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शनिवार, 12 जून 2021

ठनी है रार

 

बचा लो जो बचा सकते हो
ज़िन्दगी और मौत में ठनी है रार

अभी सदी ने सफहा पलटा नहीं है
अभी तो लिखी भर है इबारत
और तुम इतने भर से घबरा गए

जब तिलक लहू से माथे पर किया जाता है
उसे खुरचने को कोई औजार नहीं बना होता
प्रयास के अंतिम प्रहर में ही
कामयाबी दस्तखत किया करती है

तुम तय करो
लड़ना किससे है तुम्हें
जीतना किससे है तुम्हें
ज़िन्दगी से या मौत से
या फिर अपनी हताशा से, अपने विश्वास से

इस बार मौत ने चुपके से कान में सरगोशी नहीं की है
इस बार डंके की चोट पर कर रही है मुनादी
फिर ज़िन्दगी कैसे दहशत के लिफाफे में खुद को कैद रख सकती है
ज़िन्दगी वो योद्धा है
जो हर हाल में जीतना जानती है
बशर्ते
अपनी कमजोरियों से जीत सके







बुधवार, 26 मई 2021

ए उदासियों

 ए उदासियों आओ

इस मोहल्ले में जश्न मनाओ
कि यहाँ ऐतराज़ की दुकानों पर ताला पड़ा है
सोहर गाने का मौसम बहुत उम्दा है
रुके ठहरे सिमटे लम्हों से गले मिलो
हो सके तो मुस्कुराओ
एक दूजे को देखकर
यहाँ अदब का नया शहर बसा है
सिर्फ तुम्हारे लिये
रूमानी होने का मतलब
सिर्फ वही नहीं होता
तुम भी हो सकती हो रूमानी
अपने दायरों में
इक दूजे की आँख में झाँककर
सिर्फ इश्क की रुमानियत ही रुमानियत नहीं हुआ करती
उदासियों की रुमानियतों का इश्क सरेआम नहीं हुआ करता
चढ़ाये होंगे इश्क की दरगाह पर
सबने ख्वाबों के गुलाब
जिनकी कोई उम्र ही नहीं होती
मगर
उदासियों की सेज पर चढ़े गुलाब
किसी उम्र में नहीं मुरझाते
ये किश्तों में कटने के शऊर हैं
हो इरादा तो एक बार आजमा लेना खुद को
उदासियाँ पनाह दे भी देंगी और ले भी लेंगी
कि उदासियों से इश्क करने की कसम खाई है इस बार...

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

हाँ, नपुंसक ही है वो


तुम नहीं सुधरोगी
कोई सुधारना चाहे तब भी नहीं
कब खुद को पहचानोगी?
कब खुद के लिए जीना सीखोगी?
क्या सारा स्वाभिमान बेच दिया
एक नपुंसक के हाथों ?
हाँ, नपुंसक ही है वो
जो आधी रात वस्त्रहीन कर
घर से निकाल देता है
फिर भी नहीं जागता तुम में तुम्हारा स्वाभिमान ?
क्यों कठपुतली बन खुद को नचा रही हो ?
कोई तेज़ाब से झुलसा रहा है
कोई आग लगा रहा है
मगर तुम
तुमने ठानी हुई है गुलामी
आखिर कब तक नहीं तोडोगी गुलामी की जंजीरें?
गया वक्त गिडगिडाने का
नहीं पसीजा करते उनके दिल
सच मानो
दिल नहीं होते उनके अन्दर
और पत्थर कभी पिघला नहीं करते
मानो इस सत्य को
जागो, उठो और करो प्रयाण
कि दुर्गा को पूजने भर से नहीं बन जाओगी तुम दुर्गा
काली बनने के लिए जरूरी है
तुम्हारा आत्मोत्सर्ग
जरूरी है गलत के खिलाफ बिगुल
सुनो
हमारे कह देने भर से
तुम्हारे साथ खड़े हो जाने भर से
तुम्हारे लिए आवाज़ उठा देने भर से
नहीं मिलेगा तुम्हें न्याय
उसके लिए पहल का परचम तो तुम्हें ही लहराना पड़ेगा
एक कदम आगे तुम्हें ही बढ़ाना होगा
काटो उन जड़ों को
जिन्हें पीढ़ियों ने सींच
तुम्हारी शिराओं में बोया है
बनाओ खुद को एक जलता तेज़ाब
कि देख लो जो नज़र उठा तो हो जाए वो भस्म
यहाँ नहीं सुनी जातीं खामोश चीखें
जब तक न फुफकारो
और बहते आँसुओं से
नहीं बुझा करती उनके अहम की अग्नि
इसलिए
तीव्र विरोध के स्वर ही बनते हैं किसी भी युद्ध में जीत का प्रतीक
जान लो
मान लो इस बात को ...ओ बदहवास कठपुतलियों !!!
हम व्यथित हैं तुम्हारे लिए
बचा लो स्त्री जाति को इस विनाश से
जागो, जागो, जागो ओ बसंती हवाओं
मत मिटाओ खुद को उन नामर्दों के लिए
तुम्हारे दर्द से बेहाल है आज सम्पूर्ण स्त्री जाति
तुम्हारे आँसुओं से सुलग रही है हमारी छाती
खुद पर रहम करना आखिर कब सीखोगी तुम ?

सोमवार, 22 मार्च 2021

पानी आँख का सूख जाए

 पानी आँख का सूख जाए 

पानी जिस्म का सूख जाए 
पानी संबंधों के मध्य भी सूख जाए 
नहीं फर्क पड़ेगा सृष्टि को 

जहाँ जल ही जीवन हो 
वहाँ पानी के सूखने से 
समाप्त हो जाती हैं प्रजातियाँ 
समाप्त हो जाती हैं सभ्यताएं 

जैसे जीवन के लिए साँसों का होना जरूरी है 
जैसे जीवन के लिए भोजन जरूरी है 
वैसे ही जीवन के लिए पानी जरूरी है 

अगला विश्व युद्ध पानी के लिए हो 
उससे पहले आवश्यक है 
जागृत होकर एक एक बूँद संजोना 

पानी केवल जीवन ही नहीं
वरदान है 
अमृत है 
धरोहर है 
संजो सको तो संजो लो 
वो वक्त आने से पहले 
जहाँ अवशेषों से होगी निशानदेही अस्तित्व की 
और कहेगा कोई पुरातत्वविद फिर किसी युग में 
हाँ, जिंदा थी कभी यहाँ भी एक सभ्यता 
जो जान न सकी विकास के मायने 
अपना ही दोहन स्वयं करती रही 
आँख पर पट्टी बाँध चलती रही 

क्या आवश्यक है हर युग में गांधारी का जन्म?

गुरुवार, 11 मार्च 2021

जरूरी तो नहीं मुकम्मल होना हर ज़िन्दगी का…………

पास रहने पर
साथ रहने पर
फिर भी इक
उम्र बीतने पर
एक दूजे के
मन को ना जान पाना
आह ! कितना सालता होगा ना वो दर्द
जो ना कह पाये ना सह पाये


ज़िन्दगी के तमाशे में तमाशबीन बनकर रह जाना
जैसे नींद से उम्र भर ना जागना और ज़िन्दगी का मुकम्मल हो जाना
जैसे जागने वाली रातों के ख्वाब संजोना मगर दिन का ना ढलना
जैसे चाशनी को जुबां पर रखना मगर स्वाद का ना पता चलना


अधूरी हसरतें अधूरे ख्वाब अधूरी ज़िन्दगी और स्वप्न टूट जाये
खुली किताब हो और अक्षर धुंधला जायें ज़िन्दगी के मोतियाबिंद से
जीने के बहानों में इज़ाफ़ा हो और ज़िन्दगी ही हाथ से छूट जाये
बस कुछ यूँ तय कर लिया एक अनचाहा, अनमाँगा सफ़र हमने
जरूरी तो नहीं मुकम्मल होना हर ज़िन्दगी का…………

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

यत्र तत्र सर्वत्र ...

हम सभी शेर हैं बधाई देने में फिर वो जन्मदिन हो शादी की सालगिरह या कोई उपलब्धि ...

इसी तरह निभाते हैं हम
श्रद्धांजलियों का सिलसिला
करके नमन या कहकर बेहद दुखद
कर ही देते हैं प्रगट अपनी संवेदनाएं ....
बस नहीं हो पाते इतने उदारवादी
किसी भी अच्छी
कविता, कहानी या पोस्ट पर ...
हाँ होते हैं उदारवादी
किसी भी कंट्रोवर्शल पोस्ट
या महिला के फोटो पर
शायद यही है वास्तविक चरित्र
जहाँ हम उगल देते हैं
अपनी कुंठित सोच
और हो जाते हैं निश्चिन्त
करके दुसरे की नींद हराम
बस इतना सा है हमारे होने का अभिप्राय
कि पहचान के लिजलिजे कीड़े कुलबुलायें उससे पहले जरूरी हैं ऐसे घात प्रतिघात ...
ये शोर का समय है
और प्रतिरोध जरूरी है
चुप्पी साध के
जबकि जरूरी चीजों को
एक तरफ करने का इससे बेहतर विकल्प
भला और क्या होगा
जरूरी है हमारी तुच्छ मानसिकता का प्रसार
छोटी सोच सहायक है
हमारे मानसिक सुकून के लिए
बस इसलिए ही फैले हैं हम
यत्र तत्र सर्वत्र ...

सोमवार, 1 मार्च 2021

दस्तकों से ऐतराज नहीं

 मुझे दस्तकों से ऐतराज नहीं

यहाँ अपनी कोई आवाज़ नहीं
ये किस दौर में जीते हैं
जहाँ आज़ादी का कोई हिसाब नहीं
चलो ओढ़ लें नकाब
चलो बाँध लें जुबान
कि
ये दौर-ए बेहिसाब है
यहाँ किसी का कोई खैरख्वाह नहीं
दाँत अमृतांजन से मांजो या कॉलगेट से
साँसों पे लगे पहरों पर
तुम्हारा कोई अख्तियार नहीं
आज के दौर का यही है बस एकमात्र गणित
मूक होना ही है निर्विकल्प समाधि का प्रतीक
तो
शोर देशद्रोह है , राष्ट्रद्रोह है
हाथ ताली के लिए
मुँह खाने के लिए
सिर झुकाने के लिए
इससे आगे कोई रेखा लांघना नहीं
कि
सीमा रेखा के पार सीता का निष्कासन ही है अंतिम विकल्प...

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

स्त्रियों का नया स्वांग

 खुद को समेटकर रखती है अपने अन्दर ही बाहर नहीं मिलता कोई कोना या ठिकाना सुस्ताने को बिछे नहीं मिलते हरसिंगार खोखले सन्दर्भों से परिभाषित नहीं किए जा सकते सम्बन्ध

आग्नेय नेत्रों और बोलियों से
हिल जाती हैं पुख्ता नींवें भी एक दिन
रबड़ को एक हद तक खींचना ही शोभा देता है
तात्पर्य यह
कि स्त्रियों ने सीख लिया है
तुम्हारी परिक्रमा से बाहर एक वृत्त बनाना
जो उनसे शुरू होकर उन पर ही ख़त्म होता है
यह स्त्रियों का नया स्वांग
तुम्हारे अहम पर आखिरी चोट है
गुठने चलने के नियमों को ताक पर रख
कर ली है उसने अपनी रीढ़ सीधी
आओ, कर सको तो करो
स्त्रियों की नयी दुनिया को सलाम
'आमीन' कहने भर से हो जायेगी हर मुश्किल आसान