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शनिवार, 12 जून 2021

ठनी है रार

 

बचा लो जो बचा सकते हो
ज़िन्दगी और मौत में ठनी है रार

अभी सदी ने सफहा पलटा नहीं है
अभी तो लिखी भर है इबारत
और तुम इतने भर से घबरा गए

जब तिलक लहू से माथे पर किया जाता है
उसे खुरचने को कोई औजार नहीं बना होता
प्रयास के अंतिम प्रहर में ही
कामयाबी दस्तखत किया करती है

तुम तय करो
लड़ना किससे है तुम्हें
जीतना किससे है तुम्हें
ज़िन्दगी से या मौत से
या फिर अपनी हताशा से, अपने विश्वास से

इस बार मौत ने चुपके से कान में सरगोशी नहीं की है
इस बार डंके की चोट पर कर रही है मुनादी
फिर ज़िन्दगी कैसे दहशत के लिफाफे में खुद को कैद रख सकती है
ज़िन्दगी वो योद्धा है
जो हर हाल में जीतना जानती है
बशर्ते
अपनी कमजोरियों से जीत सके







3 टिप्‍पणियां:

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (14-06-2021 ) को 'ये कभी सत्य कहने से डरते नहीं' (चर्चा अंक 4095) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

#रवीन्द्र_सिंह_यादव

Anita ने कहा…

जिंदगी जीत सकती है अगर अपनी कमजोरियों से लड़े..बिलकुल सही कहा है आपने

Onkar ने कहा…

बहुत ही सुंदर