है एक माँ अपने बच्चों को ......


रविवार, 12 अप्रैल 2020

फिर जीने का क्या सबब?


सच ही तो है
मर चुके हैं मेरे सपने
और नए देखने की हिम्मत नहीं
अब बताये कोई वो क्या करे ?
हाँ , गुजर रही हूँ उसी मुकाम से
जहाँ कोई तड़प बची ही नहीं
एक मरघटी सन्नाटा बांह पसारे
लील रहा है मेरी रूह
कैसे पहुँचे कोई मेरे अंतस्थल तक
जबकि वक्त के अंतराल में तो बदल जाती हैं सभ्यताएं

मोहब्बत की भाप से अब
नहीं होती नम
मेरे दिल की जमीं
शून्य से नीचे जमी बर्फ
गवाह है
मेरी आँख के अंधेपन की
जो ठहर गयी है मेरी आँख में
जहाँ तस्वीर हो या घटना
घटती रहे मगर
हर असर से अछूती रहे
जिसमे भावनाओं के उद्वेलन
महज कोरे भ्रम भर हों
एक कटी पतंग सरीखा
हो गया हो अस्तित्व
खुद से खुद का विचलन संयोग नहीं
वर्तमान है ...

ये मेरी शून्यता का आईना ही तो है
जिसमे भरी गयी भावांजलि
एक सुलगती कटार के साथ
ये शब्दों की सुलगती देह
झुलसा तो रही है
मगर राह नहीं दिखा रही मुझे
जो लिपट जाऊं खुद से ही
और चूम लूँ अपनी ही रूह
क्योंकि
रस्मोरिवाज की कठपुतलियाँ इशारों की मोहताज हुआ करती हैं
और मेरी डोर
किसी अदृश्यता में ढूँढ रही है एक तिरछी नज़र

हुक्मरान
आज्ञा दो हुजूर
फतवों की साँसों पर लगे पहरे
घोंट रहे हैं मेरा गला
कि
सपनों की कूच नहीं छोडती निशान भी
फिर जीने का क्या सबब?




गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

खाली बैठी औरतें

सुनिए
अपनी नाराज़गी की पुड़िया बनाइये
और गटक जाइए
गए वो ज़माने
जब कोल्हू के बैल सी जुती दिखाई देती थी
दम भर न जो साँस लेती थी
साहेब
डाल लीजिये आदत अब
हर गली, हर मोड़, हर नुक्कड़ पर
दिख जायेंगी आपको खाली बैठी औरतें
जानते हैं क्यों?
जाग गयी हैं वो
न केवल अपने अधिकारों के प्रति
बल्कि अपने प्रति भी
पहचान चुकी हैं अपना अस्तित्व
और उसकी उपयोगिता भी
आपको अब सिर्फ शाहीन बाग़ ही नहीं
हर घर में मिल जायेंगी
खाली बैठी मौन विद्रोह करती औरतें
इनकी खामोशी की गूँज से
जो थरथरा उठा है आपका सीना
जाहिर कर रहा है
परिवर्तन की बयार ने हिलानी शुरू कर दी हैं चूलें
एक बात और नोट कर लें अपनी नोटबुक में
आने वाले कल में
होगी बागडोर इन्हीं खाली बैठी औरतों के हाथों में
फिर वो आपका घर हो या सत्ता
शायद तब जानें आप
खाली बैठी औरतों की शक्ति को
जब मंगल के सीने पर पैर रख करेंगी यही ब्रह्माण्ड रोधन एक दिन
तब तक सीख लो
अपने गणित के डिब्बे को दुरुस्त करना
आज खाली बैठी औरतों ने बो दिए हैं बीज ख़ामोशी के
प्रतिध्वनियों की टंकार से एक दिन
जरूर काँपेगा आसमां का सीना...जान चुकी हैं वो
ये बात अब तुम भी न सिर्फ जान लो बल्कि मान भी लो ...


इस बार
ये खाली बैठी औरतें खेल रही हैं पिट्ठू
तुम्हारे अहम के पत्थर से
जीत निश्चित है ......

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

तुम्हारा स्वागत है

 1
तुम   कहती  हो  
" जीना है मुझे "
मैं कहती हूँ ………… क्यों ?
आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ?
 क्या मिलेगा तुम्हे जीकर ?
बचपन से ही बेटी होने के दंश  को सहोगी 
बड़े होकर किसी की निगाहों में चढोगी
तो कहीं तेज़ाब की आग में खद्कोगी
तो कहीं बलात्कार की  त्रासदी सहोगी 
फिर चाहे वो बलात्कार 
घर में हो या बाहर 
पति द्वारा हो या रिश्तेदार द्वारा या अनजान द्वारा 
क्या फर्क पड़ता है या पड़ेगा 
क्योंकि 
शिकार तो तुम हमेशा ही रहोगी 
जरूरी नहीं की निर्वस्त्र करके ही बलात्कार किया जाए 
कभी कभी  जब निगाहें भेदती हैं कोमल अंगों को 
बलात्कृत हो जाती है नारी अस्मिता 
जब कपड़ों के अन्दर का दृश्य भी 
हो जाता है दृश्यमान देखने वाले की कुत्सित निगाह में 
हो जाती है एक लड़की शर्मसार 
इतना ही नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता 
तुम बच्ची हो , युवा या प्रौढ़ 
तुम बस एक देह हो सिर्फ देह 
जिसके नहीं होते हाथ, पैर या मन 
होती है तो सिर्फ शल्य चिकित्सा की गयी देह के कामुक अंग 
उनसे इतर तुम कुछ नहीं हो 
क्या है ऐसा जो तुम्हें कुलबुला रहा है 
बाहर आने को प्रेरित  कर रहा है 
क्या मिलेगा तुम्हें यहाँ आकर 
देखो तो ………….
 कितनी निरीह पशु सी 
शिकार हो चुकी हैं न्याय की आस में 
मगर यहाँ न्याय
एक बेबस विधवा के जीवन की अँधेरी गली सा शापित खड़ा है 
कहीं नाबलिगता की आड़ में तो कहीं संशोधनों के जाल में 
मगर स्वयं निर्णय लेने में कितना सक्षम है 
ये आंकड़े बताते हैं 
कि न्याय की आस में वक्त करवट बदलता है 
मगर न्याय का त्रिशूल तो सिर्फ पीड़ित को ही लगता है 
हो जाती है वो फिर बार- बार बलात्कृत 
कभी क़ानून के रक्षक द्वारा कटघरे में खड़े होकर 
तो कभी किसी रिपोर्टर द्वारा अपनी टी आर पी के लिए कुरेदे जाने पर 
तो कभी गली कूचे में निकलने पर 
कभी निगाह में हेयता तो कभी सहानुभूति देखकर 
तो कभी खुदी  पर दोषारोपण होता देखकर 
अब बताओ तो ज़रा ………… क्या आना चाहोगी इस हाल में 
क्या जी सकोगी विषाक्त वातावरण में 
ले सकोगी आज़ादी की साँस 
गर कर सको ऐसा तो आना इस जहान में ……………तुम्हारा स्वागत है 

2
तुम कहती हो 
दुनिया  बहुत सुन्दर है 
देखना चाहती हो तुम 
जीना चाहती हो तुम 
हाँ सुन्दर है मगर तभी तक 
जब तक तुम " हाँ " की दहलीज पर बैठी हो 
जिस दिन " ना " कहना सीख लिया 
पुरुष का अहम् आहत हो जाएगा 
और तुम्हारा जीना दुश्वार 
तुम कहोगी …………क्यों डरा रही हूँ 
क्या सारी दुनिया में सारी स्त्रियों पर 
होता है ऐसा अत्याचार 
क्या स्त्री को कोई सुख कभी नहीं मिलता 
क्या स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता 
क्या हर स्त्री इन्ही गलियारों से गुजरती है 
तो सुनो ……………एक कडवा सत्य 
हाँ ……………एक हद तक ये सच है 
कभी न कभी , किसी न किसी रूप में 
होता है उसका बलात्कार 
कभी  इच्छाओं का तो कभी उसकी चाहतों का 
तो कभी उसकी अस्मिता का 
होता है उस पर अत्याचार 
यूं ही नहीं कुछ स्त्रियों ने आकाश पर परचम लहराया है 
बेशक उनका कुछ दबंगपना  काम आया है 
मगर सोचना ज़रा ……ऐसी  कितनी होंगी 
जिनके हाथों में कुदालें होंगी 
जिन्होंने खोदा होगा धरती का सीना 
सिर्फ मुट्ठी भर …………… एक सब्जबाग है ये 
नारी मुक्ति या नारी विमर्श 
फिर चाहे विज्ञापन की मल्लिका बनो 
या ऑफिस में  काम  करने वाली सहकर्मी 
या कोई जानी मानी हस्ती 
सबके लिए महज  सिर्फ देह भर हो तुम 
फिर चाहे उसका मानसिक शोषण हो या शारीरिक 
दोहन के लिए गर तैयार हो 
प्रोडक्ट के रूप में प्रयोग होने को गर तैयार हो 
अपनी सोच को गिरवीं रखने को गर तैयार हो 
तो आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

3
अभी जमीन उर्वर नहीं है 
महज ढकोसलों और दिखावों की भेंट चढ़ी है 
दो शब्द कह देना भर नहीं होता नारी विमर्श 
आन्दोलन  करना भर नहीं होता नारी मुक्ति 
नारी की मुक्ति के लिए नारी को  करना होता है 
जड़वादी ,   रूढ़िवादी सोच से खुद को मुक्त 
मगर अभी  जमीन उर्वर नहीं है 
अभी नहीं डाली गयी है इसमें उचित मात्र में खाद ,बीज और पानी 
फिर कैसे बहे बदलाव की बयार 
कैसे पाए नारी अपना सम्मान 
अभी संभव नहीं हवाओं के रुख का बदलना 
जानती हो क्यों ………… क्योंकि 
यहाँ है जंगलराज ……… न कोई डर है ना कानून 
चोर के हाथ में ही है तिजोरी की चाबी 
ऐसे में किस किस से और कब तक खुद को बचाओगी
कैसे इस माहौल में जी पाओगी 
ये सब सोच लेना तब आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

4
और सुनो सबसे बडा सच 
नहीं हुयी मैं इतनी सक्षम 
जो बचा सकूँ तुम्हें 
हर विकृत सोच और निगाह से 
नहीं आयी मुझमें अभी वो योग्यता 
नहीं है इतना साहस जो बदल सकूँ 
इतिहास के पन्नों पर लिखी इबारतें 
पितृसत्तात्मक समाज के चेहरे से 
सिर्फ़ कहानियों , कविताओं ,आलेखों या मंच पर 
बोलना भर सीखा है मैनें 
मगर नहीं बदली है इक सभ्यता अभी मुझमें ही 
फिर कैसे तुम्हें आने को करूँ प्रोत्साहित 
कैसे करूँ तुम्हारा खुले दिल से स्वागत 
जब अब तक खुद को ही नहीं दे सकी तसल्लियों के शिखर 
जब अब तक खुद को नहीं कर सकी अपनी निगाह में स्थापित 
बन के रही हूँ अब तक सिर्फ़ और सिर्फ़ 
पुरुषवादी सोच और उसके हाथ का महज एक खिलौना भर 
फिर भी यदि तुम समझती हो 
तुम बदल सकती हो इतिहास के घिनौने अक्षर 
मगर मुझसे कोई उम्मीद की किरण ना रखना 
गर कर सको ऐसा तब आना इस दुनिया में ……तुम्हारा स्वागत है 


ये वो तस्वीर है  
वो कडवा सच है 
आज की दुनिया का 
जिसमें आने को तुम आतुर हो 
और कहती हो 
" जीना है मुझे "